पिता हैं दिल के इतने करीब...

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-निहारिका झा

कहते हैं बेटा माँ का लाडला होता है और बेटियाँ पिता की दुलारी। पिता संरक्षक, सलाहकार और एक मित्र की तरह अपने बच्चों से जुड़ा रहता है। भारतीय परंपरा रही है कि पिता ही घर का मुखिया होत है, तो जाहिर है घर के अहम फैसले में उसी की निर्णायक भूमिका होगी। ऐसे में एक पिता ही अपने बच्चों के भविष्य का निर्माता होता है। खासतौर से बेटियों के भविष्य का आकार पूरी तरह पिता ही गढ़ता है। यह बात अलग है कि महिलाओं की आत्मनिर्भता के प्रतिशत में वृद्धि होने से उनकी दखल इस क्षेत्र में हुई है और वे भी अपने बच्चों के भविष्य निर्माण की योजनाओं में बराबर भागीदारी कर रही हैं, लेकिन ऐसे माँओं की संख्या तो मुट्ठीभर ही है। फिर ऐसे में भविष्य निर्माता तो पिता ही होते हैं और बेटियों का पूरा भविष्य भी उन्हीं पर निर्भर होता है।

मान्यता है कि बेटियाँ पराया धन होती हैं, उन्हें जितनी जल्दी अपने घर भेज दो उतना ही अच्छा होता है, और इस परंपरा का निर्वाह करते हुए उन्हें जल्द ही विदा भी कर दिया जाता है। ऐसी सोच के बीच पनपता हमारा समाज धीरे-धीरे उन्मुक्तता की ओर बढ़ रहा है। ज्यों-ज्यों समाज प्रगतिशील होता गया, त्यों-त्यों पिता की भूमिका और विचारों में भी परिवर्तन होता गया। अब तो बेटे से पहले वे अपनी बेटियों के भविष्य को संवारने की योजना बनाते हैं। तभी बेटी और पिता का रिश्ता इतना प्रगाढ़ होता है। अपने पिता की हर छोटी-छोटी बातों का ख्याल रखने वाली बेटियाँ पिता के इतने करीब होतीहैं। जीवन के हर मोड़ पर अगर उनका मार्गदशर्न मिलता रहता है तो बच्चों के पैर कभी नहीं डगमगाएँगे।
पिता और बेटी के इस रिश्ते पर गहराई से विचार करें तो हमें बरबस ही जवाहार लाल नेहरू और इंदिरा का ध्यान हो आता हैं। इंदिरा के जीवन पर उनका गहरा असर था। कई बार हालाल ऐसे बनते थे कि उनका कई-कई महीनों तक मिलना नहीं हो पाता था, लेकिन एक पिता का दिल अपनी प्यारी बिटिया को याद करता रहता था। यही वजह थी कि नेहरूजी ने लगातार इंदिरा को चिट्ठियाँ लिखीं, यहाँ तक कि जेल में भी रहकर उनसे संपर्क बनाए रहते और उन्हें कई तरह की गतिविविधयों की नकारी देते। ये चिट्ठियाँ किताब के रूप में भी प्रकाशित की गईं। बेटियों के प्रति पिता का प्रेम इतना गहरा होता है कि महाकवि निराला अपनी बेटी को असमयखो देने पर इतने व्यथित हुए, जिसकी टीस 'सरोज-स्मृति' की हरेक पंक्ति में महसूस होती हैः
''मुझ भाग्यहीन की तू संबल,
युग वर्ष बाद जब हुई विकल,
दुःख ही जीवन की कथा रही,
क्या कहूँ जो आज नहीं कही।''

समय के साथ रिश्तों के बदलते परिदृश्य का प्रभाव सिनेमा से लेकर टेलीविजन पर भी पड़ रहा है। विगत वर्षों में टेलीविजन पर सास-बहू के झगड़े और उनकी षड्यंत्रकारी योजनाओं की ही खिचड़ी पकती रहती थी, लेकिन पिता और बेटी के कोमल रिश्ते को भी विषय के रूप में चुना जा रहा है और कई चैनल पर ऐसे धारावाहिक बनाए जा रहे हैं। फिल्मों में भी बाप-बेटी का यह रिश्ता मुखर होकर सामने आ रहा है। 'बाबुल' जैसी फिल्में उसी बदलाव की ओर इशारा कर रही है। ऐसे में 'फादर्स डे' की महत्ता और बढ़ जाती है, जहाँ उनसे दिल का रिश्ता इतना करीब हो।

 

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