लाइसेंस छोड़िए, खुद चलेगी कार

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आधी सदी से विज्ञान उस तकनीक को खोज रहा है, जहां को बिना के चलाया जा सके। कुछ कामयाबी मिली है और अब दावा किया जा रहा है कि वह दिन दूर नहीं, जब स्टीयरिंग पर हाथ रखने की जरूरत नहीं होगी


(जीएम) ने 1950 के दशक में फायरबर्ड II और कैडिलक साइक्लोन जैसी सपनों की कारें दिखाई थीं। विज्ञान ने अब इनमें सेंसर, लेजर, रडार सिस्टम, जीपीएस, कैमरा और माइक्रोचिप भर कर सपनों को सजीव करने की कोशिश की है।
हालांकि ज्यादातर जानकार मानते हैं कि 2025 से पहले ऐसी कार नहीं आ सकती, जो पूरी तरह बिना ड्राइवर के चल सके, लेकिन ट्रैफिक जाम में खुद से धीमे होने, अचानक जरूरत पड़ने पर ब्रेक लग जाने जैसी तकनीक तो कारों में फिट होने लगी हैं।


के रिसर्च और विकास के पूर्व प्रमुख लैरी बर्न्स का कहना है, 'यह जो कंसेप्ट है कि कार बिना ड्राइवर के चल सके, अब ज्यादा निकट दिखता है।' अब गूगल के सेल्फ ड्राइविंग कार प्रोजेक्ट का हिस्सा बन चुके बर्न्स कहते हैं, 'यह 125 साल पुराने कार इतिहास का सबसे बड़ा पड़ाव साबित होगा।'

50 साल की कोशिश : जीएम ने फायरबर्ड II नाम की कार बनाई थी, जो सड़कों पर बिजली की तार से जुड़ी होती थी और कार को दिशा बताती थी। तीन साल बाद साइक्लोन कार आई, जिसका आगे का हिस्सा किसी विमान की तरह दिखता था। इसमें जरूरत पड़ने पर खुद ब्रेक लग जने की सुविधा डाली गई थी। बाद में टोयोटा, फोक्सवागेन और फोर्ड जैसी कंपनियों ने भी इस दिशा में काम शुरू कर दिया, जिससे दुर्घटनाएं कम की जा सके।
गूगल प्रोग्राम के तकनीकी प्रमुख क्रिस उर्मसन का कहना है, 'किसी जमाने में हम घोड़ों की सवारी करते थे और आज वे मनोरंजन का साधन हैं। इसी तरह कार भी हमारे मनोरंजन का साधन बन सकती हैं।'

अमेरिका के नेवाडा और फ्लोरिडा राज्यों ने ऐसा कानून बना लिया है, जो खुद से चलने वाली कारों को सड़कों पर चलने की इजाजत देती है। मुख्य मकसद है कि ड्राइवरों का काम आसान हो लेकिन आखिरी लक्ष्य है कि कार के अंदर से स्टीयरिंग व्हील को पूरी तरह निकाल दिया जाए और किसी तरह के हादसे की संभावना भी खत्म कर दी जाए।
जीएम के तकनीकी विभाग के नेडी बोल्स का कहना है, 'अगर हमारे पास ऐसी तकनीक आ जाए, जिससे दुर्घटना न हो, तो फिर हम उसका इस्तेमाल क्यों नहीं करेंगे।' हालांकि उनका यह दावा अलग बात है और जनता का विश्वास जीतना अलग बात, क्योंकि रोबोट भी उस तरह लोकप्रिय नहीं हो पाए, जैसी योजना थी। इसके अलावा ड्राइविंग करके रोजी रोटी कमाने वाले करोड़ों लोगों के भविष्य का भी सवाल है।
नहीं चाहते ऑटो पायलट कार : मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के ब्रायन राइमर का कहना है कि लोग ऐसी तकनीक चाहते हैं, जो ड्राइवर की ज्यादा से ज्यादा मदद कर सके लेकिन ऐसी तकनीक नहीं चाहते, जो ड्राइवर का रोल ही खत्म कर दे। वह बीएमडब्ल्यू, फोर्ड और टोयोटा जैसी कंपनियों के साथ काम कर चुके हैं।

जेडी पावर एंड एसोसिएट्स के सर्वे से पता लगता है कि अमेरिका के 37 फीसदी लोग चाहते हैं कि ऐसी तकनीक बने, जो ड्राइवरों के लिए ज्यादा से ज्यादा मददगार साबित हो, जबकि 20 फीसदी लोग 3,000 डॉलर तक खर्च करके इस तकनीक को खरीदने के लिए तैयार होंगे।
इन आंकड़ों के अलावा ऐसा ढांचा भी बनाना जरूरी है, जहां ऐसी कारें चल सकें। इसमें तकनीक के अलावा कानून भी शामिल है। जाहिर है कि काफी समय लगेगा।

बीमा कंपनी नेशनवाइड म्युचुअल के बिल विंडसर हवाई उद्योग की तरफ इशारा करके कहते हैं कि विमानों में तो ऑटो पायलट पता नहीं कब से चल रहा है, फिर भी उनमें कॉकपिट बनाया जाता है, 'इसमें लंबा वक्त लगेगा कि जब हम खुद को ऐसी कारों में चलते वक्त सहज महसूस कर सकें।'
कीमत है जंजाल : इसके अलावा लागत भी घटानी जरूरी है। गूगल की लेजर वाली लाइट तकनीक और रेंजिंग सिस्टम में 70,000 डॉलर लगते हैं। इसे देखते हुए लगता है कि आने वाले दस सालों में ज्यादा ध्यान ऐसी तकनीक पर होगी कि ड्राइवरों को ज्यादा मदद मिले न कि ऐसी कारों पर जो खुद से चल सकें।

गूगल ने 2010 में ऑटोनोमस कार प्रोग्राम की शुरुआत की थी। इसने टोयोटा प्रायस और लेक्जज आरएक्स 450 कारों पर इसका प्रयोग किया। इन्हें 5,000 किलोमीटर से ज्यादा चलाया गया। गूगल के सीईओ एरिक श्मिट का दावा है कि हमारी जिन्दगी में ही हमें अपने आप चलने वाली कारें देखने को मिल जाएंगी।
पिछले साल गूगल की एक ऐसी कार हादसे का शिकार हो गई थी, जो खुद से चलती थी, लेकिन फिर भी तर्क दिया गया कि रोबोट इंसानों से बेहतर ड्राइवर साबित होंगे।

- एजेए/ओएसजे (रॉयटर्स)



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