इसलिए विदा करना चाहते हैं हिन्दी

हिन्दी दिवस पर विशेष आलेख

प्रभु जोशी| Last Updated: बुधवार, 1 अक्टूबर 2014 (22:08 IST)
हमें फॉलो करें
भारत इन दिनों दुनिया के ऐसे समाजों की सूची के शीर्ष पर है, जिस पर बहुराष्ट्रीय निगमों की आसक्त और अपलक आँख निरंतर लगी हुई है। यह उसी का परिणाम है कि चिकने और चमकीले पन्नों के साथ लगातार मोटे होते जा रहे हिन्दी के कुछ दैनिक समाचार-पत्रों के पृष्ठों पर एकाएक भविष्यवादी चिंतकों की एक नई नस्ल अँगरेजी की माँद से निकलकर, बिला नागा, अपने साप्ताहिक स्तंभों में आशावादी मुस्कान से भरे अपने छायाचित्रों के साथ आती है, और हिन्दी के मूढ़ पाठकों को गरेबान पकड़कर समझाती है कि तुम्हारे यहाँ हिन्दी में अतीतजीवी अंधों की बूढ़ी आबादी इतनी अधिक हो चुकी है कि उनकी बौद्धिक-अंत्येष्टि कर देने में ही तुम्हारी बिरादरी का मोक्ष है। दरअसल कारण यह कि वह बिरादरी अपने 'आप्तवाक्यों' में हर समय 'इतिहास' का जाप करती रहती है और इसी के कारण तुम आगे नहीं बढ़ पा रहे हो। इतिहास ठिठककर तुम्हें पीछे मुड़कर देखना सिखाता है। इसलिए वह गति अवरोधक है, जबकि भविष्यातुर रहने वाले लोगों के लिए गर्दन मोड़कर पीछे देखना तक वर्ज्य है। एकदम निषिद्ध है।
इसका एक कारण तो यह भी है कि यह हिन्दुस्तान में संवाद, संचार और व्यापार की सबसे बड़ी भाषा बन चुकी है। दूसरे, इसको राजभाषा या राष्ट्रभाषा का पर्याय बना डालने की संवैधानिक भूल गाँधी की उस पीढ़ी ने कर दी, जो यह सोचती थी कि कोई भी मुल्क अपनी राष्ट्रभाषा के अभाव में स्वाधीन बना नहीं रह सकता। चूँकि भाषा सम्प्रेषण का माध्यम भर नहीं, बल्कि चिंतन प्रक्रिया एवं ज्ञान के विकास और विस्तार का भी हिस्सा होती है, उसके नष्ट होने का अर्थ एक समाज, एक संस्कृति और एक राष्ट्र का नष्ट हो जाना है। वह प्रकारांतर से राष्ट्रीय एवं जातीय अस्मिता का प्रतिरूप भी है। इस अर्थ में भाषा उस देश और समाज की एक विराट ऐतिहासिक धरोहर भी है। अतः उसका संवर्धन और संरक्षण एक अनिवार्य दायित्व है।



और भी पढ़ें :