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सनी देओल-राजकुमार संतोषी: ‘घायल’ से ‘बंटवारा’ तक, दोस्ती, दुश्मनी और फिर 30 साल बाद वही जादू

सनी देओल-राजकुमार संतोषी: ‘घायल’ से ‘बंटवारा 1947’ तक, दोस्ती, दुश्मनी और फिर 30 साल बाद वही जादू
सनी देओल-राजकुमार संतोषी: ‘घायल’ से ‘बंटवारा 1947’ तक, दोस्ती, दुश्मनी और फिर 30 साल बाद वही जादू
कुछ रिश्ते फिल्मों से बनते हैं, कुछ फिल्में रिश्तों को अमर कर देती हैं। सनी देओल और राजकुमार संतोषी का रिश्ता भी कुछ ऐसा ही है। एक तरफ सनी देओल का आक्रोश, आवाज और पर्दे पर फूट पड़ने वाला गुस्सा था, तो दूसरी तरफ राजकुमार संतोषी का ऐसा निर्देशन, जो उस गुस्से के पीछे छिपे दर्द को भी सामने ले आता था। दोनों जब साथ आए तो ‘घायल’, ‘दामिनी’ और ‘घातक’ जैसी फिल्में बनीं। लेकिन फिर एक ऐसा मोड़ आया, जिसने दोनों को एक-दूसरे से दूर कर दिया।
 
करीब तीन दशक तक दोनों ने साथ काम नहीं किया। रिश्ते में आई दरार इतनी गहरी थी कि लगा यह जोड़ी अब शायद कभी साथ नहीं आएगी। लेकिन सिनेमा की दुनिया में कुछ कहानियों का अंत इतनी आसानी से नहीं होता। ‘गदर 2’ की जबरदस्त सफलता के बाद आमिर खान की एक मुलाकात ने सनी देओल और राजकुमार संतोषी को फिर आमने-सामने ला खड़ा किया। अब ‘बंटवारा 1947’ के साथ दोनों एक बार फिर साथ हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस कहानी में जितना सिनेमा है, उतना ही रिश्ता भी।
 

जब संतोषी कहानी लेकर सनी के पास पहुंचे

सनी देओल और राजकुमार संतोषी की पहली मुलाकात उस दौर में हुई थी, जब संतोषी खुद संघर्ष कर रहे थे। उनके पास ‘घायल’ की कहानी थी। दिलचस्प बात यह है कि संतोषी कभी इस फिल्म को कमल हासन के साथ बनाना चाहते थे। लेकिन जब उन्होंने कहानी सनी देओल को सुनाई तो सनी को यह बेहद पसंद आई।
 
समस्या यह थी कि फिल्म बनाने के लिए कोई निर्माता तैयार नहीं था। कहानी पसंद आने के बावजूद पैसे लगाने वाला कोई नहीं मिला। ऐसे में सनी देओल ने अपने पिता धर्मेंद्र से इजाजत ली और अपने घरेलू बैनर विजयेता फिल्म्स के तहत ‘घायल’ को प्रोड्यूस करने का फैसला किया। यह सिर्फ एक फिल्म में अभिनय करने का फैसला नहीं था, बल्कि एक ऐसे निर्देशक पर भरोसा था जिसने अभी तक एक फिल्म भी निर्देशित नहीं की थी। यहीं से सनी और संतोषी की वह साझेदारी शुरू हुई, जिसने आगे चलकर हिंदी सिनेमा को कई यादगार पल दिए।
 

‘घायल’ ने बदल दी सनी देओल की तस्वीर

1990 में रिलीज हुई ‘घायल’ से पहले सनी देओल का करियर उस ऊंचाई पर नहीं था, जिसकी उनसे उम्मीद की जा रही थी। लेकिन ‘घायल’ ने सब बदल दिया।
 
