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बच्चों के लिए कितना सुरक्षित घर से स्कूल का सफ़र?

Updated: गुरुवार, 21 सितम्बर 2017 (12:33 IST)
- अभिमन्यु कुमार साहा
साल 1997 की बात है। राहुल गौर का 12वां जन्मदिन था। दोस्तों के लिए चॉकलेट-मिठाई लेकर वह स्कूल को निकला था। उसकी मां ने उसे बस में बैठाते वक्त स्कूल से लौटने के बाद जन्मदिन मनाने का वादा किया था। लेकिन वह कभी नहीं लौटा। ड्राइवर की लापरवाही से उसकी स्कूल बस यमुना नदी में गिर गई थी, जिसमें राहुल के साथ अन्य 29 बच्चों की मौत हो गई थी। 60 से ज्यादा घायल हो गए थे।
 
उस समय सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद स्कूली बसों के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे, जिसे देशभर के स्कूलों को तत्काल प्रभाव से लागू करने के आदेश दिए गए थे। 20 साल बाद भी स्कूल कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं। जर्जर बसों में बच्चों को ढोया जा रहा है। टैक्सी में बच्चों को भेड़-बकरियों की तरह ठूंसा जाता है।
 
'कई बार दुर्घटना की शिकार हुई मेरी बस'
मथुरा रोड स्थित एक निजी स्कूल में दसवीं कक्षा में पढ़ने वाले एक छात्र ने बताया कि वह रोज़ जर्जर डीटीसी बस से स्कूल आते-जाते हैं। उन्होंने बताया, "मैं डीटीसी बस से स्कूल आता हूं। बस में सीटें टूटी-फूटी होती हैं। ड्राइवर भी ढंग से बस नहीं चलाते हैं। मेरी बस दो-तीन बार हल्की दुर्घटना की शिकार हुई है, लेकिन हम लोग बच गए।"
 
इसी स्कूल के पास कई टैक्सियां बच्चों के इंतज़ार में खड़ी दिखी। किसी भी टैक्सी में प्राथमिक उपचार की व्यवस्था नहीं थी। न ही बच्चों की देखभाल करने वाला कोई अटेंडेंट। जबकि सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के मुताबिक यह होना ज़रूरी है। ड्राइवर ही बच्चों को टैक्सी में बैठा रहे थे।
 
टैक्सी चालक को नहीं सुरक्षा इंतज़ामों की जानकारी
टैक्सी चालक केदार पिछले कई सालों से बच्चों को स्कूल छोड़ते रहे हैं। उन्होंने बताया, "मैं सात-आठ बच्चों को स्कूल लाता और घर पहुंचाता हूं। सुरक्षा के इंतज़ाम के नाम पर आग बुझाने वाला सिलेंडर है।"
केदार ने स्कूल से किसी तरह का संबंध और विशेष प्रशिक्षण दिए जाने से इंकार किया। वहीं एक अन्य टैक्सी चालक मिले। उनसे टैक्सी में सुरक्षा इंतज़ामों के बारे में पूछा तो बोले, "इस बारे में मुझे कोई जानकारी नहीं है।"
 
अपने बच्चे को घर वापस ले जाने आई एक मां ने कहा, "मैं अपने बच्चे को प्राइवेट टैक्सी से नहीं भेजती, क्योंकि उसमें भीड़ ज्यादा होती है। बच्चे अच्छे से बैठ नहीं पाते हैं। चार साल से मेरे बच्चे पढ़ रहे हैं। मैंने कभी टैक्सी से बच्चों को नहीं भेजा। रिक्शा या ऑटो से लेने आती हूं।"
 
दिशा-निर्देश के मुताबिक बच्चों के वाहनों की खिड़कियों में लोहे की ग्रिल लगी होनी चाहिए, जो किसी बस या टैक्सी में देखने को नहीं मिली। नियमानुसार निजी टैक्सियों पर स्कूल का नाम और इमरजेंसी नंबर भी लिखा होना चाहिए, पर ये भी छपे नहीं थे।
 
वीआईपी सेवा का खर्च कौन उठाएगा?
शिक्षा के क्षेत्र में 40 साल से अधिक का अनुभव रखने वाली और लोटस वैली इंटरनेशनल स्कूल की पूर्व प्रिंसिपल मधु चंद्रा कहती हैं कि एक वीआईपी सुविधाओं वाले ट्रांसपोर्ट सिस्टम के लिए अधिक पैसे की ज़रूरत होती है।
 
वो कहती हैं, "हमारे यहां गरीब और अमीर, दोनों वर्गों के बच्चे पढ़ते हैं। आखिर ये खर्च किससे वसूला जाए? ज़ाहिर सी बात है अभिभावकों से ही। फिर आप कहेंगे शिक्षा महंगी हो गई।" मधु आगे कहती हैं कि अभिभावकों को भी अपनी मानसिकता बदलनी होगी। वो अपने बच्चों को 25-25 किलोमीटर दूर पढ़ने भेजते हैं।
 
वो कहती हैं कि सरकार को अपने स्कूलों की व्यवस्था सुधारनी चाहिए। इससे निजी स्कूलों पर बोझ कम होगा। लोगों का रुझान भी इन स्कूलों की तरफ बढ़ेगा। अभिभावक मधुरेंद्र कहते हैं कि वह किसी तरह से बच्चों को पढ़ाते हैं। स्कूल की फीस देने में ही जतन करने पड़ते हैं, वीआईपी ट्रांसपोर्ट सिस्टम का खर्च वहन करना उनके बूते से बाहर की चीज़ है।

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