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शाहरुख खान के वालिद : नायक के महानायक

- वेबदुनिया

पेशावर की गलियों में जरूर कुछ खास बात है जो सितारों को मुंबई की माया नगरी तक खींच लाती है। कपूर खानदान से दिलीप कुमार तक इसी शहर के धूलभरे रास्तों से होकर रजतपट के शहंशाह बने थे। नई पीढ़ी इस बात से शायद ही वाकिफ हो कि उसका पसंदीदा सितारा भी फिल्मी महानायकों के इस चमत्कारिक नगर से रिश्ता रखता है। सुपर स्टार शाहरुख खान के पुरखे भी पेशावर के बाशिंदे थे। यह नौजवान सितारा खुद कभी पेशावर नहीं गया, न उसके जेहन में उस शहर की कोई याद दर्ज है। फिर भी शाहरुख जब कभी अपने चहेते सितारे दिलीप साहब से मिलते हैं, तो गाहेबगाहे गुफ्‍तगू के सिरे उस बस्ती की ओर जरूर मुड़ जाते हैं। यही वह शहर था, जहाँ से शाहरुख के वालिद मरहूम मीर ताज मोहम्मद भारत की आजादी के तरानों के साथ दिल्ली आए थे। ठीक उसी तरह जैसे ग्लैमर का सपना सँजोए शाहरुख ने दिल्ली से बॉलीवुड का रुख किया था। शाहरुख और उनके पिता की जिंदगी में ऐसे मोड़ कई बार आए।
शाहरुख खान और उनके वालिद मरहूम मीर ताज मोहम्मद
शाहरुख के जीवन पर पिता का गहरा प्रभाव है। आमतौर पर लड़के अपनी माँ के अधिक करीब होते हैं, पर शाहरुख भावनात्मक रूप से अपने वालिद के साथ ज्यादा जुड़े रहे। सिर्फ पंद्रह वर्ष की आयु में पिता को खो देने का दुख उन्हें आज भी सालता है। किस्मत शाहरुख पर जरूरत से ज्यादा मेहरबान रही। नीली छतरीवाला एक हाथ से देता है, तो दूसरे से छीन लेता है। शाहरुख को अपनी माँ का वियोग भी सहना पड़ा। इस दोहरे आघात को उनकी पत्नी गौरी और सिनेमाई सफलता ने कम किया।
 
नायक का महानायक
पिता के बारे में बात करते वक्त शाहरुख भावावेश में डूब जाते हैं। किसी बच्चे जैसी बेचैनी उसकी नस-नस में भरने लगती है। शाहरुख की नजर में उनके पिता से बड़ा महानायक कोई नहीं हो सकता। वे बिल्कुल देवआनंद की तरह खूबसूरत थे। शाहरुख का कहना है। छ: फुट ऊँचा कद, भूरी आँखें और गौर वर्ण। ग्रेगरी पेक (हॉलीवुड अभिनेता) भी उन्हें देखकर ईर्ष्या से भर उठते। मैं उनके आगे कुछ नहीं हूँ। शाहरुख ने हमेशा अपने वालिद से तुलना की और खुद को एक चौथाई भी नहीं पाया। ...मैं बचपन में बेतरतीब बालों वाला बदसूरत-सा लड़का था। शाहरुख अक्सर यह बात करते हैं। उन्हें अपनी फूली हुई नाक और थूथन से उठे होंठ भी कतई पसंद नहीं। यह अलग बात है कि इन्हीं बेतरतीब बालों में स्वपन्न सुंदरी हेमामालिनी ने हाथ फिराने की ख्‍वाहिश व्यक्त की थी और उनकी गैर आनुपातिक नाक आज इंडस्ट्री के लिए प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गई है। 
 
