इराक : दवा के साथ बढ़ता मर्ज

रफीक विसाल| रफीक विसाल| Last Updated: शनिवार, 1 नवंबर 2014 (16:46 IST)
ब्रिटिश विदेशी मामलों के थिंक टैंक कहे जाने वाले चैथम हाउस ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि इराक के हालात बेकाबू हो चुके हैं।

इराक टूटने और तबाही की कगार पर खड़ा है। दूसरी तरफ इराक के बिगड़ते हुए सूरते-हाल पर बातचीत करने के लिए ईरान और अमेरिका भी राजी हो गए हैं।

ईरान-अमेरिका इसी माह की 28 तारीख को बगदाद में राजनयिक स्तर पर बातचीत करेंगे, जिसमें सिर्फ इराक में बढ़ रही हिंसा पर ही चर्चा होगी। इसके लिए काफी दिनों से दोनों देशों में चर्चा चल रही थी लेकिन इराक राजी नहीं था।
बहरहाल, इराक की हालत गालिब के उस शेर की मानिंद हो रही है 'मर्ज बढ़ता ही गया जूं जूं दवा की।' इराक में बढ़ रही हिंसा पर काबू पाने के लिए चार हजार अमेरिकी फौजी बगदाद पहुँच चुके हैं। इधर ब्रिटेन ने भी ऐलान किया है कि वह अपने फौजी वापस नहीं बुलाएगा। ऐसी हालत में इराक के हाल बद से बदतर होते जा रहे हैं। फौजों को एक तरफ विरोधियों से लड़ना पड़ रहा है तो दूसरी तरफ शिया-सुन्निायों के बीच दंगे भी बेकाबू होते जा रहे हैं। पिछले हफ्ते हुए एक हमले में 168 इराकी बम धमाकों में मारे गए, इसी धमाके में 18 अमेरिकी फौजी भी मारे गए।
इराक में रह रहे अमेरिकी राजदूत रियान सी क्रोकर ने भी हिंसा की घटनाओं को स्वीकार करते हुए कहा कि हाल ही में मारे गए अल कायदा के रहनुमा अबू अय्यूब अल-मिस्री की मौत के बाद लगा था कि हिंसा कम होगी, लेकिन हिंसा है कि थमने का नाम नहीं ले रही है। ऐसा ही भ्रम तब हुआ था जब अल-मिस्री से पहले अल कायदा के रहनुमा अबू मुसअब अल जरकवी को मारा गया था।
दूसरी तरफ अल कायदा इराक में आने वाले दिनों में भारी तबाही मचा सकता है, इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। शायद इसी डर को भाँपते हुए अमेरिका ने अपने 4000 फौजी तत्काल इराक भिजवाए हैं। इससे यह जरूर होगा कि पहले से मौजूद फौजियों के हौसले बुलंद होंगे। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि जो चार हजार फौजी अमेरिका ने भेजे हैं, उन्हें इराक में व्यवस्थित होने में साल-छः महीने लगेंगे। फिलहाल तो ये फौजी इराक के लिए अनाड़ी हैं।
इराक में तैनात फौजियों पर पिछले साल पाँच अरब डॉलर से ज्यादा की राशि खर्च हुई थी। और इस साल इस राशि में और इजाफा होना है। अभी तक इराक की धरती पर अमेरिका के सिर्फ अनुमानित आँकड़े ही उजागर हुए हैं, लेकिन यह सच है कि जितने फौजी विएतनाम की लंबी जंग में नहीं मारे गए थे, उससे भी ज्यादा चार साल में इराक में मारे जा चुके हैं। इनमें अपाहिज और मानसिक रोगियों की संख्या भी शामिल कर ली जाए तो इराक में अमेरिकी फौजियों को सदर बुश को खुश करने के लिए अपनी जानें गवाना पड़ रही है। दूसरी तरफ यह अफवाहें भी आम हैं कि कुछ दिनों पहले जो फौजी अमेरिका ने इराक भेजे थे, वे कहाँ गए। उन्हें जमीन खा गई या आस्मां निगल गया।
इराक में बिगड़ती हुए सूरते-हाल में नाकामयाब हो चुकी फौज नागरिकों को तरह-तरह से परेशान कर रही है। उन्हें बंदीगृहों में यातनाएँ दी जा रही हैं। गरम-गरम बालू पर नंगा लिटाकर उनसे तफ्तीश की जा रही है। एक आम इराकी इतनी तकलीफों के बाद भी अमेरिका को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। अमेरिका की वह कोशिश भी ध्वस्त होती जा रही जिसमें इराकी नागरिकों को आपस में लड़वा दिया जाए।
शिया-सुन्नी बस्तियों को दीवारों के माध्यम से बांटने की नाकाम कोशिश के बावजूद इराकी अमेरिकी चंगुल में फँसने को तैयार नहीं हैं। इराक के प्रधानमंत्री नूरी अल मालिकी भी लगातार हो रही हिंसा से तंग आ चुके हैं। उन्हें लगा था कि सद्दाम की फाँसी के बाद हालात साजगार हो जाएँगे, लेकिन हालात हैं कि दिन-ब-दिन बिगड़ते ही जा रहे हैं। शायद इसीलिए बदनामी से बचने के लिए वे कई बार प्रधानमंत्री पद से हटने की अपनी इच्छा जाहिर कर चुके हैं।



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