ओबामा के भारत प्रेम के मायने

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- कन्हैयालाल नंदन
अभी-अभी अमेरिका के राष्ट्रपति पद से हटे जार्ज डब्ल्यू बुश की भारत नीति को लगता है नए राष्ट्रपति ओबामा और परवान चढ़ाना चाहते हैं। उन्होंने पहले भी संकेत दिया था और फिर राष्ट्रपति पद ग्रहण करते ही जिस तरह पाकिस्तान पर दबाव बनाना शुरू किया है, उससे साफ लगता है कि वे अपने भारत प्रेम में दो कदम आगे ही जाएँगे। गणतंत्र दिवस पर भारतीय जनता को बधाई देते हुए उन्होंने कहा है कि भारत का अमेरिका से बढ़कर अच्छा दोस्त कोई और नहीं हो सकता। उनका यह कथन इस बात का सबूत है कि वे भारत को वरीयता की श्रेणी में ही रखना चाहते हैं।

ऐसा वे अपने भारत-प्रेम के कारण नहीं कर रहे, अपने स्वार्थों के कारण कर रहे हैं।
ओबामा यह अच्छी तरह जानते हैं कि भारत का सबसे अच्छा दोस्त बनने के लिए पहले भारत को उसके पूर्व 'अच्छे दोस्तों' से अलग करना पड़ेगा





उनका स्वार्थ बहुआयामी है। सिद्धांततः दो बड़े प्रजातंत्र आपस में मित्र बनकर रहें, यह स्वाभाविक है। दूसरे, भारत अमेरिका के लिए बहुत बड़ा बाजार है। सामरिक उपकरणों का सबसे बड़ा खरीददार, जिस पर अमेरिका का अर्थतंत्र निर्भर करता है।


तीसरे, दक्षिण एशिया में पाँव जमाने के लिए अमेरिका का भारत से ज्यादा भरोसेमंद साथी फिलहाल नहीं है। पाकिस्तान से उसका मन उखड़ चुका है क्योंकि आतंकवाद के खात्मे के लिए अमेरिका जिस तरह की निष्ठा पाकिस्तान से चाहता है, वह पाकिस्तान दे पाने में असमर्थ नजर आ रहा है। जबकि भारत न केवल आतंकवाद का सीधा शिकार है, वह उससे लड़ रहा है, बल्कि उसके खात्मे के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर सबसे आगे है।

जैसा कि पूर्व प्रधानमंत्री और विदेश नीति के गहन विश्लेषक इंद्रकुमार गुजराल कहा करते हैं कि विदेश नीतियाँ भवुकताओं से नहीं, अपने-अपने राष्ट्रीय स्वार्थों से प्रेरित होती हैं। उस हिसाब से ओबामा का भारत-प्रेम अमेरिका के हितों से प्रेरित है। उनका यह कथन, कि भारत का सबसे अच्छा दोस्त अमेरिका ही हो सकता है, उसी हित साधना का एक अंग है। ओबामा यह अच्छी तरह जानते हैं कि भारत का सबसे अच्छा दोस्त बनने के लिए पहले भारत को उसके पूर्व 'अच्छे दोस्तों' से अलग करना पड़ेगा।

सामरिक साजो-सामान खरीदने में भारत का अब तक का 'अच्छा दोस्त' रूस माना जाता रहा है और भारतीय सुरक्षा का अधिकांश माल रूस से ही खरीदा जाता रहा है। अभी भी भारतीय थल सेना के लिए टी.ए टैंक और भारतीय वायुसेना के लिए सुखोई विमानों की नई किस्म की खरीद पर बातचीत चल रही है। अमेरिका रक्षा-प्रणाली का धीरे-धीरे आना शुरू हुआ है। ओबामा की निगाह भी उसी शस्त्र बाजार पर टिकी है, ऐसा इस कथन से साफ झलकता है।

जिस तरह अमेरिका दक्षिण एशिया में अपने पाँव जमाने के लिए भारत को साधने की कोशिश कर रहा है, उसी तरह मध्य एशियाई गणतंत्रों के बीच कहीं अपना पाँव जमाने की फिराक में भी है।

कभी-कभी लगता है कि शीत युद्ध का जहर अमेरिका के मन से अभी उतरा नहीं और वह रूस (और अब चीन भी) को प्रतिद्वंद्वी मानकर उसका वर्चस्व समाप्त करने की नीतियों का जाल फैला रहा है। सोवियत संघ का विघटन जरूर हो गया लेकिन न उसकी तकनीकी दक्षता बुझ गई है और न उसके दक्ष वैज्ञानिक समाप्त हुए हैं। इसलिए अमेरिका को यह संभावना सताती रहती है कि कहीं फिर से रूस उठकर खड़ा न हो जाए। इसलिए पूर्व सोवियत गणतंत्रों में रूस के प्रभाव को खत्म करना उसे जरूरी लगता है।

