विद्या के सागर आचार्य विद्यासागर

आचार्यश्री के जन्म दिवस 26 अक्टूबर पर विशेष

इसका संदेश है- ‘देखो नदी प्रथम है, निज को मिटाती-खोती। तभी अमित सागा रूप पाती। व्यक्तित्व के अहम को, मद को मिटा दे। तू भी 'स्व' को सहज में, प्रभु में मिला दे।‘ देश के 300 से अधिक साहित्यकारों की लेखनी मूक माटी को रेखांकित कर चुकी है। 30 से अधिक शोध, लघु प्रबंध इस पर लिखे जा चुके हैं।


करुणावंत विद्यासागरजी की दया, पीड़ा, संवेदना प्रवचनों के माध्यम से सबके सामने आती रहती है। देश की आध्यात्मिक संस्कृति, जीवन-पद्धति और अहिंसा की विरासत को नकारकर अक्षम्य अपराध किया जा रहा है। सरकार द्वारा आधुनिक कत्लखानों को आर्थिक सहायता देकर खोलने की नीति से जीवित पशुओं का कत्ल हो रहा है।

उनका माँस व चमड़ा विदेशों में निर्यात करने की नीति भारत की अहिंसा प्रधान संस्कृति के विपरीत है। पशुओं के कत्ल को कृषि उत्पादन की श्रेणी में रखा गया है। क्या पशु कारखानों में पैदा होते हैं? हिंसा को व्यापार का रूप देना कौन-सा धर्म सिखाता है? सभी धर्मों में अहिंसा आराध्य है। ऐसी अनैतिक, अमानवीय, असंवैधानिक तथा हिंसक नीति से आप ईश्वर की प्रार्थना करने के काबिल कैसे हो सकते हैं?

ईश्वर की उपासना हिंसा से घृणा सिखाती है, सभी जीवों को जीने का संदेश देती है। प्रेम, स्नेह और वात्सल्य सिखाती है। ये कत्लखाने सभी धर्मों का अपमान हैं। कोई भी धर्म हिंसा का समर्थन नहीं करता है।


कत्लखानों में बहते खून से बच्चों को क्या सीख मिलेगी? दयानिधि विद्यासागरजी का कहना है कि पशु खेत में पैदा नहीं होते हैं। ज्ञान और जीवन-दर्शन उनके भी पास है। गाय, बैल, भैंस, बकरी, घोड़ा एक दूसरे को नहीं खाते हैं, परन्तु मनुष्य इन सबको खा लेता है। उनके संरक्षण के बजाय उनके जीवन जीने के प्रकृति प्रदत्त अधिकार के साथ घोर अन्याय किया जा रहा है। खून बहाकर विदेशी मुद्रा कमाना जघन्य अपराध है। आपकी इसी अहिंसा, दया, करुणा की भावना से प्रेरणा लेकर जगह-जगह पर लोगों ने सैकड़ों गोशालाएँ खोली हैं। आपका पुरजोर आग्रह है कि पशुओं की जीवन रक्षा के लिए चमड़े से बनी सभी चीजों का उपयोग त्याग दें।

श्रमण संस्कृति के उन्नायक संत की पुनीत कामना सम्यक दृष्टि तथा संयम है। संत कमल के पुष्प के समान लोक वारिधि में रहता है, संतरण करता है, डुबकियाँ लगाता है, किन्तु डूबता नहीं।
यही भारत भूमि के यायावर संत, निर्मल-अनाग्रही दृष्टि, तीक्ष्ण मेधा, स्पष्ट वक्ता, सर्वोदयी, अध्यात्मी, सादगी, सरलता और निश्च्छलता के साक्षात भावक विद्यासागरजी के जीवन का मंत्र घोष है- विश्व मंगल आपकी पुनीत कामना है तथा सम्यक दृष्टि तथा संयम आपका जीवंत संदेश है। आपकी निर्दोष चर्या, रत्नत्रय- सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान व सम्यग्चारित्र की साधना यथार्थ में आपका जीवन दर्शन है।
आप तो मोक्ष मार्ग के लिए मोह का क्षय कर रहे सधे हुए सच्चे साधक हैं। ‍वीतराग परमात्मा पद के पथ पर सतत अग्रसर रहें, ऐसी मंगल कामना के साथ आत्मविजेता, राष्ट्रसंत के चरण-कमल में व्यक्ति स्वतः नतसिर हो जाता है। ऐसे लोककल्याणी महाश्रमण के जन्म दिवस पर मन, वचन, काय से कोटिशः नमोस्तु... नमोस्तु... नमोस्तु...।



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