संपाति और जटायु के लुप्त होते वंशज

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पुराणों के अनुसार संपाति और जटायु दो गिद्ध-बंधु थे। संपा‍ति बड़ा था और जटायु छोटा। ये दोनों विंध्याचल पर्वत की तलहटी में रहने वाले निशाकर ऋषि की सेवा करते थे। कहते हैं, एक बार वृत्रासुर का छलकपट से वध कर लौटते समय इंद्र की भेंट, इन दोनों से हुई। इंद्र के छलकपटपूर्ण व्यवहार को लेकर इनकी उससे बहुत बहस हुई और फिर युद्ध हुआ। इंद्र ने अपने वज्र से संपाति को घायल कर दिया और जटायु का पीछा करने लगा। तब संपाति ने अपने पंख फैलाकर भाई जटायु की रक्षा की। इस युद्ध में दोनों के पंख इतने घायल हो गए थे कि जटायु थककर बस्ती में और संपाति निशाकर ऋषि के आश्रम के पास गिरा। तब निशाकर ऋषि ने इसे शरण दी।

रामकथा में भी जटायु और संपाति ने बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 'वाल्मी‍कि रामायण' के अनुसार सीता का हरण कर रावण जब लौट रहा था तो जटायु ने पहले रावण को उपदेश देकर समझाया। उपदेश में जटायु ने रावण को वेदतत्व बताकर दूसरे की स्त्री का अपहरण करना पाप बताया। उसने कहा - 'तुम चुपचाप सीता को छोड़ दो, अन्यथा परिणाम अच्छा न होगा।' परंतु रावण नहीं माना। तब दोनों में युद्ध छिड़ा। जटायु ने अपने नाखूनों और चोंच से रावण को घायल कर दिया? किंतु रावण ने भी इसके पंख काटकर उसे अधमरा करके छोड़ दिया और सीता को लेकर चला गया। बाद में सीता को खोजते हुए जब राम-लक्ष्मण आए तो उन्होंने सारी बात सुनी और जटायु का दाह-संस्कार किया।

संपाति के पुत्र सुपार्श्व ने सीता को ले जा रहे रावण को रोका और उससे युद्ध के लिए तैयार हो गया। किंतु रावण उसके सामने गिड़गिड़ाने लगा और इस तरह वहाँ से बचकर निकल आया। बाद में जब अंगद आदि सीता की खोज करते हुए संपा‍ति से मिले तो उन्होंने जटायु की मृत्यु का समाचार दिया। इसने तब अंगद को रावण द्वारा सीता हरण की पुष्टि की और अपनी दूरदृष्टि से देखकर बताया कि वह अशोक वाटिका में सुरक्षित बैठी हैं। इस प्रकार रामकथा में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गिद्ध-बंधु संपाति और जटायु अमर हो गए। गिद्ध या गरुड़ को विष्णु की सवारी होने का गौरव भी प्राप्त है। वह उनके ध्वज के शीर्ष पर विद्यमान है।

किंतु अब वही गिद्ध दुर्लभ होते जा रहे हैं। उनकी संख्‍या कम हो रही है। जबकि गिद्ध, हमारे वनों में पर्यावरण को शुद्ध और पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। पक्षी जगत का यह एक बड़ा पक्षी होने के साथ-साथ जंगल में जानवरों को खाकर वहाँ प्रदूषण फैलने से रोकता है। गिद्ध का अधिकतम आकार नब्बे से.ी. तक पाया जाता है। इसके पंखों का रंग हल्का मटमैला होता है। पूँछ अंतिम सिरे पर कुछ गोलाई लिए होती है किंतु अधिक बड़ी नहीं होती। पंखों के अंदर एक सफेद रंग का पट्‍टा होता है। गिद्ध बड़ी ऊँचाई तक उड़ता है।

गिद्ध, हमारे वनों में पर्यावरण को शुद्ध और पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। पक्षी जगत का यह एक बड़ा पक्षी होने के साथ-साथ जंगल में जानवरों को खाकर वहाँ प्रदूषण फैलने से रोकता है।
यह वहीं से अपना भोजन देख लेता है। गिद्ध का भोजन सामूहिक रूप से होता है। इनका मुख्‍य भोजन मरे हुए पशु होते हैं। जब किसी गिद्ध को पशु शव दिखाई देता है तो वह पशु शव की ओर तेज गति से आता है। अपने साथी की यह क्रिया देख अन्य गिद्ध भोजन उपलब्ध होने का अनुमान लगा लेते हैं और कुछ ही समय में बड़ी संख्‍या गिद्ध वहाँ पहुँच जाते हैं।

पशु शव का मांस ये इतनी तेजी से खाते हैं कि कुछ ही समय में वहाँ केवल हड्‍डियों का कंकाल बच जाता है। पक्षी विशेषज्ञों के अनुसार हाल ही के वर्षों में गिद्धों की संख्‍या में निरंतर गिरावट आ रही है। पक्षी अभयारण्यों में इनकी विभिन्न प्रजातियों को बढ़ाने की योजनाएँ शुरू की गई हैं। गिद्ध न केवल मृत पशु खाते हैं बल्कि खेतों और जंगल के पेड़ों में रहने वाले चूहों आदि को भी मारकर खा जाते हैं। इस प्रकार इन्हें 'प्राकृतिक सफाई दरोगा' कहा जाता है। एक समाचार के अनुसार गिद्धों के संरक्षण के लिए 'मुंबई नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी' ने केंद्र और राज्य सरकारों के साथ मिलकर एक बारह वर्षीय योजना हाथ में ली है जिसमें कई करोड़ रुपए खर्च होंगे।

संपाति और जटायु की संतानों को पक्षिराज का सम्मान प्राप्त है। पक्षियों के राजा का संरक्षण पारिस्थितिकीय एवं पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसकी रक्षा के सभी संभव उपाय किए जाने चाहिए।

- डॉ. हरिकृष्ण देवसरे
(लेखक 'पराग' के पूर्व संपादक और प्रसिद्ध बाल साहित्यकार हैं।)



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