हँसने के लिए क्लब क्यों जाना?

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हँसना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, जिससे शरीर में सकारात्मक रासायनिक परिवर्तन होते हैं। स्वच्छ और निर्मल हँसी से स्वास्थ्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। आज हमारे सामाजिक जीवन से स्वाभाविक हास्य नदारद होता जा रहा है

ग्रामीण क्षेत्रों ने भले ही अभी हास्य क्लबों की जरूरत महसूस न की हो, लेकिन शहरों में हास्य क्लब खुल गए हैं, जो हर सुबह किसी पार्क में कृत्रिम हास्य के झूठे ठहाके लगाने का शारीरिक परिश्रम करते हैं। यदि हँसी अंदर से फूटकर नहीं निकलती है तो वह हँसी का अभिनय कहलाता है, जिससे कोई फायदा नहीं होता है।

आप हँसने के लिए क्लब क्यों जाना चाहते हैं? आप जब चाहें, जहाँ चाहें, जैसे चाहें हँस सकते हैं। इसके लिए किसी कृत्रिम सहारे की क्या जरूरत है?

  एक फोन आया। वो बोला- कौन बोल रहे हो? मैं बोला- मैं बोल रहा हूँ? वो बोला- कमाल है, मैं भी मैं ही बोल रहा हूँ? लीजिए आ गई हँसी। फिर उसने अपना नाम बताया, मैंने अपना नाम बताया और दोनों ने मिलकर एक जोरदार ठहाका लगाया।      
एक फोन आया। वो बोला- कौन बोल रहे हो? मैं बोला- मैं बोल रहा हूँ? वो बोला- कमाल है, मैं भी मैं ही बोल रहा हूँ? लीजिए आ गई हँसी। फिर उसने अपना नाम बताया, मैंने अपना नाम बताया और दोनों ने मिलकर एक जोरदार ठहाका लगाया।

दिल खोलकर हँसिए वास्तविक हँसी-
सोचिए मुस्कुराना या हँसना कितना आसान है और कितना मुश्किल, आज किसी के लिए खुश होना, मुस्कुराना, हँसना इतना महँगा हो गया है कि एक वयस्क दिनभर में दस बार भी नहीं हँसता, जबकि एक मासूम दिन में कम से कम चार सौ दफा मुस्कुराता है, हँसता है,
खिलखिलाता है।

सामाजिक जटिलताएँ इतनी बढ़ गई हैं कि जो हास्य पूरी दुनिया में कदम-कदम पर बिखरा पड़ा है उसे पाने के लिए लॉफ्टर क्लब का सहारा लेना पड़ रहा है।

जरा सोचिए जो व्यक्ति मन से प्रसन्न नहीं है, फिर भी वह हँसेगा तो उस हँसी में क्या वही मस्ती होगी जो वास्तविक प्रसन्नता से होती है ? जब वास्तविक हँसी आती है तो रोके नहीं रुकती है, हँसते-हँसते इंसान दोहरा हो जाता है तो लॉफ्टर क्लब की नकली हँसी में असली जैसा प्रभाव कहाँ से लाएगा?

डॉ. राजेश अग्रवाल (एमडी)



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