सिंहासन बत्तीसी : इकत्तीसवीं पुतली कौशल्या की कहानी

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विक्रम तब तक कक्ष में पहुंच चुके थे और उन्होंने देखा कि योगी उठ खड़ा हुआ। उन्होंने जब उसे बताया कि वे विक्रमादित्य हैं तो योगी ने अपने को भाग्यशाली बताया। उसने कहा कि विक्रमादित्य के दर्शन होंगे यह आशा उसे नहीं थी।

योगी ने उनका खूब आदर-सत्कार किया तथा विक्रम से कुछ मांगने को बोला। राजा विक्रमादित्य ने उससे तमाम सुविधाओं सहित वह भवन मांग लिया।

विक्रम को वह भवन सौंपकर योगी उसी वन में कहीं चला गया। चलते-चलते वह काफी दूर पहुंचा तो उसकी भेंट अपने गुरु से हुई। उसके गुरु ने उससे इस तरह भटकने का कारण जानना चाहा तो वह बोला कि भवन उसने राजा विक्रमादित्य को दान कर दिया है। उसके गुरु को हंसी आ गई।

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