हिंदू 'प्रलय' की धारणा कितनी सच?

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
सृष्टि का विभाजन या भेद :

(A) कृतक लोक :
कृतक त्रैलोक्य जिसे त्रिभुवन या मृत्युलोक भी कहते हैं। इसके बारे में पुराणों की धारणा है कि यह नश्वर है, कृष्ण इसे परिवर्तनशील मानते हैं। इसकी एक निश्‍चित आयु है। उक्त त्रैलोक्य के नाम हैं- भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्गलोक। यही लोक पाँच तत्वों से निर्मित है- आकाश, अग्नि, वायु, जल और जड़। इन्हीं पाँच तत्वों को क्रमश: जड़, प्राण, मन, विज्ञान और आनंदमय कोष कहते हैं।
(1)भूलोक : जितनी दूर तक सूर्य, चंद्रमा आदि का प्रकाश जाता है, वह पृथ्वी लोक कहलाता है, लेकिन भूलोक से तात्पर्य जिस भी ग्रह पर पैदल चला जा सकता है।

(2)भुवर्लोक : पृथ्वी और सूर्य के बीच के स्थान को भुवर्लोक कहते हैं। इसमें सभी ग्रह-नक्षत्रों का मंडल है।

(3)स्वर्गलोक : सूर्य और ध्रुव के बीच जो चौदह लाख योजन का अन्तर है, उसे स्वर्गलोक कहते हैं। इसी के बीच में सप्तर्षि का मंडल है।
(B) अकृतक लोक :
जन, तप और सत्य लोक तीनों अकृतक लोक कहलाते हैं। अकृतक त्रैलोक्य अर्थात जो नश्वर नहीं है अनश्वर है। जिसे मनुष्य स्वयं के सद्‍कर्मों से ही अर्जित कर सकता है। कृतक और अकृतक लोक के बीच स्थित है 'महर्लोक' जो कल्प के अंत के प्रलय में केवल जनशून्य हो जाता है, लेकिन नष्ट नहीं होता। इसीलिए इसे कृतकाकृतक लोक कहते हैं।
(4)महर्लोक : ध्रुवलोक से एक करोड़ योजन ऊपर महर्लोक है।
(5)जनलोक : महर्लोक से बीस करोड़ योजन ऊपर जनलोक है।
(6)तपलोक : जनलोक से आठ करोड़ योजन ऊपर तपलोक है।
(7)सत्यलोक : तपलोक से बारह करोड़ योजन ऊपर सत्यलोक है।

मानते हैं कि ईश्वर परायण आत्मा को प्रलय काल में संताप और दु:ख नहीं होता। पुराण कहते हैं कि इस परमेश्वर की सृष्टि में लाने वाला ब्रह्मा, पालने वाला विष्णु और ले जाने वाला शिव है। प्रलयकाल में सभी को शिव के समक्ष उपस्थित होना है।



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