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जवाहरलाल नेहरू और सोमनाथ मंदिर का कनेक्शन क्या है?

Updated: गुरुवार, 30 नवंबर 2017 (11:46 IST)
29 नवंबर की दोपहर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी गुजरात के सोमनाथ मंदिर पहुंचे और बवाल खड़ा हो गया। बवाल ये कि उनका नाम दूसरे कांग्रेसी नेता अहमद पटेल के साथ उस रजिस्टर में लिखा गया जिसमें ग़ैर-हिंदुओं के नाम होते हैं। लेकिन बड़ा बवाल इससे पहले शुरू हो गया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वेबसाइट के टि्वटर हैंडल पर उनके हवाले से लिखा गया, ''अगर सरदार पटेल ना होते तो सोमनाथ में मंदिर संभव ना होता।''
 
मोदी का राहुल पर हमला
''आज कुछ लोग सोमनाथ को याद कर रहे हैं। मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि आप इतिहास भूल गए हैं क्या? आपके परिवार के सदस्य, हमारे पहले प्रधानमंत्री यहां मंदिर बनाने के पक्ष में ही नहीं थे।''
 
आगे लिखा गया है, ''जब डॉ. राजेंद्र प्रसाद को यहां सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन करने के लिए आना था, तो इस पर पंडित नेहरू ने नाख़ुशी जताई थी।'' ''सरदार पटेल ने नर्मदा का ख़्वाब देखा था, लेकिन आपके परिवार ने उनका ये ख़्वाब पूरा होने नहीं दिया।''
 
नेहरू का क्या लेना-देना है?
गुजरात में चुनाव होने हैं और दोनों पक्ष हमलावर हैं। लेकिन पीएम राहुल गांधी के सोमनाथ मंदिर पहुंचने पर इतना भड़के क्यों? प्रधानमंत्री देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का ज़िक्र क्यों कर रहे थे? क्या वाक़ई उनकी बातों में दम है?
 
इन सभी सवालों के जवाब तलाशने के लिए देश की आज़ादी और उसके बाद के दौर में झांकना होगा। आज़ादी से पहले जूनागढ़ रियासत के नवाब ने 1947 में पाकिस्तान के साथ जाने का फ़ैसला किया था।
 
सोमनाथ पर गांधी क्या बोले?
भारत ने उनका ये फ़ैसला स्वीकार करने के इनकार कर दिया और उसे भारत में मिला लिया गया। भारत के तत्कालीन उप-प्रधानमंत्री सरदार पटेल 12 नवंबर, 1947 को जूनागढ़ पहुंचे। उन्होंने भारतीय सेना को इस क्षेत्र को स्थिर बनाने निर्देश दिए और साथ ही सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का आदेश दिया।
सरदार पटेल, केएम मुंशी और कांग्रेस के दूसरे नेता इस प्रस्ताव के साथ महात्मा गांधी के पास गए। ऐसा बताया जाता कि महात्मा गांधी ने इस फ़ैसले का स्वागत किया, लेकिन ये भी सुझाव दिया कि निर्माण के खर्च में लगने वाला पैसा आम जनता से दान के रूप में इकट्ठा किया जाना चाहिए, ना कि सरकारी ख़ज़ाने से दिया जाना चाहिए।
 
गांधी, पटेल के बाद क्या हुआ?
लेकिन इसके कुछ वक़्त बाद ही महात्मा गांधी की हत्या हो गई और सरदार पटेल भी नहीं रहे। मंदिर को दुरुस्त करने की ज़िम्मेदारी केएम मुंशी पर आ गई जो नेहरू सरकार में खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री थे। साल 1950 के अक्टूबर में सोमनाथ मंदिर के ख़स्ताहाल हिस्सों को ढहाया गया और वहां मौजूद मस्जिद के जैसे ढांचे को कुछ किलोमीटर दूर सरकाया गया।
 
केएम मुंशी के निमंत्रण पर मई, 1951 में भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद सोमनाथ मंदिर पहुंचे थे और उन्होंने कहा था, ''सोमनाथ मंदिर इस बात का परिचायक है कि पुनर्निर्माण की ताक़त हमेशा तबाही की ताक़त से ज़्यादा होती है।''
 
नेहरू ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद को रोका था?
अब वो बात जहां सोमनाथ मंदिर की कहानी नेहरू से जुड़ती है। दरअसल, नेहरू ने राजेंद्र प्रसाद को वहां ना जाने की सलाह दी थी। उनका मानना था कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और राष्ट्रपति के किसी मंदिर के कार्यक्रम में जाने से ग़लत संकेत जाएगा। हालांकि, डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने उनकी राय नहीं मानी।
 
नेहरू ने ख़ुद को सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार और पुनर्निर्माण से अलग रखा था और सौराष्ट्र के मुख्यमंत्री को पत्र तक लिखा था। उन्होंने कहा था कि सोमनाथ मंदिर परियोजना के लिए सरकारी फ़ंड का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। क़रीब 70 बरस पहले हुई घटना आज सियासी बवाल मचा रही है, क्योंकि गुजरात में चुनाव प्रचार कर रहे राहुल गांधी मंदिरों का दौरा कर रहे हैं और सोमनाथ मंदिर जाने का उनका फ़ैसला भाजपा के गले नहीं उतर रहा।

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