हमेशा गलत नहीं होते युवा

मित्रता
ND
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अक्सर हम युवाओं पर पथभ्रष्ट, गैरजिम्मेदार तथा उच्छृंखल होने का आरोप लगाते हैं। तब हम यह भूल जाते हैं कि हो सकता है इसके पीछे कहीं हम ही तो नहीं? क्या वाकई कुछ कड़वे अनुभवों की बिना पर हम सारी युवा पीढ़ी को गलत ठहरा सकते हैं?

अभी कुछ दिनों पूर्व हमें अपने बेटे के नाम से की हुई एक पॉलिसी का चेक मिला। वह इंजीनियरिंग का छात्र है अतः हमने शैक्षणिक कर्जा ले रखा है। जब एकमुश्त राशि मिली तो हमें लगा कि वह किसी कीमती वस्तु (मोबाइल, बाइक आदि) खरीदने के लिए कहेगा लेकिन उसके ये शब्द हमें उस राशि से भी मूल्यवान लगे जिसमें उसने कहा कि इस वर्ष की मेरी फीस हम इसी राशि से चुकाएँगे जिससे कर्ज लेने की आवश्यकता नहीं रहेगी।

अनेक बार अपने युवा बेटे या बेटी के बारे में यही सोचते हैं कि उन्हें अभिभावकों की चिन्ता नहीं है या फिर इस बारे में वे सोचते ही नहीं हैं। यह शायद के कारण है। यह गैप पीढ़ी दर पीढ़ी होता ही है। नतीजा यह कि आज का युवा गैर जिम्मेदार, खर्चीला और अनियंत्रित हो रहा है।

नन्हे शिशु को शब्दों का उच्चारण तो हम सिखा देते हैं लेकिन वाणी का महत्व नहीं समझा पाते। चलना तो सिखाते हैं लेकिन बड़े होने पर उसे किसी गिरते हुए इंसान को उठाना भी चाहिए, यह नहीं सिखाते।
उदाहरणों में यह सच हो सकता है लेकिन साधारणतः हम पाते हैं कि युवाओं को अधिक संघर्ष करना है क्योंकि प्रतियोगिता का समय है। जब करते हैं तभी सामने होती है। अभिभावकों के रूप में हम उस समय "जब स्वयं युवा थे" के बारे में सोचे तब लगता है कि हम भी तो वैसे ही थे जैसे आज ये युवा हैं।

पिछले वर्ष मुंबई के एक होटल में मैं जब अपने परिवार के साथ खाना खा रही थी, तभी तीन-चार युवतियों का समूह मेरे पास आकर चरण-स्पर्श करने लगा। ये लड़कियाँ वही थीं जिन्हें मैंने कभी विद्यालय में पढ़ाया था। आज वे सभी उच्च शिक्षित होकर अच्छी कंपनियों में कार्यरत हैं।

शिक्षा, संस्कार, सद्गुण, नम्रता ये सभी हम अपने युवाओं को एक पूँजी के रूप में सौंपते हैं। जब कभी हम युवाओं को दिग्भ्रमित पाते हैं तो इसमें केवल उनका दोष नहीं होता। अभिभावकों का भी दोष होता है। साथ ही उन शिक्षकों और बड़े बुजुर्गों का भी, जो केवल पुस्तकीय ज्ञान देने और उच्च शिक्षित करना ही अपना कर्तव्य समझते हैं लेकिन संस्कारों की पूँजी हस्तांतरित नहीं करते। वे युवाओं को पैसा कमाने का रास्ता तो दिखाते हैं लेकिन पैसे का सदुपयोग कैसे करना है यह नहीं सिखाते।

नन्हे शिशु को शब्दों का उच्चारण तो हम सिखा देते हैं लेकिन वाणी का महत्व नहीं समझा पाते। चलना तो सिखाते हैं लेकिन बड़े होने पर उसे किसी गिरते हुए इंसान को उठाना भी चाहिए, यह नहीं सिखाते।

WD|
- श्रीति राशिनक
कुल मिलाकर यह एक ऐसा सामंजस्य है जो प्रत्येक अभिभावक और युवा बेटे, बेटी के बीच होना चाहिए। यह एक ऐसा सेतु है जो नई और पुरानी पीढ़ी को जोड़ने में मदद कर सकेगा और तब हमें यह नहीं कहना पड़ेगा कि युवा गलत होते हैं।



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