एडोल्फ हिटलर

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जर्मनी में शायद ही कोई दूसरा शहर होगा, जहां सामाजिक समस्या का अध्ययन करना विएना से बेहतर हो। यहां मैं इस भ्रम के खिलाफ आगाह करना चाहूंगा कि इस समस्या का अध्ययन ऊपर से नीचे की ओर निगाह डालकर किया जा सकता है। जो व्यक्ति कभी उस नाग के चंगुल में नहीं आया, वह जान ही नहीं सकता कि उसका जहर क्या होता है। किसी भी अन्य तरीके से इसके अध्ययन का परिणाम होगा, सतही बयानबाजी तथा भावुक विभ्रम। ये दोनों ही नुकसानदायक हैं।


पहला इसलिए कि वह कभी भी समस्या की जड़ तक नहीं पहुंच सकता और दूसरा, क्योंकि वह समस्या को पूरी तरह अनदेखा ही कर देता है। मुझे नहीं पता कि इन दोनों में अधिक जघन्य क्या है, सामाजिक व्यथा की अनदेखी करना, जैसा कि उनमें से अधिकांश लोग करते हैं, जिन पर भाग्य का उपकार रहता है और जो अपने श्रम के बल पर समाज में ऊपर उठे हैं या फिर उन लोगों की तरह कृपालुता दर्शाना जो परोपकार का खूब दिखावा करते हैं और 'जनता से हमदर्दी रखने' के घमंड भी पाल बैठते हैं।
वास्तविक समझ के अभाव में ये लोग जितना सोच सकते हैं, उससे कहीं अधिक पाप करते हैं। इसीलिए उन्हें यह देखकर बड़ा आश्चर्य होता है कि जिस 'सामाजिक अंतरात्मा' पर वे गर्व करते हैं, उससे कोई समाधान नहीं निकलता, बल्कि कई बार इसके कारण उनके नेक इरादे भी नफरत की नजरों से देखे जाते हैं। फिर वे कहते हैं कि देखो, ये लोग कितने कृतघ्न हैं।

ऐसे लोग बहुत देर से समझ पाते हैं कि यहां महज सामाजिक गतिविधियों के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता और कृतज्ञता की उम्मीद नहीं की जा सकती। यहां किसी पर उपकार करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। प्रश्न है प्रतिफलात्मक न्याय का। उपरोक्त तरीके से सामाजिक समस्या का अध्ययन करने के लालच से मैं बच गया। कारण कि मुझे गरीबों के बीच रहने को बाध्य होना पड़ा। अतः मुद्दा इस समस्या का वस्तुपरक अध्ययन करना नहीं था, बल्कि मुझ पर इसके प्रभावों का परीक्षण करना था। खरगोश प्रयोग के दौर से बच तो निकला, लेकिन इसे उसके हानिरहित होने का प्रमाण नहीं मान लेना चाहिए।
आज जब मैं उस समय के अपने क्रमबद्ध अनुभवों का स्मरण करता हूं, तो मैं सारी बातें याद नहीं कर पाता। यहां मैं केवल उन अनुभवों का वर्णन करूंगा, जो महत्वपूर्ण सिद्ध हुए और जिन्होंने व्यक्तिगत रूप से मुझे प्रभावित किया तथा कई बार मुझे डगमगा दिया। मैं उन सबकों का भी उल्लेख करूंगा जो मैंने इन अनुभवों से सीखे।

