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ग्राउंड रिपोर्ट: क्या है सीतापुर में "आदमखोर कुत्तों" के होने का रहस्य

Updated: शनिवार, 12 मई 2018 (12:03 IST)
नितिन श्रीवास्तव (सीतापुर से)
 
उत्तर प्रदेश के सीतापुर ज़िले में आवारा या जंगली कुत्तों का ख़ौफ़ बरकरार है। पिछले छह महीनों में 12 बच्चों की कुत्तों के हमले में मौत हो चुकी है, दर्जनों घायल हैं और गाँवों में लोग घरों से बाहर निकलने में घबरा रहे हैं। हरे-भरे दशहरी आम के बागों से गुज़रने में पहले कभी इतना डर नहीं लगा। हाथों में लाठी लिए तीन हट्टे-कट्टे नौजवान मुझे उस पेड़ के तने तक ले गए जहाँ आज भी ख़ून के धब्बे मौजूद हैं।
 
 
क्या है मामला?
क़रीब डेढ़ हफ़्ते पहले 11 साल के ख़ालिद अली तड़के सुबह स्कूल के लिए निकले थे और रास्ते के इसी बाग में आम चुन रहे थे। उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि पांच आवारा कुत्तों का एक झुंड घात लगाए बैठा है।
 
"मैंने बगल वाले बाग से चीख़ें सुनीं। भाग कर गया और जो देखा वो डरावना था। एक ज़ख़्मी बच्चा पेड़ पर चढ़ने की कोशिश कर रहा था और पांच कुत्ते उसके पैरों में दांत गड़ाए नीचे खींच रहे थे। मैं मदद के लिए चिल्लाता हुआ गाँव की तरफ़ भागा", 65 साल के अमीन अहमद ने याद करते हुए बताया।
 
 
गाँववालों के पहुंचने तक ख़ालिद ने दम तोड़ दिया था। 'आदमख़ोर कुत्ते' जंगलों में गायब हो चुके थे। ख़ालिद का परिवार सदमे से बाहर नहीं निकल सका है। "उसकी मौत पेड़ के नीचे ही हो गई थी। शरीर के कई अंग नहीं थे और अस्पताल ले जाने का कोई मतलब नहीं था", बिलखती हुई माँ महज़बीं ने बताया।
 
लेकिन 1 मई के दिन सिर्फ़ ख़ालिद पर ही हमला नहीं हुआ था। उसी दिन ख़ैराबाद इलाके के 20 किलोमीटर दायरे में दो और बच्चों पर कुत्तों ने हमला बोला और उनकी जान गई। करीब एक दर्जन बच्चे गंभीर रूप से घायल भी हुए। फिलहाल इलाके के सभी लोगों ने बच्चों को स्कूल भेजना बंद कर दिया है।
अफ़वाहों का बाज़ार गर्म
इस बात का पता किसी को नहीं चल रहा है कि एकाएक इलाके के कुत्ते बच्चों पर हमला क्यों करने लगे हैं। ज़्यादातर स्थानीय लोग इलाके के एक बंद हो चुके अवैध बूचड़खाने को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं। उनके मुताबिक़ आवारा कुत्तों को यहाँ से भोजन मिलता था और 'इसके बंद होने के बाद कुत्ते हिंसक हो चुके हैं।'
 
 
हालांकि इस दलील में दम इसलिए नहीं दिखता क्योंकि सरकार ने इसे साल भर पहले ही बंद करा दिया था जबकि बच्चों पर हमले छह महीने पहले शुरू हुए हैं। इलाके में अफ़वाहों का बाज़ार भी गर्म है।
 
हमलावरों की पहचान की कोशिशें जारी
इसमें एक ये भी है कि "जंगलों से आदमखोर कुत्तों की नस्ल निकली है और हमला कर रही है।" साबिर अली का भतीजा एक ऐसे ही हमले का शिकार हुआ था। उन्हें लगता है, "जिन कुत्तों ने हमला किया था वो सड़कों पर घूमने वाले आवारा कुत्तों से थोड़े अलग थे और उनके जबड़े सियार की तरह थे।"
 
