भारत को 'सबक सिखाना' चाहते थे माओ

पुनः संशोधित सोमवार, 9 सितम्बर 2019 (16:23 IST)

-रेहान फ़ज़ल
माओ के बारे में मशहूर था कि उनका दिन रात में शुरू होता था। वह लगभग पूरी रात काम किया करते थे और सुबह तड़के सोने के लिए जाते थे। उनका अधिकतर समय उनके बिस्तर पर व्यतीत होता था। यहां तक कि खाना भी वो बिस्तर पर ही खाते थे। उनका पलंग हमेशा उनके साथ जाता था। ट्रेन में भी उनके लिए ख़ास तौर से वो पलंग लगाया जाता था।
 
यहां तक कि जब वो 1957 में मॉस्को गए तो उस पलंग को जहाज़ से मॉस्को पहुंचाया गया क्योंकि माओ किसी और पलंग पर सो ही नहीं सकते थे। घर पर वो सिर्फ़ एक नहाने वाला गाउन पहनते थे और नंगे पैर रहते थे।
 
स्थित भारतीय दूतावास में उस वक्त जूनियर अफ़सर रहे नटवर सिंह बताते हैं कि 1956 में जब लोकसभा अध्यक्ष आयंगर के नेतृत्व में का संसदीय प्रतिनिधिमंडल चीन पहुंचा तो उसे एक रात साढ़े दस बजे बताया गया कि चेयरमैन माओ उनसे रात 12 बजे मुलाक़ात करेंगे।
माओ ने एक-एक करके सभी सांसदों से हाथ मिलाया। शुरू में माओ मूड में नहीं थे और एक दो लफ़्ज़ों में आयंगर के सवालों के जवाब दे रहे थे, लेकिन थोड़ी देर बाद वह खुल गए। आयंगर ने जब कहा कि आज़ादी के बाद का भारत एक ढोल की तरह था जिसे रूस और अमेरिका दोनों तरफ़ से बजाते रहते थे, तो माओ ने ज़ोर का ठहाका लगाया।
 
राधाकृष्णन ने थपथपाया माओ का गाल : पूरी बैठक के दौरान माओ एक के बाद एक सिगरेट जलाते रहे। जब वहां मौजूद भारतीय राजदूत आरके नेहरू ने भी अपने मुंह में सिगरेट लगाई तो माओ ने खड़े होकर ख़ुद दियासलाई से उनकी सिगरेट जलाई। माओ के इस जेस्चर पर वहां मौजूद भारतीय सांसद और राजनयिक दंग रह गए।
 
अगले साल जब भारत के उप-राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन चीन आए तो माओ ने अपने निवास चुंग नान हाई के आंगन के बीचों-बीच आकर उनकी अगवानी की। जैसे ही दोनों ने हाथ मिलाया राधाकृष्णन ने माओ के गाल को थपथपा दिया।
dr. sarvepalli radhakrishnan
इससे पहले कि वह इस बेतक्कलुफ़ी पर अपने ग़ुस्से या आश्चर्य का इज़हार कर पाते भारत के उप-राष्ट्रपति ने ज़बरदस्त पंच लाइन कही, "अध्यक्ष महोदय, परेशान मत होइए। मैंने यही स्टालिन और पोप के साथ भी किया है।" भोज के दौरान माओ ने खाते-खाते बहुत मासूमियत से अपनी चॉपस्टिक से अपनी प्लेट से खाने का एक कोर उठाकर राधाकृष्णन की प्लेट में रख दिया।
 
माओ को इसका अंदाज़ा ही नहीं था कि राधाकृष्णन पक्के शाकाहारी हैं। राधाकृष्णन ने भी माओ को यह आभास नहीं होने दिया कि उन्होंने कोई नागवार चीज़ की है। उस समय राधाकृष्णन की उंगली में चोट लगी हुई थी। चीन की यात्रा से पहले कंबोडिया के दौरे के दौरान उनके एडीसी की ग़लती की वजह से उनका हाथ कार के दरवाज़े के बीच आ गया था और उनकी उंगली की हड्डी टूट गई थी। माओ ने इसे देखते ही तुरंत अपना डॉक्टर बुलवाया और उसने नए सिरे से उनकी मरहम पट्टी की।
 
कभी भी मुलाकात का बुलावा भेजते थे : जब भी कोई विदेशी राष्ट्राध्यक्ष चीन आता था, उससे माओ की मुलाक़ात पहले से तय नहीं की जाती थी। माओ का जब मन होता था, उन्हें बुला भेजते थे, जैसे वो उन पर बहुत बड़ा उपकार कर रहे हों।
 
पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर अपनी आत्मकथा ईयर्स ऑफ़ रिनिउअल में लिखते हैं, "मैं चीनी प्रधानमंत्री चाउ एन लाई से बात कर रहा था कि अचानक वो कहते थे कि चेअरमैन माओ आपका इंतज़ार कर रहे हैं। उन्हें इस बात की फ़िक्र नहीं थीं कि हम उनसे मिलने के लिए तैयार हैं या नहीं। हमारे साथ किसी अमेरिकी सुरक्षाकर्मी को जाने की इजाज़त नहीं होती थी। जब हमारी माओ से मुलाक़ात हो जाती थी तब प्रेस को बताया जाता था कि ऐसा हो गया है।"
 
