पाकिस्तान: धार्मिक अस्मिता को चुनौती

DW| पुनः संशोधित मंगलवार, 14 अगस्त 2012 (14:13 IST)
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पाकिस्तान इस साल आजादी की 65वीं सालगिरह मना रहा है। धार्मिक उन्माद और कट्टरपंथ के प्रसार के बीच आस्था के नाम पर बने राष्ट्र की धार्मिक बुनियाद को चुनौती मिल रही है।


इस्लामिक रिपब्लिक पाकिस्तान में बहुत से लोग हैं जो सोचते हैं कि ऐसे देश की आजादी पर जश्न मनाने के लिए बहुत कुछ नहीं है जिसकी अर्थव्यवस्था विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष पर निर्भर है। मुद्रास्फीति और बेरोजगारी ने पाकिस्तान को बुरी तरह जकड़ रखा है और बहुत से युवा पाकिस्तानी नौकरी की तलाश में मुल्क छोड़ने को बेकरार हैं।
दूसरी ओर बहुत से ऐसे लोग भी हैं जो मानते हैं कि पाकिस्तान विफल राष्ट्र नहीं है। वे इसके जीवंत नागरिक समाज, भ्रष्टाचार के बावजूद काम करती विधायिका और अक्षम होने के बावजूद कुछ हद तक स्वतंत्र न्यापालिका की ओर इशारा करते हैं।


पाकिस्तान की सर्वशक्तिमान सेना के आलोचक लोकतंत्र को फलने फूलने की इजाजत न देने और अपने हितों के लिए धार्मिक कट्टरपंथ को बढ़ावा देने के लिए सेना के जनरलों को जिम्मेदार ठहराते हैं।

विभाजन का गम : पाकिस्तान के बहुत से लोग अब 1947 में हुए विभाजन पर भी सवाल उठाने लगे हैं। इस्लामाबाद के फिल्मकार और सामाजिक कार्यकर्ता वजाहत मलिक भारत के विभाजन को 20वीं सदी की सबसे बड़ी भूलों में से एक बताते हैं।

वे पूछते हैं, 'भारत के विभाजन से उपमहाद्वीप के मुसलमानों का क्या लाभ हुआ, सिवाय इसके कि वे तीन देशों में बिखरे पड़े हैं और जातीय तथा सांप्रादायिक हिंसा का निशाना बन रहे हैं?' वे कहते हैं कि आज धर्मांधता, कट्टरपंथ और कबायलीपन धर्म के नाम पर बने देश की जड़े हिला रहा है।
लेकिन पाकिस्तान के सारे युवा ऐसा नहीं सोचते। संयुक्त अरब अमीरात में रहने वाले सरवर अली का मानना है कि भारत का विभाजन द्वितीय विश्व युद्ध का रोका न जा सकने वाला नतीजा था। पाकिस्तानी उद्यमी ओमर कुरैशी मानते हैं कि इस्लामी राज्य का विचार गलत नहीं था क्योंकि यह लोगों के विकास के लिए फायदेमंद था, लेकिन उनके विचार में पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्नाह अपने उत्तराधिकारियों में अपनी राजनीतिक सूझबूझ और दूरदर्शिता नहीं दे पाए।
भारत के साथ सुलह : पाकिस्तान और भारत ने विभाजन के बाद से तीन युद्ध लड़े हैं। उदारवादी युवा पाकिस्तानियों का मानना है कि अतीत को भूलकर वर्तमान पर ध्यान देना जरूरी है। उनके विचार में पाकिस्तान को अपनी धार्मिक पहचान छोड़कर नई शुरुआत करने की जरूरत है। भारत और इलाके के दूसरे देशों के साथ रिश्तों को बेहतर बनाने की आवश्यकता है। उनका मानना है कि पाकिस्तान तब तक प्रगति नहीं कर सकता जब तक वह पड़ोसियों के साथ सुलह न करे।
फिल्मकार वजाहत मलिक मानते हैं कि भारत और पाकिस्तान के लिए निकट रिश्ते बनाने का सबसे अच्छा रास्ता लोगों के बीच ज्यादा मेलजोल है। इसके लिए आम लोगों का मिलना जुलना, व्यापार और पर्यटन जरूरी है। वे कहते हैं, 'यदि लोग साथ आएंगे तो सरकारें भी पीछे पीछे आएंगी।'

कराची की एक इंटरनेट कंपनी में काम करने वाले खिजार शरीफ का कहना है कि जब तक भारत और पाकिस्तान अपनी सेनाओं पर खर्च में कटौती नहीं करते और लोगों की खुशहाली पर ज्यादा खर्च नहीं करते दोनों देशों के बीच कोई हल नहीं निकलेगा।
लेकिन डांसर सुहाई एब्रो को ज्यादा उम्मीदें हैं। वे कहती हैं, 'हमें पाकिस्तान और बारत दोनों ही देशों के लोगों से ज्यादा समर्थन चाहिए। यह लम्बा रास्ता है और हमें धीरज रखना होगा। मुझे विश्वास है कि बदलाव आएगा।'

रिपोर्ट: शामिल शम्स/एमजे
संपादन: निखिल रंजन



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