श्याम बेनेगल : एक दुनिया समानांतर...

Shyam Benegal
PIBPIB
इस विलक्षण फिल्मकार की अद्वितीय रचनाशैली का चमत्कार था कि उनके आलोचक भी उनकी प्रतिभा के कायल हुए बिना नहीं रह पाए। श्याम बेनेगल की फिल्में अपने राजनीतिक-सामाजिक वक्तव्य के लिए जानी जाती हैं। श्याम के शब्दों में 'राजनीतिक सिनेमा तभी पनप सकता है, जब समाज इसके लिए माँग करे। मैं नहीं मानता कि फिल्में सामाजिक-स्तर पर कोई बहुत बड़ा बदलाव ला सकती हैं, मगर उनमें गंभीर रूप से सामाजिक चेतना जगाने की क्षमता जरूर मौजूद है।'

श्याम अपनी फिल्मों से यही करते आए हैं। अंकुर/ मंथन/ निशांत/ आरोहण/ सुस्मन/ हरी-भरी/ समर जैसी फिल्मों से वे निरंतर समाज की सोई चेतना को जगाने की कोशिश करते रहे। भारत में वे समानांतर सिनेमा के प्रवर्तकों में से एक हैं, जबकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्हें नई धारा के सिनेमा का ध्वजवाहक माना जाता है।

सत्यजीत राय के अवसान के पश्चात श्याम ने उनकी विरासत को संभाला और इसे समकालीन संदर्भ प्रदान किए। वे कहते हैं, 'समूचा हिंदुस्तानी सिनेमा दो हिस्सों में किया जा सकता है। एक : सत्यजीत राय से पूर्व और दो : राय के पश्चात।' यदि ऐसा है तो राय के बाद भारतीय सार्थक सिनेमा की धुरी पूरी तरह बेनेगल के इर्द-गिर्द घूमती है।

आजादी के बाद भारत में सिनेमा का विकास एकीकृत रूप से सामूहिक स्तर पर हुआ, मगर सत्तर और अस्सी के दशक में दो सिनेमाधाराएँ देखने को मिलीं। व्यावसायिक सिनेमा के समानांतर एक ऐसे सिने आंदोलन ने जन्म लिया, जिसमें मनोरंजन के चिर-परिचित फॉमूले नहीं थे। इस नई धारा के फिल्मकारों ने सिनेमा को जनचेतना का माध्यम मानते हुए यथार्थपरक फिल्मों का निर्माण किया। श्याम बेनेगल उन फिल्मकारों के पथ-प्रदर्शक बनकर उभरे, जो फिल्मों को महज मनोरंजन का माध्यम नहीं मानते थे।

1974 में उन्होंने 'अंकुर' जैसी युग प्रवर्तक फिल्म बनाकर एक प्रकार से सिनेकर्म को नई शक्ल दी। महान फिल्मकार सत्यजीत राय से प्रभावित होने के बावजूद श्याम ने अपनी फिल्म को महज कलाकृति तक सीमित नहीं रखा, वरन उसे एक राजनीतिक-सामाजिक वक्तव्य की शक्ल देने की कोशिश की। 'अंकुर' सिनेकर्म की दृष्टि से एक अत्यंत महत्वपूर्ण रचना थी। बर्लिन फिल्मोत्सव में पुरस्कृत और ऑस्कर के लिए प्रविष्टि के बतौर चुनी गई इस फिल्म के बारे में समीक्षकों ने खुलकर चर्चा की।

ND|
स्वर्गीय इंदिरा गाँधी ने श्याम बेनेगल के बारे में कहा था कि उनकी फिल्में मनुष्य की मनुष्यता को अपने मूल स्वरूप में तलाशती हैं। इस प्रतिक्रिया का आधार था एक वृत्तचित्र-नेहरू। इसके निर्देशक थे श्याम बेनेगल। मजे की बात है कि इन्हीं बेनेगल ने आपातकाल के दौरान श्रीमती गाँधी की नीतियों की तीखी आलोचना की थी
ख्यात फिल्म विश्लेषिका अरुणा वासुदेव के अनुसार, 'फिल्म निर्माताओं और दर्शकों में तकनीक और सिनेमाई समझ दोनों ही स्तर पर अनगढ़ता का माहौल था। 'अंकुर' ने इन्हें सुस्पष्ट कर नूतन आकार सौंपा।' प्रयोगधर्मिता की धुरी पर 'अंकुर' सही अर्थ में नई धारा की सूत्रवाहक सिद्ध हुई। इसके साथ ही श्याम बेनेगल के रूप में भारतीय सिनेमा के एक नए अध्याय का भी सूत्रपात हुआ।


सम्बंधित जानकारी


और भी पढ़ें :