फिल्म का ढांचा पूरी तरह व्यावसायिक था, लेकिन इसकी कहानी, निर्देशन और अभिनय में ऐसी ताकत थी कि समीक्षकों ने भी इसे सराहा। सनी देओल के अभिनय को पहली बार उस गंभीरता से देखा गया, जिसकी वह लंबे समय से तलाश कर रहे थे। राजकुमार संतोषी ने सनी की उस छवि को इस्तेमाल किया, जिसमें उनका गुस्सा और ताकत तो थी, लेकिन उसके पीछे एक संवेदनशील और आहत इंसान भी दिखाई देता था।
 
‘घायल’ बड़ी सफलता बनी और सनी देओल का सितारा मजबूती से चमक उठा। संतोषी के लिए भी यह शुरुआत असाधारण थी। सनी ने जिस निर्देशक पर भरोसा किया था, उसने उस भरोसे को यादगार फिल्म में बदल दिया।
 

‘दामिनी’ में हीरो कोई और था, लेकिन छा गए सनी

इसके बाद 1993 में ‘दामिनी’ आई। कागज पर इस फिल्म के नायक ऋषि कपूर थे और सनी देओल की भूमिका अपेक्षाकृत छोटी थी। लेकिन संतोषी ने सनी के लिए ऐसा किरदार गढ़ा, जिसने पूरी फिल्म का असर बदल दिया।
 
अदालत में गूंजता उनका आक्रोश, उनकी आवाज और संवाद बोलने का अंदाज दर्शकों के जेहन में बस गया। ‘तारीख पर तारीख’ और ‘ढाई किलो का हाथ’ जैसे संवाद आज भी सनी देओल की पहचान का हिस्सा हैं। यह भी दिलचस्प है कि ‘दामिनी’ में सनी की भूमिका शुरू से उनके लिए तय नहीं थी। बाद में वह इस किरदार में आए और इतिहास बन गया। संतोषी ने भी बाद में इस बात का जिक्र किया था कि भूमिका के लिए पहले दूसरे कलाकार पर विचार हुआ था।
 
यानी सनी-संतोषी की जोड़ी सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर नहीं चल रही थी, बल्कि एक-दूसरे की ताकत को समझकर उसे पर्दे पर कई गुना बढ़ा रही थी।
 

भाई बॉबी की लॉन्चिंग भी संतोषी के भरोसे

संतोषी के काम से सनी इतने प्रभावित थे कि उन्होंने अपने छोटे भाई बॉबी देओल की लॉन्चिंग की जिम्मेदारी भी उन्हें सौंप दी। फिल्म थी ‘बरसात’। 
 
फिल्म का निर्देशन पहले शेखर कपूर करने वाले थे, लेकिन बाद में कुछ मतभेदों के कारण यह जिम्मेदारी राजकुमार संतोषी के पास आ गई। संतोषी एक तरफ ‘बरसात’ पर काम कर रहे थे और दूसरी तरफ सनी देओल के साथ ‘घातक’ की तैयारी भी चल रही थी। लेकिन यहीं से दोनों के रिश्ते में पहली बड़ी दरार की शुरुआत हुई।
 

‘बरसात’ के दौरान उभरे रचनात्मक मतभेद

‘बरसात’ की शूटिंग के दौरान सनी देओल और राजकुमार संतोषी के बीच फिल्म को लेकर रचनात्मक मतभेद उभरने लगे। सनी को लगता था कि फिल्म जिस दिशा में जा रही है, वह उनकी सोच के मुताबिक नहीं है। धीरे-धीरे उन्होंने फिल्म की प्रक्रिया में दखल देना शुरू किया।
 
संतोषी अपनी शैली में फिल्म बनाना चाहते थे और सनी की अपनी अपेक्षाएं थीं। नतीजा यह हुआ कि फिल्म पूरी तो हुई, लेकिन दोनों के बीच पहले जैसी सहजता नहीं रही। 1995 में ‘बरसात’ रिलीज हुई, लेकिन इसके बनने की प्रक्रिया ने दोनों के रिश्ते पर असर डाल दिया।
 
इसके बावजूद दोनों की अगली फिल्म ‘घातक’ थी और यही वह फिल्म थी जिसने साबित कर दिया कि व्यक्तिगत मतभेदों के बावजूद पर्दे पर यह जोड़ी कितनी विस्फोटक हो सकती है।