किसिंजर आगे लिखते हैं, "हमें सीधे माओ की स्टडी में ले जाया जाता था। उसकी तीन दीवारें किताबों से अटी पड़ी होती थीं। कुछ किताबें मेज़ पर और कुछ तो ज़मीन पर भी रखी होती थीं। सामने एक वी शेप की मेज़ होती थी जिस पर उनका जैसमीन टी का प्याला रखा होता था। उसके बगल में ही माओ का उगलदान होता था। मेरी पहली दो मुलाक़ातों में तो वहां एक लकड़ी का पलंग भी पड़ा रहता था। दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाले देश के सबसे ताक़तवर शासक की स्टडी में कम से कम मुझे तो विलासिता और बादशाहत के प्रतीकों की एक भी झलक नहीं दिखाई दी।"
 
"कमरे के बीचोंबीच एक कुर्सी पर बैठे हुए माओ उठकर मेरा स्वागत करते थे। उनकी मदद करने के लिए उनकी बग़ल में दो महिला अटेंडेंट खड़ी रहती थीं। वो मेरी तरफ़ मुस्कुरा कर इस गहरी निगाह से देखते थे मानो ख़बरदार कर रहे हों कि इस छलकपट के चैंपियन को मूर्ख बनाने की कोशिश करना फ़िज़ूल होगा। 1971 में जब राष्ट्रपति निक्सन ने माओ से दुनिया की कुछ घटनाओं पर बातचीत करनी चाही तो माओ बोले, 'बातचीत? इसके लिए तो आपको हमारे प्रधानमंत्री के पास जाना पड़ेगा। मुझसे तो आप सिर्फ दार्शनिक मुद्दों पर बात कर सकते हैं।"
 
नहाना पसंद नहीं था : माओ के डॉक्टर रह चुके ज़ी शी ली ने माओ के निजी जीवन के बारे में बहुचर्चित किताब लिखी है, द प्राइवेट लाइफ़ ऑफ़ चेयरमैन माओ। उसमें वो लिखते हैं, "माओ ने अपने जीवन में अपने दांतों पर कभी ब्रश नहीं किया। जब वो रोज़ उठते थे तो दातों को साफ़ करने के लिए वो रोज़ चाय का कुल्ला किया करते थे। एक समय ऐसा आ गया था कि उनके दाँत इस तरह दिखाई देते थे जैसे उन पर हरा पेंट कर दिया गया हो।"
 
माओ को नहाने से भी बहुत नफ़रत थी। हां, तैरने के वो बहुत शौक़ीन थे और अपने आप को तरोताज़ा रखने के लिए गर्म तौलिए से स्पंज बाथ लिया करते थे।
 
ली लिखते हैं कि निक्सन से मुलाक़ात के समय माओ इतने मोटे हो गए थे कि उनके लिए एक नया सूट सिलवाया गया क्योंकि उनके पुराने सूट उन्हें फ़िट ही नहीं आ रहे थे। उनकी नर्स ज़ाऊ फ़्यू मिंग ने उनकी दाढ़ी बनाई और उनके बाल काटे। निक्सन के साथ उनकी मुलाक़ात के लिए सिर्फ़ 15 मिनट निर्धारित थे लेकिन ये बातचीत 65 मिनट तक चली। जैसे ही निक्सन कमरे से बाहर गए माओ ने अपना सूट उतार कर अपना पुराना बाथ रोब पहन लिया।
 
माओ वैसे तो जूते पहनते नहीं थे। अगर पहनते भी थे तो कपड़े के जूते। औपचारिक मौक़ों पर जब उन्हें चमड़े के जूते पहनने होते थे तो वो पहले उसे अपने सुरक्षा गार्ड को उसे पहनने के लिए देते थे ताकि वो ढीले हो जाएं।
 
माओ की एक और जीवनीकार जंग चैंग लिखती हैं कि माओ की ग़ज़ब की याददाश्त थी। पढ़ने-लिखने के वो बहुत शौकीन थे। उनके शयनकक्ष में उनके पलंग के आधे हिस्से पर एक फ़ुट की ऊंचाई तक चीनी साहित्यिक किताबें पड़ी रहती थीं। उनके भाषणों और लेखन में अक्सर उन किताबों से लिए गए उद्धरणों का इस्तेमाल होता था। वो अक्सर मुड़े-तुड़े कपड़े पहनते थे और उनके मोज़ों में छेद हुआ करते थे।
 
