दमे का निकालें दम!

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-डॉ. मनोज शर्मा

साँस लेने में तकलीफ को 'दमा' कहा जाता है। अगर दमा शब्द को थोड़ा लय में उच्चारित किया जाए तो वह स्वतः ही परिभाषित हो जाता है।

एक बार लय में बोलकर देखिए। 'दमाऽऽऽ' बिलकुल सही, दम+आ=दमा। अर्थात यहाँ दम को आने के लिए न्योता दिया जा रहा है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो अमरीका के एलर्जी विशेषज्ञ डॉ. पीटर क्रेटिकोस का कहना है कि अस्थमा (दमा) का अर्थ है साँस की नली में ऐंठन आने लगना। साँस की नली में यकायक खिंचाव आने लगता है। सीने में कड़ापन महसूस होने लगता है। रोगी को साँस लेने में तकलीफ होने लगती है एवं वह घबराते हुए खाँसने लगता है।

नाक के द्वारा शरीर के अंदर जाने वाली हवा बड़ी साँस नली तथा उसके बाद छोटी-छोटी श्वास नलियों से गुजरकर फेफड़ों में पहुँचती है। फेफड़े श्वसन संस्थान के प्रमुख अंग हैं। किन्हीं कारणों से श्वसन संस्थान के अस्वस्थ होने के फलस्वरूप छोटी श्वास नलियों के छिद्रों में श्लेष्मा (कफ) भर जाता है अर्थात श्वास नलिका में कफ विकृत होने पर श्लेष्मा नलिकाओं के चारों ओर चिपक जाता है, जिसके कारण वायु के आवागमन में रुकावट पैदा हो जाती है। इसके कारण फेफड़ों को उचित मात्रा में प्राणवायु (ऑक्सीजन) पहुँचने में असुविधा होती है तथा इसके अभाव में यह अंग विकृत होने लगता है। श्वास नलियों की इस असुविधाजनक स्थिति को दमा कहते हैं।

औद्योगिक क्रांति के कारण विश्व में प्रदूषण बहुत बढ़ा है। विकासशील देशों में प्रदूषण बहुत अधिक है तथा इससे निपटने के लिए किए गए प्रयास बहुत कम। ऐसा निराशाजनक वातावरण दमे को फैलाने में सहायक होता है। कुहरा, आर्द्रता, हवा में धूल तथा हानिकारक गैसों के कणों के कारण बीमारी का हमला शीघ्र तथा तेज हो जाता है।

दमा रोग का विकास शरीर के दूषित रक्त के द्वारा होता है। शरीर के अन्य अवयवों की भाँति श्वास नलियों का पोषण भी रक्त के माध्यम से होता है, अतः जब दूषित रक्त फेफड़ों की नलियों में जाता है तो उसे शोधन कर उपयोग में लाने के लिए फेफड़े कफ का निर्माण करते हैं। अधिक दूषित होने के कारण कफ का निर्माण भी अधिक मात्रा में होता है, किंतु एक समय सीमा के बाद शोधन कार्य ठप हो जाता है। कफ की अधिकता होने के कारण वह बाहर निकलने के बजाए वहीं जमा होने लगता है। परिणामस्वरूप नलियों की गोलाई सिकुड़नलगती है। नलियों का आकार छोटा होने के कारण रोगी को श्वास लेने में मुश्किल होती है। दूषित रक्त होने से फेफड़े, हृदय, जिगर, आंतड़ियाँ, स्नायु मंडल आदि कमजोर हो जाते हैं, इसलिए रोग संभावनाएँ व तीव्रता बढ़ जाती है।

गलत खान-पान से पैदा हुई कब्ज भी रोग को प्रोत्साहित करती है। औद्योगिक इकाइयों मुख्यतः सीसा, पीतल, जस्ता, चीनी तथा पटसन मिलों में कार्य करने वाले श्रमिकों में इस रोग की संभावना अधिक होती है।

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आमाशय में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के अभाव से भी रोग की संभावना बढ़ जाती है। घर की धूल, फफूँदी, पालतू जानवर, पक्षियों के पंख व बाल, सौंदर्य प्रसाधनों का अधिक उपयोग, सिगरेट-बीड़ी एवं नशीले पदार्थों का अधिक उपयोग दमा रोग को निमंत्रण देता है। कुछ परिस्थितियों में यह रोग वंशानुगत भी होता है।



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