 
वर्ल्ड वाइल्डलाइफ़ फंड और भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान की टीमें इलाके का दौरे कर रही हैं जिससे हमला करने वालों की 'असल पहचान' हो सके।
 
आखिर कौन हो सकते हैं हमलावर?
एनिमल वेलफ़ेयर बोर्ड ऑफ़ इंडिया के चीफ़ ट्रेनर विवेक शर्मा भी ज़िले में चश्मदीदों से मिलकर शिनाख्त करने में जुटे हैं। उन्होंने बताया, "मुझे हैरानी नहीं होगी अगर ये पता चले कि हमला कुत्ते नहीं बल्कि भेड़िये कर रहे हैं। अगर भेड़ियों में रेबीज़ की बीमारी हो जाती है तो वे एक से 20 किलोमीटर तक के दायरे में घूमकर शिकार करने लगते हैं। उनका निशाना बच्चे ही होते हैं।"
पिछले तीन दशकों में उत्तर प्रदेश और पड़ोसी बिहार में इस तरह के कुछ मामले दर्ज किए गए थे जिनमें जंगली भेड़ियों ने जान-माल को नुकसान पहुंचाया था। लखनऊ के जाने-माने डॉग-ब्रीडर असग़र जमाल का मानना है कि कुत्तों का सियार या भेड़ियों के साथ प्रजनन होना भी एक वजह हो सकती है। उनके मुताबिक़, "शायद इस वजह से कुछ ऐसे कुत्ते पैदा हो गए हों जिनमें शिकारी हाउंड जैसे कुत्तों की नस्ल वाले लक्षण आ गए हों।"
 
 
क्या है प्रशासन का कहना?
स्थानीय प्रशासन इस तरह के तर्क या कयासों से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता और मामले की तह तक पहुँचने का दावा कर रहा है। सीतापुर ज़िले के पुलिस प्रमुख आनंद कुलकर्णी के अनुसार, "लगभग सभी चश्मदीद कुत्तों के हमले की बात दोहरा रहे हैं और हमने 50 के करीब कुत्ते पकड़ भी लिए हैं। विशेषज्ञ उनके व्यवहार की जांच कर रहे हैं।"
 
जिन कुत्तों को अभी तक मारा गया है या जिन्हें पकड़ा गया है वो तो उत्तर भारत में पाए जाने वाले आवारा कुत्तों की तरह ही हैं। लेकिन जवाबी हमलों का एक ख़तरनाक सिलसिला भी शुरू हो चुका है। हाथों में लाठियां और बंदूकें लिए करीब पांच गाँव के लोग गश्ती दल बनाकर दिन-रात कुत्तों को मारने-पकड़ने के लिए घूम रहे हैं।
 
 
गुरपलिया गाँव के रहने वाले वसी खान भी ऐसे ही एक दल का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा, "ये जंगली कुत्ते होते हैं और इन्हें पैदल भाग कर पकड़ना आसान नहीं। लेकिन पिछले एक हफ़्ते में ही हमने छह कुत्ते मारे हैं। हम लोग झुंड में चलते हैं और इनकी तलाश में जंगलों के भीतर जाते हैं।
 
मीडिया में लगातार आ रही ख़बरों के बाद प्रशासन ने भी कुत्तों को पकड़ने की मुहिम तेज़ कर दी है। 13 टीमें कुत्तों की तलाश कर रही हैं और इनको ड्रोन कैमरों के अलावा वायरलेस सेट्स और नाइट विज़न उपकरण भी दिए गए हैं। लेकिन जिन लोगों ने अपनों को खो दिया है उनकी ज़िन्दगी पटरी पर कब लौटेगी, इसका पता किसी को नहीं।
 
 
एक मृतक बच्चे की माँ ने कहा, "अगर मुझे इन हमलों का पता होता तो अपने नौ साल के बेटे को घर के भीतर ताले में बंद रखती।"

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