तेनालीराम की कहानियां : स्वप्न महल

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‘नहीं, महाराज, मैं झूठ ही किसी कर्मचारी को क्यों बदनाम करूं?’ बूढ़ा बोला।

‘तो फिर साफ क्यों नहीं कहते, यह सब क्या गोलमाल है? जल्दी बताओ, तुम चाहते क्या हो?’

‘महाराज अभयदान पाऊं तो कहूं।’ ‘हम तुम्हें अभयदान देते हैं’, राजा ने विश्वास दिलाया।

‘महाराज, कल रात मैंने सपने में देखा कि आप स्वयं अपने कई मंत्रियों और कर्मचारियों के साथ मेरे घर पधारे और मेरा संदूक उठवाकर आपने अपने खजाने में रखवा दिया। उस संदूक में मेरे सारे जीवन की कमाई थी। पांच हजार स्वर्ण मुद्राएं’, उस बूढ़े व्यक्ति ने सिर झुकाकर कहा।

‘विचित्र मूर्ख हो तुम! कहीं सपने भी सच हुआ करते हैं?’ राजा ने क्रोधित होते हुए कहा।




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