ganesh chaturthi

54 साल बाद खुला बांके बिहारी मंदिर का खजाना, इसमें क्या मिला?

Updated: रविवार, 19 अक्टूबर 2025 (11:59 IST)
Banke Bihari Mandir Treasure : वृंदावन के बांकेबिहारी मंदिर के 160 वर्ष पुराने खजाने को शनिवार को 54 वर्ष बाद खोला गया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित उच्च प्रबंधन समिति आदेश पर खुले खजाने में बक्सों में बंद कुछ बर्तन, खाली संदूक, एक छोटा चांदी का छत्र और जेवरात के कुछ खाली बॉक्स मिले। मंदिर खुलने का समय होने के कारण फिर से खजाने के दरवाजे पर सील लगा दी गई। इसे रविवार को फिर खोला जाएगा।
 
ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर में परिसर में ही खजाना है। वर्ष 1971 में अंतिम बार इस खजाने को खोला गया था। उसमें रखे ठाकुर जी के चढ़ावे के जेवरात व अन्य वस्तुएं एक बक्से में रखी गई थीं। बाद में भूतेश्वर स्थित भारतीय स्टेट बैंक में एक लॉकर लेकर वह बक्सा लाकर में रख दिया गया। तब से खजाने में सील लगी थी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई उच प्रबंधन समिति के निर्देश पर शनिवार को फिर खजाना खोला गया।
 
मंदिर के पट बंद होने के बाद सिविल जज जूनियर डिवीजन शिप्रा दुबे की अगुवाई में अधिकारियों की टीम दोपहर करीब एक बजे मंदिर पहुंची। करीब डेढ़ बजे खोलने की प्रक्रिया शुरू हुई। गर्भगृह के पास खजाने के लोहे के दरवाजे पर लगा ताला कटर से काटा गया। आठ गुणा दस फीट के इस कमरे में काफी मिट्टी भरी थी। मजदूरों ने यह मिट्टी हटाई। टीम में कमेटी में शामिल चार सेवायत भी थे।
 
खजाने में क्या मिला : कमरे में बाईं ओर एक और लोहे का दरवाजा दिखा। इस दरवाजे को सब्बल डालकर खोला गया। यह कमरा करीब 6 गुणा चार फीट का था। इसी कमरे में चार लोहे के संदूक मिले, जबकि एक लकड़ी का खाली संदूक था। लोहे के संदूक के कुंडे टूटे हुए थे और उनके बंद ताले संदूक में रखे थे। इन संदूक में पुराने कांसे और पीतल आदि के बर्तन रखे थे। लकड़ी के खाली बाक्स में कुछ नहीं था। कुछ जेवरात के खाली बाक्स इसमें मिले। लोहे के दो संदूक अभी खोले नहीं गए हैं।
 
कमरे में एक छोटा सा चांदी का छत्र भी मिला है। तीन बड़ी पीतल की डेग, तीन कलशे, एक परात, चार बड़े पत्थर गोलाकार डेढ़ फीट ऊंचाई के, एक लकड़ी का तख्ता तो एक फीट ऊंचाई का था मिला। दो पीतल के छोटे घंटे भी मिले। इसी कमरे में फर्श में रखे पत्थर को हटाया गया तो उसमें नीचे जाने की सीढ़ी दिखाई दी। करीब सात सीढ़ी के बाद नीचे तीन गुणा चार फीट का एक छोटा कमरा मिला।
 
उच्च प्रबंधन समिति के सदस्य दिनेश गोस्वामी ने बताया कि यही खजाना है। इसमें सांप के दो छोटे बच्चे मिले, बाकी यह पूरा खाली था। सांप के बच्चों को वन विभाग की टीम ने पकड़ लिया। करीब साढ़े चार बजे खजाने से टीम बाहर आ गई। रविवार को फिर टीम खजाने में खोजबीन करेगी। 