रूस के प्रभाव को उन गणतंत्रों से दूर करने के लिए अमेरिका के पास पश्चिम की आधुनिकता के फैशन की चकाचौंध और सिद्धांत रूप से 'खुले प्रजातंत्र' के प्रलोभन हैं। इनकी ओर आकृष्ट करके उन प्रजातंत्रों में पश्चिम के प्रति झुकाव का माहौल बनाने से अमेरिका की रुचि गहरी है। असल में उसकी नजर उक्रेन से लेकर कजाकिस्तान तक फैली हुई खनिज संपदा पर है, जहाँ वह अपना वर्चस्व चाहता है। इस क्षेत्र में उसके दो ही प्रतिद्वंद्वी हैं-रूस और चीन, जिनको वहाँ से हिलाने की कोशिश बुश भी करते रहे हैं और ओबामा भी करेंगे।

कुछ इन्हीं कारणों से अमेरिका यूरेशिया के आर्थिक संगठन 'यूरासेक' और 'शंघाई'
जिस आत्मविश्वास और दृढ़ता से भारत अपनी बात रखता है वह हमारी मजबूती का ही प्रमाण है। आशा है 'एक ध्रुवीय महाशक्ति के साथ अपने संबंध बनाने में भारत यह दृढता बनाए रखेगा और अपने 'पुराने मित्रों' की अनदेखी नहीं करेगा





सहयोग संगठन' में रूस और चीन का प्रभाव कम करने के प्रयासों को तेज कर रहा है। उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति करीमोव को अमेरिका की यह घुसपैठ रास आती दिखती है। वे अमेरिकी सुरक्षा में अपना हित देख रहे हैं और अमेरिका से अच्छे संबंधों की कोशिश में हैं। सन 2005 की अंदिजान में हुई घटनाओं के बाद से उज्बेकिस्तान अपनी विदेश नीति को पश्चिमोन्मुख बनाता रहा है। ताशकंद ने वाशिंगटन को अपने हवाई अड्डों के इस्तेमाल की इजाजत दी, जिसके बदले में ताशकंद को कृतज्ञता ज्ञापन मिला और अंदिजान में जिहादियों को मिली शह। ताशकंद ने इससे भी कोई सबक नहीं लिया।


करीमोब अब एक बार फिर पश्चिमोन्मुख हो रहे हैं। उनकी विदेश नीति रूस और अमेरिका दोनों के बीच झूल रही है और इस 'संतुलन' में वे रूस का विश्वास भी खो रहे हैं और अमेरिका का भी। उज्बेक नेता यह मान रहे हैं कि अमेरिका अपने प्रभाव को फैलाने के क्रम में इस क्षेत्र के मानवाधिकार हनन के प्रसंगों की अनदेखी करेगा और उज्बेकिस्तान में हो रहे मानवाधिकारों के हनन के प्रसंग छिप जाएँगे।

वे यह भूल रहे हैं कि अमेरिका उन्हें यह 'सुविधा' उज्बेकिस्तान में स्थायी सैन्य उपस्थिति के बदले में ही देगा। भले ही इसके लिए अमेरिका को इलाके में फैल रहे आतंकवाद और नशीले पदार्थों की तस्करी की अनदेखी करनी पड़े। उसका इरादा है कि इन गणतंत्रों में धीरे-धीरे उसकी कठपुतली सरकारें हो जाएँ जो अमेरिका को राजनीतिक और आर्थिक घुसपैठ का मौका दें। अमेरिका मानता है कि इस तरह से दुनिया में जनतंत्र की जड़ें फैलेंगी और मजबूत होंगी।

पाकिस्तान में जनतंत्र की जड़ें कितनी मजबूत हुईं यह वहाँ के लीडरान देख ही रहे हैं। और अब अमेरिका ने न केवल अपनी मदद का बकाया एक तिहाई रोक दिया है, बल्कि यह भी स्पष्ट किया है कि उसे जहाँ भी तालिबान और आतंकियों के गढ़ नजर आएँगे, वहाँ हमले करने में हिचकेगा नहीं। पाकिस्तान की रूह काँप रही है, उज्बेकिस्तान की देर-सबेर काँपेगी।

भारत इस बात को बखूबी समझता है और इसीलिए यदाकदा अमेरिका को अपनी दृढ़ता का परिचय दे देता है। भारत में यह दृढ़ता यहाँ के नागरिकों में जगे आत्मविश्वास और लोकतंत्र के निरंतर सफल होते जाने का परिणाम है । पिछले साठ वर्ष के दौर में ऐसे कई उतार-चढ़ाव आए जिनमें लोकतंत्र अग्नि परीक्षा से गुजरा और हम उसमें खरे साबित हुए। जिस आत्मविश्वास और दृढ़ता से भारत अपनी बात रखता है वह हमारी मजबूती का ही प्रमाण है। आशा है 'एक ध्रुवीय महाशक्ति के साथ अपने संबंध बनाने में भारत यह दृढता बनाए रखेगा और अपने 'पुराने मित्रों' की अनदेखी नहीं करेगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)



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