‘घातक’ ने फिर दिखाया दोनों का जादू

1996 में आई ‘घातक’ में सनी देओल एक बार फिर अपने पूरे तेवर में दिखाई दिए। राजकुमार संतोषी का कसा हुआ निर्देशन और सनी का उबलता हुआ गुस्सा, दोनों ने मिलकर फिल्म को अलग स्तर पर पहुंचा दिया।
 
काशी के किरदार में सनी देओल की आक्रामकता के साथ-साथ उसकी भावनात्मक कमजोरी भी दिखाई दी। फिल्म को दर्शकों ने हाथोंहाथ लिया और यह जोड़ी एक बार फिर सफल साबित हुई।
 
‘घायल’, ‘दामिनी’ और ‘घातक’, इन तीन फिल्मों ने सनी देओल के करियर की सबसे यादगार भूमिकाओं में जगह बनाई। यही वजह थी कि उस समय यह मानना स्वाभाविक था कि सनी देओल और राजकुमार संतोषी आगे भी साथ मिलकर कई बड़ी फिल्में बनाएंगे। लेकिन कहानी ने अचानक ऐसा मोड़ लिया, जिसकी शायद किसी ने कल्पना नहीं की थी।
 

‘भगत सिंह’ बना दोस्ती में दरार की वजह

संतोषी और सनी के रिश्ते में सबसे गहरी दरार ‘भगत सिंह’ को लेकर आई। सनी देओल चाहते थे कि संतोषी भगत सिंह पर बनने वाली फिल्म में उनके भाई बॉबी देओल को मुख्य भूमिका में लें। संतोषी ने यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। 
 
उन्होंने बाद में अजय देवगन के साथ ‘द लीजेंड ऑफ भगत सिंह’ बनाई। सनी ने इसके बाद बॉबी देओल के साथ ‘23 मार्च 1931: शहीद’ बनाई। दोनों फिल्में एक ही दिन रिलीज हुईं और यह टकराव बॉलीवुड की चर्चित घटनाओं में शामिल हो गया। यह सिर्फ दो फिल्मों की रिलीज की होड़ नहीं थी। इसके पीछे वर्षों की दोस्ती और साझेदारी का टूटना था।
 
दोनों फिल्मों से जिस तरह की सफलता की उम्मीद की जा रही थी, वैसा परिणाम नहीं आया। लेकिन इस टकराव का सबसे बड़ा नुकसान शायद उन दर्शकों का हुआ, जो सनी देओल और राजकुमार संतोषी की एक और फिल्म का इंतजार कर रहे थे। इसके बाद दोनों की राहें अलग हो गईं।
 

दोनों अपने-अपने रास्ते पर चले, लेकिन कुछ अधूरा रह गया

राजकुमार संतोषी ने दूसरे कलाकारों के साथ काम करना शुरू किया। ‘लज्जा’, ‘पुकार’ और ‘खाकी’ जैसी फिल्मों से उन्हें प्रशंसा मिली। हालांकि वह अपने शुरुआती दौर जैसी लगातार बड़ी व्यावसायिक सफलता हासिल नहीं कर सके। 2009 में रणबीर कपूर और कैटरीना कैफ की ‘अजब प्रेम की गजब कहानी’ ने उन्हें फिर बड़ी व्यावसायिक सफलता दिलाई।
 
दूसरी तरफ सनी देओल का करियर भी 2010 के बाद लगातार उतार-चढ़ाव से गुजरता रहा। उनकी कई फिल्में अपेक्षित सफलता नहीं पा सकीं। ऐसा लगा जैसे 90 के दशक का वह सितारा धीरे-धीरे पीछे छूट रहा है।
 
फिर आई ‘गदर 2’। इस फिल्म ने न सिर्फ सनी देओल के करियर को फिर से नई ऊर्जा दी, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि दर्शकों के बीच उनकी पकड़ आज भी उतनी ही मजबूत है।
 

