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नज़रिया: मोदी सरकार के फैसले से भारत आएगा ट्रंप टावर?

Updated: शुक्रवार, 12 जनवरी 2018 (11:48 IST)
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ़डीआई) के नियमों में बदलावों को कैबिनेट की मंजूरी मिल गई है। इसके तहत सिंगल ब्रैंड रिटेल, एविएशन और निर्माण क्षेत्र में ऑटोमैटिक रूट से 100 फ़ीसदी एफ़डीआई को मंजूरी दी गई है।
 
जानकारों का मानना है कि एयर इंडिया के लिए 49 फ़ीसदी के निवेश की मंजूरी देने से विनिवेश करने में आसानी होगी। इसके अलावा कुछ मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो वर्ल्ड बैंक ने साल 2018 के लिए विकास दर के 7।3 फ़ीसदी रहने का अनुमान लगाया है।
 
केंद्र सरकार के एफ़डीआई के दायरे को बढ़ाने और वर्ल्ड बैंक के अनुमान के क्या मायने हैं? बीबीसी संवाददाता मानसी दाश ने वरिष्ठ पत्रकार और आर्थिक मामलों की जानकार सुषमा रामाचंद्रन से यही जानने की कोशिश की।
 
पढ़िए सुषमा रामाचंद्रन का नज़रिया
एफ़डीआई को लेकर सरकार के इस फ़ैसले का बाज़ार पर सकारात्मक असर पड़ेगा। सिंगल ब्रैंड रिटेल में पहले भी 100 फ़ीसदी एफ़डीआई की इजाज़त थी। लेकिन इक्विटी 49 फ़ीसदी से ज़्यादा होने पर आपको इसकी इजाजत लेनी पड़ती थी। लेकिन अब इसे ऑटोमैटिक रूट पर डाल दिया गया है।
 
ऐसे में नए फ़ैसले के आने से आपको रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया और भारत सरकार से इजाज़त लेने की ज़रूरत नहीं है। बस आपको इन दोनों को जानकारी देनी होगी और आसानी से 100 फ़ीसदी विदेशी निवेश की कंपनी फटाफट बन जाएगी, बशर्ते आपकी कंपनी सिंगल ब्रैंड के लिए काम करती हो। इस फ़ैसले से लालफीताशाही को कम करने की कोशिश की गई है। इसका फ़ायदा विदेशी निवेशकों को मिलेगा।
 
अगर निर्माण क्षेत्र में विदेशी निवेश पर फ़ैसले की बात की जाए तो इसमें भी 100 फ़ीसदी विदेशी निवेश की इजाज़त थी। लेकिन इसमें पेच ये था कि रियल स्टेट ब्रॉकिंग को इससे बाहर रखा गया था। अब सरकार कह रही है कि रियल स्टेट ब्रॉकर्स इस क्षेत्र में नहीं आते हैं तो इसकी इजाज़त दी जा सकती है।
 
ऐसे में अगर आप दूसरे देश में हैं और भारत में रियल स्टेट ब्रॉकर का काम करना चाहते हैं तो भारत आइए और आपकी कंपनी आसानी से बन जाएगी। इसका मतलब ये हुआ कि जो रियल स्टेट ब्रॉकर हैं और कंपनी ख़रीदने- बेचने का काम करते हैं, वो भारत आ सकते हैं।
 
भारत आएगा ट्रंप टावर?
इसका बाज़ार पर सकरात्मक असर पड़ना तय है। विदेशी निवेशक लालफीताशाही खत्म होने से खुश होता है। रियल स्टेट में काला धन काफी इस्तेमाल होता है तो नोटबंदी के बाद काला धन और काला धंधा काफी कम हुआ है। लेकिन इसका असर रियल स्टेट बाज़ार पर पड़ा है।
 
सरकार रियल स्टेट रेगुलेटरी एक्ट लाई है। इससे डेवलपर्स पर काफी सारे नियंत्रण लगाए गए। इसका रियल स्टेट क्षेत्र पर भी असर हुआ है। रफ़्तार मंद हुई है। ज़मीन की क़ीमतों में गिरावट आई है। मैं ये तो नहीं कहूंगी कि सरकार के हालिया फ़ैसले से बहुत बड़ा परिवर्तन होगा लेकिन इसका कुछ असर तो होगा।
 
बाहर की बड़ी निर्माण कंपनियां, जो भारत के रियल स्टेट ब्रॉकर्स के साथ डील नहीं करना चाहती हैं। ऐसी कंपनियां अब भारत आ सकती हैं। बात ये भी हो रही है कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की कंपनी भारत आ सकती है।
 
आम लोगों पर क्या असर?
मेरा मानना है कि सरकार के फ़ैसले से आम लोगों का ख़ास फ़ायदा नहीं होगा। ये बस विदेशी निवेश को भारत लाने की कोशिश है। अगर लंबे वक्त में ये बड़ी कंपनियां भारत में बड़े प्रोजेक्ट लगाएं और सस्ते दामों में चीज़ों को मुहैया कराएं तो फ़ायदा हो सकता है।
 
लेकिन कम वक्त में इससे कोई ख़ास फर्क नहीं होगा। अगर वर्ल्ड बैंक की हालिया रिपोर्ट की बात करूं तो इसको एफ़डीआई से जोड़ने की ज़रूरत नहीं है। दूसरा सरकार खुद कह रही है कि 6.5 फ़ीसदी विकास दर इस साल रहेगी और अगले साल 7 फ़ीसदी तक शायद हम पहुंच पाएं।
 
ऐसे में अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के ऐसे अनुमान को मानना तनिक मुश्किल है। हालांकि हम चाहेंगे कि वर्ल्ड बैंक की बात सही साबित हो जाए। लेकिन जब तक हमारी अर्थव्यवस्था अच्छी हालत में नहीं पहुंच जाती है तब तक ये मुश्किल है। मैन्यू फैक्चरिंग, कृषि सेक्टर तेज़ गति से नहीं चल रहा है। जब तक ये दो सेक्टर तेज़ गति से नहीं चलेंगे, तब तक विकास दर के बढ़ने की संभावना कम है।

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