हम चाहते हैं देश की तस्वीर बदलना
अब जागा है हिन्दुस्तान
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हर व्यक्ति ऊँच-नीच, जाति-पाति के भेदभाव को भुलाकर केवल और केवल अपने देश के बारे में सोच रहा था। इन धमाकों में हमने बहुत कुछ खोया परंतु जो पाया वह शायद खरे सोने के समान शुद्ध था और वह था देशप्रेम का जज्बा, जो हर भारतीय को अपने देश के लिए कुछ कर गुजरने को झकझोर रहा था।
यदि हम इस वर्ष के मुद्दों की बात करें तो इस वर्ष आतंकवाद, आसमान छूती महँगाई, शेयर बाजार की गिरावट व भ्रष्ट राजनीति बहस का मुद्दा बनकर सुर्खियों में छाए रहे। वहीं दूसरी ओर देश की लाज बचाई उन जाँबाजों, धुरंदर खिलाडि़यों तथा कलाकारों ने दुनिया के नक्शे पर भारत का नाम रोशन किया।
इन सभी ज्वलंत मुद्दों के संदर्भ में हमने 'वर्ष 2008 का आकलन' विषय पर देश की कुछ ख्यातनाम हस्तियों से चर्चा की तो उनका इस विषय में ये कहना था -
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इस वर्ष की एक बहुत अच्छी उपलब्धि यह रही कि कल तक आमजन का पुलिस पर से जो विश्वास उठ गया था तथा जिस खाकी वर्दी को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता था, अब वह कौम सम्मान की अधिकारी बन गई है। आज मुसीबत के वक्त यही पुलिसकर्मी हमारे काम आए न कि कोई राजनेता। मेरे अनुसार पिछले बीस-बाईस सालों में पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था कि जनता ने सार्वजनिक स्थानों पर खुलकर विरोध प्रदर्शन किया हो। इस वर्ष पहली बार लोगों ने सिरफिरे राजनेताओं को सबक सिखाया।
जिस तरह से इन धमाकों में हमारे पुलिस के कई जवान मारे गए, वह बेहद ही दु:ख की बात है। हेमंत करकरे की पत्नी का मीडिया को दिया गया बयान हो या उन्नीकृष्णन के पिता का मुख्यमंत्री को जवाब देने का ढंग, सभी हमारी सच्चाई व ताकत के परिचायक हैं। इस वर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि इस वर्ष हमने सच को कहना, अपनी गलती स्वीकारना व अपना पक्ष रखना सीखा।
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अब तक इस संबंध में जो भी कोशिशें की गई थीं, इन धमाकों ने उन सब कोशिशों पर पानी फेर दिया। मुझे इस वर्ष एक रिपोर्ट पढ़कर बहुत बुरा लगा कि आज भी देश में गरीबी और महँगाई व्याप्त है। आज भी हमारे देश के 77 प्रतिशत लोग केवल 2 डॉलर पर जीते हैं। आखिर हमें इस गरीबी व महँगाई से कब मुक्ति मिलेगी?
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