खंडवा वाले किशोर कुमार की राम-राम

किशोर कुमार : जयंती विशेष

किशोर कुमार
समय ताम्रकर|
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बहुमुखी प्रतिभा के धनी का को है। गायक, संगीतकार, अभिनेता, निर्माता, लेखक जैसे किशोर के कई रूप हमें देखने को मिले। संगीत की बिना तालीम हासिल किए जिस तरह से उन्होंने संगीत जगत में अपना स्थान बनाया वह तारीफ के काबिल है। अपनी मधुर आवाज में गाए गीतों के जरिए किशोर कुमार आज भी हमारे आसपास मौजूद हैं।

पुरानी के साथ-साथ नई पीढ़ी भी उनकी आवाज की दीवानी है। किशोर जितने उम्दा कलाकार थे, उतने ही रोचक इंसान। वे कब क्या कर बैठे, यह कोई नहीं जानता था। उनके कई किस्से में प्रचलित हैं। याद करते हैं उनकी कुछ खास बातें।

रशोकि रमाकु अटपटी बातों को अपने चटपटे अंदाज में कहना किशोर कुमार का फितूर था। खासकर गीतों की पंक्ति को दाएँ से बाएँ गाने में उन्होंने महारत हासिल कर ली थी। नाम पूछने पर कहते थे- रशोकि रमाकु।

तीन नायकों को बनाया महानायक
किशोर कुमार ने हिन्दी सिनेमा के तीन नायकों को महानायक का दर्जा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। उनकी आवाज के जादू से देवआनंद सदाबहार हीरो कहलाए। राजेश खन्ना को सुपर सितारा कहा जाने लगा और अमिताभ बच्चन महानायक हो गए।
मनोरंजन-कर
बारह साल की उम्र तक किशोर ने गीत-संगीत में महारत हासिल कर ली। वे रेडियो पर गाने सुनकर उनकी धुन पर थिरकते थे। फिल्मी गानों की किताब जमा कर उन्हें कंठस्थ कर गाते थे। घर आने वाले मेहमानों को अभिनय सहित गाने सुनाते तो 'मनोरंजन-कर' के रूप में कुछ इनाम भी माँग लेते थे।

बाथरूम-एक दिन अशोक कुमार के घर अचानक सचिन देव बर्मन पहुँच गए। बैठक में उन्होंने गाने की आवाज सुनी तो दादा मुनि से पूछा, 'कौन गा रहा है?' अशोक कुमार ने जवाब दिया-'मेरा छोटा भाई है। जब तक गाना नहीं गाता, उसका नहाना पूरा नहीं होता।' सचिन-दा ने बाद में किशोर कुमार को जीनियस बना दिया।
दो बार आवाज उधार ली
मोहम्मद रफी ने पहली बार किशोर कुमार को अपनी आवाज फिल्म 'रागिनी' में उधार दी। गीत हैं- 'मन मोरा बावरा।' दूसरी बार शंकर-जयकिशन की फिल्म 'शरारत' में रफी से गवाया था किशोर के लिए-'अजब है दास्ताँ तेरी ये जिंदगी।'

मेहमूद से लिया बदला फिल्म 'प्यार किए जा' में कॉमेडियन मेहमूद ने किशोर कुमार, शशि कपूर और ओमप्रकाश से ज्यादा पैसे वसूले थे। किशोर को यह बात अखर गई। इसका बदला उन्होंने मेहमूद से फिल्म 'पड़ोसन' में लिया- डबल पैसा लेकर।

खंडवे वाले की राम-राम
किशोर कुमार ने जब-जब स्टेज-शो किए, हमेशा हाथ जोड़कर सबसे पहले संबोधन करते थे-'मेरे दादा-दादियों।' मेरे नाना-नानियों। मेरे भाई-बहनों, तुम सबको खंडवे वाले किशोर कुमार का राम-राम। नमस्कार।
एक दर्जन बच्चे
किशोर ने अपनी दूसरी बीवी मधुबाला से शादी के बाद मजाक में कहा था-'मैं दर्जनभर बच्चे पैदा कर खंडवा की सड़कों पर उनके साथ घूमना चाहता हूँ।'

हरफनमौला : गीतों का झोला
किशोर कुमार का बचपन तो खंडवा में बीता, लेकिन जब वे किशोर हुए तो के क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ने आए। हर सोमवार सुबह खंडवा से मीटरगेज की छुक-छुक रेलगाड़ी में इंदौर आते और शनिवार शाम लौट जाते। सफर में वे हर स्टेशन पर डिब्बा बदल लेते और मुसाफिरों को नए-नए गाने सुनाकर मनोरंजन करते थे।
खंडवा की दूध-जलेबी
किशोर कुमार जिंदगीभर कस्बाई चरित्र के भोले मानस बने रहे। मुंबई की भीड़-भाड़, पार्टियाँ और ग्लैमर के चेहरों में वे कभी शामिल नहीं हो पाए। इसलिए उनकी आखिरी इच्छा थी कि खंडवा में ही उनका अंतिम संस्कार किया जाए। इस इच्छा को पूरा किया गया, वे कहा करते थे-'फिल्मों से संन्यास लेने के बाद वे खंडवा में ही बस जाएँगे और रोजाना दूध-जलेबी खाएँगे।

 

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