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क्या बच्चों को डिप्रेशन हो सकता है?

Updated: मंगलवार, 15 मई 2018 (10:23 IST)
- सरोज सिंह
 
एक दिन में पांच एंटी डिप्रेसेंट टैबलेट, आधी रात में अस्पताल के चक्कर, खालीपन का अहसास, रह-रह कर सुसाइड करने की इच्छा- 'दंगल' और सीक्रेट 'सुपरस्टार' फिल्मों में काम कर चुकीं अभिनेत्री ज़ायरा वसीम पिछले चार साल से ये सब झेल रही हैं। उनके अभिनय को देख कर पहली नज़र में आपको इसका अहसास भले ही न हुआ हो, पर ये सच है।
 
हाल ही में अपने इंस्टाग्राम पोस्ट पर ज़ायरा ने खुद इसका खुलासा किया। ज़ायरा वसीम 17 साल की हैं। उनके मुताबिक जब वो 12 साल की थीं तब से उनके साथ ये सब हो रहा है।
 
बच्चों में डिप्रेशन
लेकिन सवाल ये है कि क्या 12 साल की उम्र में बच्चे डिप्रेशन के शिकार हो सकते हैं?
 
इसी सवाल का जवाब है ज़ायरा का इंस्टाग्राम पोस्ट।
 
उन्होंने लिखा है कि "मैं आज तक इस बात को स्वीकार करने से डरती रही कि मुझे डिप्रेशन और एंग्जाइटी है। इसके पीछे दो कारण थे- एक तो इस शब्द के साथ जुड़ा कंलक और दूसरी वजह ये कि अकसर लोग मुझे कहते थे- "तुम डिप्रेस होने के लिए बहुत छोटी हो", "ये एक दौर है, निकल जाएगा"
 
वो आगे लिखती हैं, "काश की सच में बच्चों को डिप्रेशन न होता, लेकिन दूसरे लोगों बहकावे में आकर आज मैं उस स्थिति में पहुंच गई हूं जहां मैं जानबूझकर कभी आना नहीं चाहती थी।"....जानकारों की माने तो बच्चे डिप्रेशन का शिकार नहीं होते, ये कहना ग़लत है।
 
मनोवैज्ञानिक डॉ अरुणा ब्रूटा के मुताबिक जब बच्चों को फ़्लू और बड़ों की बाकी बीमारियां हो सकती हैं, तो फिर डिप्रेशन क्यों नहीं हो सकता? उनके मुताबिक ये बीमारी किसी भी उम्र में किसी को भी हो सकती है।
 
ब्रिटेन की जानी मानी हेल्थ बेवसाइट एनएचएस च्वाइस के मुताबिक 19 साल के होने से पहले हर चार में से एक बच्चे को डिप्रेशन होता है। इस बेवसाइट के मुताबिक बच्चों में जितनी जल्द डिप्रेशन का पता चल जाए उतना बेहतर होता है। अगर लंबा खिंचता है तो इससे उबरने मे ज्यादा वक़्त लगता है।
 
ज़ायरा ने भी अपने इंस्टाग्राम पोस्ट में इस बात का जिक्र किया है। ज़ायरा के मुताबिक उन्हें हमेशा ये कहा गया कि डिप्रेशन 25 साल से ज्यादा के उम्र वालों को होता है। इसलिए हमेशा वो मानने के लिए तैयार नहीं थी कि उन्हें डिप्रेशन है। आंकड़ों की बात करें तो दुनिया में तकरीबन 35 करोड़ लोगों डिप्रेशन के शिकार है।
 
डिप्रेशन के लक्षण
कई तरीके हैं जिससे बच्चों में इसका आसानी से पता लगाया जा सकता है। मनोवैज्ञानिक अरुणा ब्रूटा के मुताबिक शुरूआती लक्षण कुछ ऐसे होते हैं -
 
*स्कूल न जाने की लगातार ज़िद करना
*दोस्त न बना पाना
खाना नहीं खाना
*हमेशा लो फ़ील करना
*हर बात के लिए इनकार करना
*पैनिक अटैक आना
 
डॉ ब्रूटा के मुताबिक अगर बच्चा बहुत ज्यादा ग़ुस्से में रहता है और हमेशा कही जाने वाली बात का उल्टा करे तो ये भी डिप्रेशन का एक प्रकार होता है। लोग अकसर उत्तेजित बच्चों को डिप्रेस्ड नहीं मानते हैं, लेकिन ऐसा नहीं होता। डॉ ब्रूटा कहती हैं, "ऐसे बच्चों में 'ओपोजिशनल डिसऑर्डर' होता है। ये भी चाइल्डहुड डिप्रेशन का एक प्रकार होता है।"
 