उस समय आमतौर पर काम पाना ज्यादा मुश्किल नहीं था, क्योंकि मैं कोई कुशल कारीगर के तौर पर काम नहीं मांग रहा था, बल्कि तथाकथित 'अतिरिक्त श्रमिक' का काम मांग रहा था। जो भी काम हाथ लगता, मैं कर लेता, ताकि दो जून रोटी का बंदोबस्त होता रहे।
इस प्रकार मैंने स्वयं को उसी स्थिति में पाया, जैसे कि वे प्रवासी जो इस दृढ़ निश्चय के साथ अपने पैरों से यूरोप की धूल झाड़ते हैं कि वे इस नई दुनिया में अपने लिए एक नए अस्तित्व की नींव रखेंगे और एक नया आशियाना बसाएंगे। वर्ग, रुतबे, पर्यावरण या परंपरा के किसी भी पूर्वाग्रह से मुक्त होकर वे कई भी उपलब्ध काम करने को तैयार रहते हैं। यह भावना निरंतर उनमें घर करती जाती है कि ईमानदारी से किया गया कार्य किसी का अपयश नहीं करता, फिर चाहे वह किसी भी तरह का काम हो। तो इस प्रकार मैं एक ऐसी दुनिया में पैर जमाने तथा अपने मार्ग पर आगे बढ़ने के प्रति दृढ़ प्रतिज्ञ था, जो मेरे लिए नई थी।
मुझे शीघ्र ही पता चला कि किसी न किसी प्रकार का काम हरदम मिल सकता था, लेकिन मैंने यह भी जाना कि यह इतनी ही आसानी से हाथ से निकल भी सकता था। नियमित दैनिक मजदूरी कमाने की अनिश्चितता मुझे अपने नए जीवन का सबसे निराशाजनक पहलू लगने लगी। कुशल कारीगर के हाथ पर हाथ धरे बैठने की नौबत उतनी ज्यादा नहीं आती थी जितनी कि अकुशल श्रमिक की, लेकिन तालाबंदी और हड़ताल के कारण उसे भी कई बार रोजी-रोटी से वंचित रहना पड़ता था। रोजी-रोटी की अनिश्चतता समूची सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था का सबसे कड़वा पहलू था।
ग्रामीण लड़का 'आसान काम' और कम मेहनत की बात सुनकर महानगर की ओर आकर्षित होता है। वह विशेष रूप से महानगर की चमक-दमक से सम्मोहित हो उठता है। गांव में नियमित मजदूरी पाने का अभ्यस्त होने के नाते उसे यही सिखाया गया होता है कि अपनी नौकरी तब तक मत छोड़ो, जब तक कि कोई दूसरी नौकरी नजर में न हो। चूंकि कृषि मजदूरों की काफी कमी है, अतः गांवों में बेरोजगारी के लंबे दौर की संभावना कम ही है। यह सोचना गलत है कि जो लड़का शहर जाने के लिए गांव छोड़ता है, वह उन लोगों जितना समर्थ नहीं है, जो खेतों में काम करने हेतु गांव में ही रह जाते हैं। इसके विपरीत, अनुभव तो यही दर्शाता है कि अधिक स्वस्थ व मेहनती लोग ही शहर की ओर पलायन करते हैं। इस प्रकार गांव छोड़ शहर की ओर जाने वाला लड़का अनिश्चत भविष्य का जोखिम उठाने को तैयार रहता है। आमतौर पर वह जेब में कुछ पैसे लेकर शहर आता है यदि प्रारंभिक दिनों में काम मिलने का सौभाग्य न मिले तो वह प्रायः हतोत्साहित नहीं होता। हां, यदि उसे नौकरी मिलती है और फिर कुछ दिन में छिन जाती है तो स्थिति बिगड़ जाती है। नए सिरे से काम की तलाश करना, विशेषकर सर्दियों में बहुत मुश्किल होता है और कभी-कभी तो बिलकुल असंभव। प्रारंभिक सप्ताहों में तो जिंदगी फिर भी कुछ सहनीय होती है।
उसे अपनी ट्रेड यूनियन से बेरोजगारी भत्ता मिलता है और जिंदगी जैसे-तैसे चलती रहती है। लेकिन जब उसका अपना पैसा खत्म हो जाता है और बेरोजगारी बहुत अधिक लंबी खिंच जाने के कारण ट्रेड यूनियन भी उसे पैसा देना बंद कर देती है, तब जाकर वास्तविक पीड़ा शुरू होती है। अब वह भूख का मारा, इधर-उधर भटकता है। अकसर वह अपना आखरी सामान भी गिरवी रख देता है अथवा बेच डालता है। उसके कपड़े अस्त-व्यस्त रहने लगते हैं और अपने बाहरी स्वरूप में गरीबी की बढ़ती निशानियों के बीच वह निम्नतर सामाजिक स्तर पर पहुँच जाता है। यहां वह एक ऐसे वर्ग के लोगों के बीच उठता-बैठता है, जिनके जरिये उसके दिमाग में जहर घुल जाता है। फिर उसके पास सोने के लिए भी कोई ठिकाना नहीं रहा जाता। यदि ऐसा सर्दियों में हो तो यह बहुत ही भारी विपदा सिद्ध होती है। अंततः उसे काम मिल जाता है। फिर पुरानी कहानी स्वयं को दोहराती है। दूसरी ओर फिर तीसरी बार ऐसा ही होता है। अब स्थिति और भी बिगड़ जाती है। धीरे-धीरे वह इस अनंत अनिश्चितता के प्रति उदासीन होता जाता है।



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