जैन धर्म में लक्ष्मी यानी निर्वाण

- मुनि पुलकसागर

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में दीपावली के दिन अंतिम प्रातःकाल की प्राप्ति और उनके प्रमुख शिष्य गौतम गणधर को संध्या के समय परम बोधि कैवल्यज्ञान की प्राप्ति हुई। ज्ञान ज्योति का प्रतीक है जो स्वयं भी प्रकाशित होता है और दूसरों को भी प्रकाशित करता है। उसी के प्रतीक स्वरूप दीपावली पर्व मनाया जाता है।

भगवान महावीर को मोक्ष लक्ष्मी की प्राप्ति हुई और गौतम गणधर को कैवल्यज्ञान की सरस्वती की प्राप्ति हुई, इसलिए लक्ष्मी-सरस्वती का पूजन इस दिन की जाती है। लक्ष्मी पूजा के नाम पर रुपए-पैसों की पूजा जैन धर्म में स्वीकृत नहीं है, यह धर्म तो अपरिग्रहवाद का धर्म है।

भगवान महावीर ने भौतिक संपदा नहीं, आध्यात्मिक संपदा की प्राप्ति के लिए भौतिक संपदाएँ छोड़ी जाती हैं, उनकी पूजा नहीं की जाती। दुनिया में सफलता पुरुषार्थ से मिलती है और पुरुषार्थ धन-दौलत को समेटने में नहीं, समेटी हुई दौलत को छोड़ने में करना पड़ता है। हमारे यहाँ लक्ष्मी और सरस्वती इन दो देवियों की मान्यता है। लक्ष्मी पूजने योग्य तो है पर विश्वास के काबिल नहीं है, वह आज हमारी है कल किसी और की हो जाएगी, लेकिन सरस्वती पूजने योग्य भी है और विश्वास के काबिल भी।
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आपने देखा होगा कि कई लखपति रातोंरात खाकपति हो जाते हैं पर ऐसा कभी नहीं सुना होगा कि कोई ज्ञानी रातोंरात बुद्धू बन गया हो। जैन धर्म में लक्ष्मी का अर्थ होता है निर्वाण और सरस्वती का अर्थ होता है कैवल्यज्ञान, इसलिए प्रातःकाल जैन मंदिरों में भगवान महावीर स्वामी का निर्वाण उत्सव मनाते समय भगवान की पूजा में लड्डू चढ़ाए जाते हैं।
लड्डू गोल होता है, मीठा होता है, सबको प्रिय होता है। गोल होने का अर्थ होता है जिसका न आरंभ है न अंत है। अखंड लड्डू की तरह हमारी आत्मा होती है जिसका न आरंभ होता है और न ही अंत। लड्डू बनाते समय बूँदी को कड़ाही में तपना पड़ता है और तपने के बाद उन्हें चाशनी में डाला जाता है। उसी प्रकार अखंड आत्मा को भी तपश्चरण की आग में तपना पड़ता है तभी मोक्षरूपी चाशनी की मधुरता मिलती है। उसी दिन यह आत्मा जगत को प्रिय लगने लगती है।
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दीपावली दीपों का त्योहार है, धुएँ का नहीं। अमावस्या की अँधेरी रात में भगवान महावीर ने आत्मज्ञान की ज्योति जलाकर सारे जगत को रोशन कर दिया। हम भी उनसे प्रेरणा लेकर अँधेरों को रोशन करने का प्रयास करें। लोगों को मिठाइयाँ तो बहुत बाँटी, पर अब दुखी के आँसू पोंछकर खुशियाँ मनाएँ। द्वेष और दुश्मनी से दूसरों को बहुत जीत लिया, प्रेम और साधना से अपने आपको जीतो, दूसरों को जीतने वाला वीर होता है और अपने आपको जीतने वाला महावीर होता है।
दीपावली मनाएँ पर किसी का दीप न बुझे, किसी का घर न जले। तभी सार्थक होगी दीपावली। आपकी आतिशबाजी का जोरदार धमाका पशु-पक्षियों और जानवरों की नींद ही हराम नहीं करता, बल्कि उन्हें भयभीत कर अंधा, बहरा करके मौत के मुँह में भी डालता है। विषैला और जहरीला यह बारूद का धुआँ वातावरण को प्रदूषित कर स्वास्थ्य और पर्यावरण का नाश करता है।
दीपावली पर मंत्र जाप करें, साधना करें, सिद्धि करें, प्रभु का स्मरण करें। लाल वस्त्र पहनकर, लाल आसन पर, लाल माला से रात्रि 12 बजे से अपने आराध्य, अपने इष्ट के नाम से माला जपें क्योंकि इस शुभ नक्षत्र से मंत्रों में दैवीय शक्ति प्रकट होती है जो हमें विघ्न बाधाओं, आपदाओं व प्रतिकूलताओं से बचाती है।

 

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