हालांकि ज़ायरा को 'पैनिक अटैक' की शिकायत ज्यादा रही है। उन्होंने लिखा है कि पहला 'पैनिक अटैक' उन्हें 12 साल की उम्र में आया था। उसके बाद से कितने अटैक आए हैं, अब उन्होंने गिनती भी बंद कर दी है।
 
 
'पैनिक अटैक'
डॉ ब्रूटा के मुताबिक पैनिक अटैक को एंग्जाइटी अटैक भी कहते है। कई लोगों में ये डिप्रेशन का शुरूआती दौर होता है। कई बार पैनिक अटैक और डिप्रेशन साथ-साथ भी आ सकते हैं। कई बार एंग्जाइटी अटैक, सिर्फ एंग्जाइटी अटैक बन कर ही रह जाता है, डिप्रेशन तक की नौबत नहीं आती है। ऐसी स्थिति में हमेशा नकारत्मकता बीमार लोगों पर हावी रहती है।
 
डिप्रेशन का कारण
ब्रिटेन की हेल्थ बेवसाइट एनएचएस चॉइस के मुताबिक बच्चों में डिप्रेशन के कई वजह हो सकते हैं।
 
*परिवार में कलह
*स्कूल में मारपीट
*शारीरिक, मानसिक या यौन शोषण
*या फिर परिवार में पहले से किसी को डिप्रेशन होना
 
डॉ ब्रूटा के मुताबिक एक साथ बहुत अटेंशन मिलने के बाद एकाएक अटेंशन नहीं मिलने की वजह से कई बार लोग डिप्रेशन में चले जाते है। इसलिए कम उम्र में शोहरत पाने वाले बच्चों को इसका ख़तरा ज्यादा रहता है। ज़ायरा के साथ भी ऐसा ही हुआ या नहीं इसकी कोई पुख्ता जानकारी नहीं है। उन्होंने अपने पोस्ट में अपने डिप्रेशन का कोई कारण नहीं बताया है।
 
हालांकि ज़ायरा वसीम ने 2015 में फिल्म दंगल के लिए शूटिंग शुरू कर दी थी। यानी आज से तीन साल पहले। इससे साफ है कि चाहे 'दंगल' हो या फिर 'सीक्रेट सुपरस्टार', दोनों फिल्मों में डिप्रेशन के दौर से गुजर रहीं थीं, ज़ायरा वसीम।
 
डिप्रेशन का इलाज
डॉ ब्रूटा कहतीं है, "बच्चों में डिप्रेशन का इलाज बड़ों की तरह ही होता है, बस ज़रूरत होती है बच्चों की मानसिकता को ज्यादा बेहतर समझने की।" डिप्रेशन के प्रकार पर उसका इलाज निर्भर करता है। अगर बच्चा 'माइल्ड चाइल्डहुड डिप्रेशन' का शिकार है तो बातचीत और थेरेपी से इलाज संभव होता है।
 
'माइल्ड चाइल्डहुड डिप्रेशन' में दवाइयों और काउंसिलिंग दोनों की जरूरत पड़ती है। आमतौर पर ऐसे लोगों को एंटी डिप्रेसेंट टैबलेट लेने की सलाह दी जाती है। हालांकि ये टैबलेट डिप्रेशन के कुछ लक्षणों में तो आराम पहुंचाते हैं मगर वे मूल वजह पर असर नहीं करते। यही वजह है कि बाकी उपचारों के साथ इसके इस्तेमाल होते हैं, अकेले नहीं।
 
विश्व स्वास्थ्य संगठन कि एक रिपोट के मुताबिक बच्चों में डिप्रेशन यानी अवसाद के इलाज के लिए एंटी डिप्रेशन दवाओं का इस्तेमाल 50 फ़ीसदी बढ़ गया है। संगठन का कहना है कि यह चलन ख़तरनाक है क्योंकि ये दवाएं बच्चों को ध्यान में रखकर नहीं बनाई गई थीं।
 
लेकिन जब डिप्रेशन का फ़ेज चरम पर होता है तो काउंसिलिंग से बात नहीं बनती। उस समय इंजेक्शन और दवाइंयों से पहले इलाज कर डिप्रेशन को कंट्रोल में लाया जाता है फिर बाद में थेरेपी का इस्तेमाल किया जाता है। कई मामलो में मनोचिकित्सक और मनोवैज्ञानिक दोनों का एक साथ सहारा लेने की जरूरत पड़ती है।
 
हालांकि ज़ायरा ने अपने डिप्रेशन से निकलने के लिए इन तीनों तरीके के अलावा एक अलग रास्ता भी चुना है। वो हर चीज़ से दूरी बनाए रखना चाहती हैं। काम से, स्कूल से, सोशल लाइफ़ से और सोशल मीडिया से भी।

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