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भद्रा, यमघंटक इत्यादि में हुआ है जन्म तो करें ये उपाय

Updated: शुक्रवार, 24 जनवरी 2020 (12:42 IST)
ज्योतिष की धारणा अनुसार भद्रा, क्षय तिथि, व्यतिपात, परिध, वज्र आदि योगों में जन्म तथा यमघंट इत्यादि में जो जातक जन्म लेता है, उसे अशुभ माना गया है। कहते हैं कि इन दुगर्यो में जन्म लेने वाले जातक के लिए शांति कराई जाना चाहिए।
 
 
क्या है भद्रा : हिन्दू पंचांग के 5 प्रमुख अंग होते हैं। ये हैं- तिथि, वार, योग, नक्षत्र और करण। इनमें करण एक महत्वपूर्ण अंग होता है। यह तिथि का आधा भाग होता है। करण की संख्या 11 होती है। ये चर और अचर में बांटे गए हैं। चर या गतिशील करण में बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज और विष्टि गिने जाते हैं। अचर या अचलित करण में शकुनि, चतुष्पद, नाग और किंस्तुघ्न होते हैं। इन 11 करणों में 7वें करण विष्टि का नाम ही भद्रा है। यह सदैव गतिशील होती है। अलग-अलग राशियों के अनुसार भद्रा तीनों लोकों में घूमती है। जब यह मृत्युलोक में होती है, तब सभी शुभ कार्यों में बाधक या या उनका नाश करने वाली मानी गई है।


जब चंद्रमा कर्क, सिंह, कुंभ व मीन राशि में विचरण करता है और भद्रा विष्टि करण का योग होता है, तब भद्रा पृथ्वीलोक में रहती है। इस समय सभी कार्य शुभ कार्य वर्जित होते हैं। इसके दोष निवारण के लिए भद्रा व्रत का विधान भी धर्मग्रंथों में बताया गया है।

 
क्या है क्षय तिथि : कोई तिथि, सूर्योदय से पूर्व आरंभ हो जाती है और अगले सूर्योदय के बाद तक रहती है तो उस तिथि की वृद्धि हो जाती है अर्थात् वह वृद्धि तिथि कहलाती है लेकिन यदि कोई तिथि सूर्योदय के बाद आरंभ हो और अगले सूर्योदय से पूर्व ही समाप्त हो जाती है तो उस तिथि का क्षय हो जाता है अर्थात् वह क्षय तिथि कहलाती है।

 
व्यतिपात योग : इस योग में किए जाने वाले कार्य से हानि ही हानि होती है। अकारण ही इस योग में किए गए कार्य से भारी नुकसान उठाना पड़ता है। किसी का भला करने पर भी आपका या उसका बुरा ही होगा।

 
यमघंटक योग : रविवार के दिन जब मघा नक्षत्र का संयोग, सोमवार के दिन विशाखा नक्षत्र का संयोग, मंगलवार के दिन आर्द्रा नक्षत्र का संयोग, बुधवार के दिन मूल नक्षत्र का संयोग, बृहस्पतिवार के दिन कृतिका नक्षत्र का संयोग, शुक्रवार के दिन रोहिणी नक्षत्र का संयोग और शनिवार के दिन हस्त नक्षत्र का संयोग यमघंटक योग बनाता है। परंतु रात्रिकाल में यमघंटक योग इतना अशुभ नहीं माना जाता है।

 
उपाय- उपरोक्त दुर्योग में यदि किसी का जन्म हुआ है तो उसे यह दुर्योग जिस दिन आए, उसी दिन इसकी शांति कराना चाहिए। इस दुर्योग के दिन विष्णु, शंकर इत्यादि की पूजा व अभिषेक शिवजी मंदिर में धूप, घी, दीपदान तथा पीपल वृक्ष की पूजा करके विष्णु भगवान के मंत्र का 108 बार हवन कराना चाहिए। इसके अलावा जातक को सूर्य सूक्त, पुरुष सूक्त और शांति पाठ जैसे अनुष्ठान कराने चाहिए।
 

लेखक के बारे में
अनिरुद्ध जोशी
पत्रकारिता के क्षेत्र में 26 वर्षों से साहित्य, धर्म, योग, ज्योतिष, करंट अफेयर्स और अन्य विषयों पर लिख रहे हैं। वर्तमान में विश्‍व के पहले हिंदी पोर्टल वेबदुनिया में सह-संपादक के पद पर कार्यरत हैं। दर्शनशास्त्र एवं ज्योतिष: मास्टर डिग्री (Gold Medalist), पत्रकारिता: डिप्लोमा। योग, धर्म और ज्योतिष में विशेषज्ञता।.... और पढ़ें

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