विद्या के सागर आचार्य विद्यासागर

आचार्यश्री के जन्म दिवस 26 अक्टूबर पर विशेष

ऋषि प्रवर विद्यासागरजी का पहला चातुर्मास अजमेर में हुआ। इस वर्ष 40वाँ वर्षायोग ससंघ 38 मुनिराजों के साथ सागर जिले के अतिशय क्षेत्र बीनाजी-बारहा में सम्पन्न होने जा रहा है। अब तक आपने 81 मुनि, 168 आर्यिका, 8 ऐलक, 5 छुल्लक सहित कुल 262 दीक्षाएँ, वह भी बाल ब्रह्मचारी-ब्रह्मचारिणी को प्रदान की हैं।


इसके बावजूद हजार से अधिक बाल ब्रह्मचारी-बाल ब्रह्मचारिणियाँ आपसे व्रत या प्रतिमाएँ धारण कर रत्नत्रय धर्म का पालन कर रही हैं। सन्मार्ग प्रदर्शक, धर्म प्रभावक आचार्यश्री में अपने शिष्यों का संवर्धन करने का अभूतपूर्व सामर्थ्य है। आपके चुंबकीय व्यक्तित्व ने युवक-युवतियों में अध्यात्म की ज्योति जगा दी है।

दिगंबर जैन आगम के अनुसार मुनिचर्या का पूर्णतः निर्वाह करते हुए परम तपस्वी विद्यासागरजी न किसी वाहन का उपयोग करते हैं, न शरीर पर कुछ धारण करते हैं। पूर्णतः दिगंबर अवस्था में रहते हैं। पैदल ही विहार करते हैं।

आपने सन 1971 से मीठा व नमक, 1976 से रस व फल, 1985 से बिना चटाई रात्रि विश्राम, 1992 से हरी सब्जियाँ व दिन में सोने का भी त्याग कर रखा है। खटाई, मिर्च- मसालों का त्याग किए 28 वर्ष हो चुके हैं।


भोजन में काजू, बादाम, पिस्ता, छुवारे, मेवा, मिठाई, खोवा-कुल्फी जैसे व्यंजनों का सेवन भी नहीं करते हैं। आहार में सिर्फ दाल, रोटी, दलिया, चावल, जल, दूध वह भी दिन में एक बार खड़गासन मुद्रा में अंजुलि में ही लेते हैं। घड़ी के काँटे से नित्य-नियम का पालन करते हैं।
कठोर साधक विद्यासागरजी ने बाह्य आडंबरों-रूढ़ियों का विरोध किया है। आपका कहना है- कच-लुंचन और वसन-मुंचन से व्यक्ति संत नहीं बन सकता। संत बनने के लिए मन की विकृतियों का लुंचन-मुंचन करना पड़ेगा। मनुष्य श्रद्धा और विश्वास के अमृत को पीकर, विज्ञान सम्मत दृष्टि अपनाकर सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और चरित्र का अवलंबन कर आत्मा के निकट जा सकता है, आत्मोद्धार कर सकता है, मोक्ष रूपी अमरत्व को पा सकता है। कोरा ज्ञान अहं पैदा करता है।
जो व्यक्ति अपने लिए रोता है, वह स्वार्थी कहलाता है, लेकिन जो दूसरों के लिए रोता है, वह धर्मात्मा कहलाता है। धर्म को समझने के लिए सबसे पहले मंदिर जाना अनिवार्य नहीं है, बल्कि दूसरों के दुःख को समझना अत्यावश्यक है। जब तक हम दिल में किसी को जगह नहीं देंगे, तब तक हम दूसरों के दुःखों को समझ नहीं सकते।

कन्नड़ भाषी, गहन चिंतक विद्यासागरजी ने प्राकृत, अपभ्रंश, संस्कृत, हिन्दी, मराठी, बंगला और अंग्रेजी में लेखन किया है। आपके द्वारा रचित साहित्य में सर्वाधिक चर्चित कालजयी अप्रतिम कृति 'मूकमाटी' महाकाव्य है। इस कृति ने आचार्यश्री को हिन्दी और संत साहित्य जगत में काव्य की आत्मा तक पहुँचा दिया है। इसमें राष्ट्रीय अस्मिता को पुनर्जीवित किया गया है।



और भी पढ़ें :