मुगले आजम और मानसिंह
शाहरुख के वालिद अपने जमाने के जाने-माने वकील थे। रियासत में दिलचस्पी ने उन्हें स्वाधीनता संग्राम से जोड़ दिया। वे दो बार जेल भी गए। मिजाज के मीर ताज सचमुच मीर थे। यार-दोस्तों के साथ एक बार उन्होंने कंचनजंगा पर्वत की चढ़ाई की। आजादी की जंग में शिरकत का मौका आया, तो खादी पहनने से इंकार कर दिया। कहा - यह उनके व्यक्तित्व को जमती नहीं। कद-काठी हजरत की ऐसी थी कि के.आसिफ की फिल्म मुगले-आज में उन्हें मानसिंह की भूमिका का प्रस्ताव मिला था। मीर साहब ने तड़ाक से ना कर दी। सिनेमा यानी नौटंकी। जहाँपनाह को क्या खबर थी कि उनके साहबजादे एक दिन इसी नौटंकी से जमाने की नाक में नकेल डाल देंगे।
 
मीर साहब हिन्दी, कश्मीरी, पश्तो, अँगरेजी, इतालवी, उर्दू, पंजाबी, फारसी तमाम भाषाएँ फर्राटे से बोलते थे। शाहरुख ने बहुभाषा ज्ञान तो नहीं, पर वाचालता पिता से उधार ली है। वकालत पढ़े वालिद मियाँ ने स्वाधीनता आंदोलन में शिरकत के बदले सरकार से एक दुकान बतौर इनाम ली और उसमें रेस्त्राँ चलाया। दिल्ली में कुछ बच्चों को आग से बचाने के लिए उन्हें पुरस्कार स्वरूप एक मैडल भी जीता था। यह तमगा वे अक्सर बाल शाहरुख को दिखाया करते थे। मीर साहब ने कभी अपने नवाबजादे को बंदिशों में नहीं बाँधा। छोटे मियाँ कभी पड़ोसी की लड़की को छेड़कर आए, तो वालिद की दो टूक टिप्पणी होती - मोहतरमा, आपकी लड़की है ही इतनी खूबसूरत। शाहरुख अपने बेटे आर्यन पर भी यह नुस्खा आजमाने के इंतजार में हैं।
 
मीर साहब बला के भुलक्कड़ इंसान थे। शाहरुख को याद है कई बार उन्होंने अपने वालिद को टॉयलेट-सीट पर बैठकर उबले अंडे खाते देखा था। बड़े मियाँ यह भी भूल जाते थे कि यह उनका सिंहासन नहीं है। एक बार तो हजरत बगैर पतलून पहने दफ्तदर जाने लगे, तो बेगम साहिबा ने याद दिलाया। शाहरुख के पिता एक खानदारी रईस परिवार से आए थे। मगर दिल्ली में संघर्ष करना पड़ा।
 
वकालत में रुचि नहीं ली, व्यवसाय चलता नहीं। अपनी बेटी शहनाज (शाहरुख की बहन) को उन्होंने शहजादी की तरह पाला। शहनाज उम्र में शाहरुख से पाँच साल बड़ी है। वालिद की कैंसर से हुई मृत्यु ने शाहरुख को बुरी तरह तोड़ दिया। 19 सितंबर 1981 को मीर ताज मोहम्मद ने आखिरी साँस ली। इसके पहले कई रात जागकर शाहरुख और शहनाज ने पिता को लम्हा-लम्हा मौत के आगोश में जाते देखा था। पिता की मृत्यु के साथ किशोर शाहरुख ने अपना सबसा अच्छा दोस्त और सरपरस्त खो‍ दिया।
 
साबुन की टिकिया से शरारत
शाहरुख ने बहन के साथ मिलकर इस गम को बाँटा। शहनाज दिमाग से भी शाहरुख से तेज थी। मगर पिता की मौत के बाद छोटे भाई ने उन्हें सँभाला। गंभीर मिजाज की शहनाज दिनचर्या की पाबंद थी। शाहरुख पूरी तरह आलमगीर। शहनाज साफ-सफाई को लेकर हमेशा सख्‍त रही। मुँह और हाथ धोने के लिए वह दो अलग साबुनों का उपयोग करती। एक दिन नटखट नंदकिशोर चुपके से बहन के बाथरुम में घुस गए और घंटों उन बेशकीमती साबुन की टिकियाओं से हर-हर गंगे करते रहे। शहनाज आपा को पता चला, तो कसके धुनाई की। शाहरुख उस पिटाई को आज तक नहीं भूले हैं।