आमिर खान ने कराई बरसों पुरानी दोस्ती की वापसी

‘गदर 2’ की सफलता के बाद सनी देओल ने अपने घर पर एक पार्टी रखी थी, जिसमें आमिर खान भी शामिल हुए। पार्टी के बाद आमिर ने सनी से कहा कि वह उनके साथ एक फिल्म करना चाहते हैं और उन्हें अगले दिन अपने कार्यालय आने के लिए कहा।
 
यहीं से कहानी ने फिर एक नया मोड़ लिया।
 
आमिर खान ने सनी देओल और राजकुमार संतोषी की मुलाकात कराई। करीब तीन दशक पुराने मतभेदों के बावजूद दोनों उस उम्र और मुकाम पर पहुंच चुके थे, जहां पुराने अहंकार को ढोने का कोई अर्थ नहीं था। शायद दोनों को यह भी अहसास था कि उनके साथ आने से हिंदी सिनेमा को जो मिला था, वह उनके अलग होने के बाद फिर कभी उसी रूप में नहीं मिला।
 
संतोषी के पास एक कहानी थी, असगर वजाहत के चर्चित नाटक ‘जिस लाहौर नई वेख्या, ओ जम्या ई नई’ से प्रेरित कहानी। सनी ने कहानी सुनी और तैयार हो गए।
 

20 साल से जिस फिल्म का इंतजार था, वह सनी के साथ बनी

राजकुमार संतोषी इस विषय पर लंबे समय से फिल्म बनाने की कोशिश कर रहे थे। करीब दो दशक से यह कहानी उनके मन में थी, लेकिन किसी न किसी वजह से फिल्म आगे नहीं बढ़ पा रही थी।
 
आखिरकार वह फिल्म सनी देओल के साथ बनी। आमिर खान प्रोड्यूसर के रूप में जुड़े और फिल्म का ऐलान हुआ। शुरुआत में इसका नाम ‘लाहौर 1947’ था, लेकिन बाद में इसका नाम बदलकर ‘बंटवारा 1947’ कर दिया गया।
 
कितना दिलचस्प संयोग है, सनी और राज के रिश्ते की दरार को बंटवारा नामक फिल्म ने भरा और फिर साथ ला दिया।
 

अब सवाल है, क्या चौथी बार भी चलेगा जादू?

सनी देओल और राजकुमार संतोषी की पिछली तीन बड़ी साझेदारियां, ‘घायल’, ‘दामिनी’ और ‘घातक’, आज भी हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार अध्यायों में गिनी जाती हैं। दोनों की जोड़ी ने सनी की आक्रामक छवि को सिर्फ एक्शन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसमें भावनाओं, दर्द और अभिनय की गहराई भी जोड़ी। और अब करीब तीन दशक बाद दोनों फिर साथ हैं।
 
‘बंटवारा 1947’ का ट्रेलर सामने आ चुका है और फिल्म 14 अगस्त 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है। फिल्म असगर वजाहत के नाटक से प्रेरित है और आमिर खान प्रोडक्शंस के बैनर तले बनी है।
 
इस बार कहानी सिर्फ 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन की नहीं है। यह दो ऐसे फिल्मकारों के दोबारा मिलने की कहानी भी है, जिनकी दोस्ती कभी ‘घायल’ से शुरू हुई थी, ‘दामिनी’ और ‘घातक’ तक पहुंची, फिर ‘भगत सिंह’ को लेकर टूट गई और अब ‘बंटवारा 1947’ के साथ फिर जुड़ गई है।
 
अब सिर्फ एक सवाल बाकी है कि क्या सनी देओल और राजकुमार संतोषी की यह चौथी साझेदारी भी ‘घायल’, ‘दामिनी’ और ‘घातक’ जैसा जादू दोहरा पाएगी? जवाब के लिए 14 अगस्त तक इंतजार करना होगा।
लेखक के बारे में
समय ताम्रकर
समय ताम्रकर फिल्म समीक्षक हैं, जो फिल्म, कलाकार, निर्देशक, बॉक्स ऑफिस और फिल्मों से जुड़े पहलुओं पर गहन विश्लेषणात्मक लेख लिखते हैं।.... और पढ़ें
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