विश्व शांति का प्रतीक अजमेर उर्स

हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक ख्वाजा की दरगाह

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हिंदू-मुस्लिम एकता एवं शुरू होने वाला है। आपसी भाई चारे की सबसे बड़ी पहचान यह है कि महान हजरत ख्वाजा पर चढ़ाए जाने वाले फूल से आते हैं तो पुष्कर पर चढ़ाई जाने वाली पूजा सामग्री की खीलें दरगाह ख्वाजा साहब के बाजार से ही जाती हैं।

आपसी भाईचारे की इससे अधिक अच्छी और क्या मिसाल हो सकती है? अजमेर में कभी भी हिंदू-मुस्लिम तनाव नहीं देखा गया। यहां के बहुत से गैर मुस्लिम रमजान के मास में दरगाह में आकर रोजा खोलते हैं।

प्राचीन काल में अजमेर का राज्य बड़ा विस्तृत था, इसीलिए कहा जाता रहा है - 'अजमेरा रे मायने चार चीज सरनाम, ख्वाजा साहब की दरगाह कहिए, पुष्कर का असनान मकराणा में पत्थर निपजे, सांभर लूण की खान।' इन चार मुख्य स्थानों में ख्वाजा साहब की दरगाह को अधिक महत्व दिया गया है। इसका कारण यह भी हो सकता है कि अजमेर आने वाले लगभग सभी लोग दरगाह आया करते हैं। इसीलिए 'होली बायोग्राफी' के लेखक मिर्जा वहीदुद्दीन बेग ने ख्वाजा साहब की दरगाह को कौमी एकता का सदा बहार सरचश्मा कहा है। यह अजमेर नगर में जड़े हीरे की भांति है।

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ख्वाजा के दरबार में वर्ष भर आने वाले यात्रियों का तांता लगा रहता है। दरगाह के गोल गुंबद पर लगा स्वर्ण कलश मानो दूर से ही आने वाले जायरीनों को आमंत्रित करता है। फिर रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, शहर के मुख्य स्थानों, दरगाह बाजार और दरगाह के द्वार पर गरीब नवाज की दरगाह के खादिम आपकी अगवानी के लिए तैयार रहते हैं। शायद इसी खिदमत की भावना को ध्यान में रखते हुए राजस्थान राज्य पर्यटन विकास निगम द्वारा अपने टूरिस्ट बंगलों का नाम भी खादिम पर्यटक विश्राम रखा गया है।

अरबी माह रजब की एक से छ: तारीख तक गरीब नवाज ख्वाजा मुईनुद्दीन हसन चिश्ती के उर्स मेले के मौके पर तो अजमेर और खासतौर से दरगाह शरीफ और दरगाह बाजार की रौनक देखते ही बनती है। लेकिन उस समय ऐसा मंजर नहीं था जब 50-52 वर्ष की उम्र में ख्वाजा साहब अजमेर आए थे। नाग पहाड़ की तलहटी में आना सागर झील के किनारे हरे-भरे सुरम्य वातावरण के बीच उसे अजमेर नगर ने अपना स्थायी मुकाम निर्धारित करने के लिए अवश्य प्रेरित किया होगा।

सम्राट पृथ्वीराज चौहान के समकालीन कवि जयानक ने 'पृथ्वीराज विजय' नामक संस्कृत ग्रंथ में अजमेर नगर के सौंदर्य और वैभव का सुंदर वर्णन किया है। यह ग्रंथ पृथ्वीराज की गौरी से हुई युद्ध विजय के बाद सन 1190 के आस-पास लिखा गया था।

महाकवि जयानक ने लिखा है- 'अजमेर में बहुत से देवी-देवताओं के मंदिर हैं। अतः इसे देवी-देवताओं का स्थान कहा जाए तो अनुचित नहीं है। स्थान-स्थान पर हवन होते रहते हैं जिससे पर्याप्त वर्षा होती है।'