1962 के भारत चीन युद्ध में माओ की बहुत बड़ी भूमिका थी। वो भारत को सबक़ सिखाना चाहते थे। चीन में भारत के शार्श डी अफ़ेयर्स रहे लखन मेहरोत्रा बताते हैं, "कहने को तो चीन ने ये कहा कि भारत के साथ लड़ाई के लिए उसकी फ़ारवर्ड नीति ज़िम्मेदार थी, लेकिन माओ ने दो साल पहले 1960 में ही भारत के ख़िलाफ़ रणनीति बनानी शुरू कर दी थी। यहां तक कि उन्होंने अमेरिका तक से पूछ लिया कि अगर हमें किसी देश के ख़िलाफ़ युद्ध में जाना पड़े तो क्या अमेरिका ताइवान में उसका हिसाब चुकता करेगा? अमेरिका का जवाब था कि आप चीन या उससे बाहर कुछ भी करते हैं, उससे हमारा कोई मतलब नहीं है। हम बस ताइवान की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं।
लखन मेहरोत्रा आगे बताते हैं, "अगले साल उन्होंने यही बात ख़्रुश्चेव से पूछी। उस ज़माने में तिब्बत की सारी तेल सप्लाई रूस से आती थी। उन्हें डर था कि अगर उनकी भारत से लड़ाई हुई तो सोवियत संघ कहीं पेट्रोल की सप्लाई बंद न कर दे। उन्होंने ख़्रुश्चेव से ये वादा ले लिया कि वो ऐसा नहीं करेंगे और उन्हें बता दिया कि भारत से उनके गहरे मतभेद हैं। ख़्रुश्चेव ने उनसे सौदा किया कि आप दुनिया में तो हमारा विरोध कर रहे हैं, लेकिन जब हम क्यूबा में मिसाइल भेजेंगे तो आप उसका विरोध नहीं करेंगे।"
 
"ख़्रुश्चेव को ये पूरा अंदाज़ा था कि चीन भारत पर हमला कर सकता है। यहां तक कि मिग युद्धक विमानों की सप्लाई के लिए हमारा उनसे समझौता हो गया था। लेकिन जब लड़ाई शुरू हुई रूस ने वो विमान भेजने में देरी की लेकिन चीन को पेट्रोल की सप्लाई नहीं रोकी गई। बाद में जब ख़्रुश्चेव से जब ये पूछा गया कि आप ऐसा कैसे कर सकते थे तो उनका जवाब था भारत हमारा दोस्त है लेकिन चीन हमारा भाई है।"
 
माओ ने इंदिरा को अभिवादन देने को कहा : 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद चीन के राष्ट्रीय दिवस के मौक़े पर वहां के विदेश मंत्रालय ने एक राजकीय भोज का आयोजन किया जिसमें माओ भी मौजूद थे। इस मौक़े पर दिए गए भाषण में पाकिस्तान पर भारत को आक्रामक बताया गया। भोज में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे जगत मेहता की मेज़ के सामने जान-बूझकर इस भाषण का अंग्रेज़ी अनुवाद नहीं रखा गया ताकि वह इस भाषण को समझ न सकें।
 
उन्होंने अपने बगल में बैठे स्विस राजदूत के सामने फ्रेंच भाषा में रखा भाषण पढ़ा और भोज से तुरंत वॉक आउट करने का फ़ैसला किया। चीनियों ने इसे अपने सर्वोच्च नेता का सबसे बड़ा अपमान माना। बाहर निकलने पर जगत मेहता की कार को वहां नहीं पहुंचने दिया गया और वह और उनकी पत्नी रमा आधे घंटे तक नेशनल पीपुल्स हॉल की सीढ़ियों पर कड़ी सर्दी में ठिठुरते रहे।
 
1970 में मई दिवस के मौक़े पर बीजिंग स्थित सभी दूतावासों के प्रमुखों को तियानानमेन स्क्वायर की प्राचीर पर बुलाया गया। चेयरमैन माओ भी वहां मौजूद थे। राजदूतों की क़तार में सबसे आख़िर में खड़े ब्रजेश मिश्र के पास पहुंचकर उन्होंने कहा, "राष्ट्रपति गिरि और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को मेरा अभिवादन पहुंचा दीजिए।"
 
वो थोड़ा रुके और फिर बोले, "हम आख़िर कब तक इस तरह लड़ते रहेंगे?" इसके बाद माओ ने अपनी प्रसिद्ध मुस्कान बिखेरी और ब्रजेश मिश्र से पूरे एक मिनट तक हाथ मिलाते रहे। यह चीन की तरफ़ से पहला संकेत था कि वह पुरानी बातें भूलने के लिए तैयार हैं।
 
अपनी मौत से तीन महीने पहले तक वो विदेशी नेताओं से मिलते रहे लेकिन वो तब तक बहुत ख़राब हालत में पहुंच चुके थे। जब थाईलैंड के प्रधानमंत्री उनके कमरे में घुसे तो उन्होंने उन्हें खर्राटे लेते हुए सुना।
 
सिंगापुर के प्रधानमंत्री ली क्वान यू जब उनसे मिलने गए तो उन्होंने देखा कि उनका सिर कुर्सी पर एक तरफ लुढ़का हुआ था और उनके मुंह से थूक बह रहा था। जब उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो से अपनी मुलाक़ात की तस्वीरें देखीं तो उन्होंने तय किया कि अब वो किसी विदेशी मेहमान से नहीं मिलेंगे। उसके तीन महीने बाद माओ का निधन हो गया।

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