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अजमेर निवासियों की भगवान शिव के प्रति गहरी श्रद्धा है। इसलिए स्त्रियों के हृदय में ही कामदेव का निवास स्थान है। यहां की पहाड़ी पर बने किले के कुएं और तालाबों में भी पर्याप्त जल उपलब्ध है। इस शहर का बढ़ता हुआ वैभव इंद्रपुरी को भी मात देता है। यहां के लोगों को पुष्कर का पवित्र जल उपलब्ध है।

यहां पर संगमरमर के दुग्ध धवल भवन चन्द्रमा के कलंकित सौंदर्य को भी पीछे छोड़ देते हैं। स्वर्ण की बनी हुई लंका जिस पर भगवान राम ने समुद्र पार कर विजय प्राप्त की थी और द्वारिका जिसकी स्थापना भगवान श्रीकृष्ण द्वारा की गई थी, वे अजमेर नगरी की दासी बनने के योग्य भी नहीं है।

उस समय की ऐसी खूबसूरत नगरी को ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती ने अपना मुकाम बनाया और सूफी मत का प्रचार किया। सूफी मत की यह खूबी है कि आपस में भाईचारे की तालीम लोगों को दें। सूफी सब दूसरे बड़े साधु-संतों ने जो दुनिया को तालीम दी, उसमें सबसे पहले यह बात आती है कि तुम किसी के मजहब को बुरा मत कहो, हर मजहब का आदर करो। यदि तुम अपने मजहब का आदर करना चाहते हो तो दूसरे मजहब का आदर करना भी सीखो। मकसद है सूफियों का।

सूफी मत की इसी मान्यता के अनुसार अजमेर की दरगाह में जो खास मेहमान आते हैं उन्हें उनके धर्म की ही पुस्तक गीता, रामायण, कुरान शरीफ, बाइबल आदि भेंट की जाती हैं।

ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी ने लिखा है, 'मैं बीस वर्ष तक ख्वाजा साहब की खिदमत में हाजिर रहा लेकिन मैंने कभी उनको अपनी सेहत (स्वास्थ्य) के लिए दुआ मांगते नहीं देखा। जब कभी दुआ मांगते तो दर्द की दुआ मांगते। एक बार मैंने पूछा, 'हुजूर आप यह क्या दुआ मांगा करते हैं?' तो ख्वाजा साहब ने जवाब दिया, 'दर्द से ही ईमान पैदा होता और गुनाहों से इंसान ऐसा पाक साफ हो जाता है जैसे अभी पैदा हुआ हो।'

सन्‌ 1233 ई. में 91 वर्ष की उम्र में ख्वाजा साहब का इंतकाल हो गया और करीब 350 वर्ष तक उनकी मजार साधारण संतों की तरह की ही थी। 16वीं शताब्दी में सम्राट अकबर के समय में दरगाह की मान्यता बढ़ी। बादशाह ने दरगाह के रखरखाव के लिए 18 गांव दिए और कुछ मुलाजिम रखे गए जो अब भी पुश्तैनी रूप में काम कर रहे हैं।

शहंशाह अकबर के बारे में एक धारणा है के जब उनकी कोई संतान उत्पन्न नहीं हुई तो किसी ने राय दी कि वे ख्वाजा साहब की अजमेर दरगाह पर जाएं और प्रार्थना करें। बादशाह ने ऐसा ही किया और उनकी हैरानी की हद नहीं रही के जब उन्हें पुत्र प्राप्ति हुई। पुत्र प्राप्ति पर बादशाह स्वयं सन्‌ 1570 में आगरा से अजमेर पैदल चल कर आए और दरगाह में मस्जिद बनवाई जो अकबरी मस्जिद कहलाती है।

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- फिरोज बख्त अहमद
इसी प्रकार से दरगाह में बुलंद दरवाजा, शाहजहानी दरवाजा, निजाम दरवाजा, शाहजहानी मस्जिद महफिलखाना आदि इमारतें भी बनवाई गईं। बादशाह शाहजहां की पुत्री जहांआरा ख्वाजा साहब की मुरीद थी। उसने मजार शरीफ के बाहर खूबसूरत दालान बनवाया जो बेगमी दालान कहलाता है। ऐसी दालान में अमृतसर के गुरुद्वारा से प्राप्त झाड़ लगा हुआ है।



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