अनसुलझे हैं बांके बिहारी मंदिर के ये रहस्य
 
कैसे प्रकट हुई थी बांके बिहारी की मूर्ति? : यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर सुनकर हर कोई आश्चर्यचकित रह जाता है। माना जाता है कि बांके बिहारी जी की मूर्ति स्वयं प्रकट हुई थी। मंदिर के संस्थापक, महान भक्त स्वामी हरिदास जी महाराज निधिवन राज में भजन-कीर्तन किया करते थे। एक दिन उनके भजन से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी स्वयं प्रकट हुए। स्वामी जी ने उनसे प्रार्थना की कि वे भक्तों के लिए यहीं वास करें, जिसके बाद राधा-कृष्ण की युगल छवि एक सुंदर मूर्ति में समा गई। यह मूर्ति आज भी बांके बिहारी मंदिर में विराजमान है। यह घटना अपने आप में एक चमत्कार है और इसी कारण यह मूर्ति अत्यंत पूजनीय मानी जाती है।
 
क्यों नहीं होती है मंगला आरती : दुनिया के लगभग सभी कृष्ण मंदिरों में भोर में मंगला आरती की जाती है, जो भगवान को जगाने का प्रतीक है। लेकिन बांके बिहारी मंदिर में यह परंपरा नहीं है! इसका कारण यह है कि यहां भगवान को एक बालक के रूप में माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि बिहारी जी रातभर अपनी लीलाओं में लीन रहते हैं, और उन्हें सुबह जल्दी जगाना उचित नहीं है। इसलिए यहां भगवान को देर से जगाया जाता है, और दिन की पहली आरती (श्रृंगार आरती) थोड़ी देर से होती है। यह अनूठी परंपरा बिहारी जी के प्रति भक्तों के वात्सल्य भाव को दर्शाती है।
 
आंखें खोलकर करने चाहिए दर्शन : आपने अक्सर सुना होगा कि भगवान के दर्शन करते समय आँखें बंद करके ध्यान लगाना चाहिए। लेकिन बांके बिहारी मंदिर में इसके ठीक विपरीत, भक्तों को आंखें खोलकर दर्शन करने चाहिए! ऐसा माना जाता है कि बिहारी जी की छवि इतनी मनमोहक है कि यदि आप पलकें झपकाएंगे, तो उनके दर्शन का एक भी पल चूक सकते हैं। उनकी मोहिनी छवि को एकटक निहारना ही उनके प्रति सच्ची भक्ति है।
 
हर दो मिनट के बाद लगता है पर्दा : यह मंदिर की सबसे आश्चर्यजनक और प्रसिद्ध परंपराओं में से एक है। बांके बिहारी मंदिर में बिहारी जी के सामने हर दो मिनट के बाद पर्दा लगा दिया जाता है और फिर हटा दिया जाता है। यह सिलसिला लगातार चलता रहता है। इस परंपरा के पीछे कई मान्यताएं हैं। कुछ लोग कहते हैं कि बिहारी जी की छवि इतनी शक्तिशाली है कि यदि कोई भक्त उन्हें लंबे समय तक बिना पलक झपकाए निहारे, तो वह उनके प्रेम में पूर्ण रूप से लीन होकर अपने होश खो सकता है। पर्दा लगाने से भक्तों को इस तीव्र अनुभव से बचाया जाता है।
 
कहा जाता है कि करीब 400 साल पहले यह परंपरा नहीं थी लेकिन एक बार एक साधक बांके बिहारी जी के दर्शन करने के लिए मंदिर आया। तब वह अधिक देर तक बहुत प्रेम से मन लगाकर बांके बिहारी जी के दर्शन करने लगा। उस दौरान भगवान साधक के प्रेम से खुश होकर उनके साथ ही चलने लगे। जब यह दृश्य पंडित जी ने देखा तो मंदिर में बांके बिहारी जी की मूर्ति नहीं है। तो उन्होंने भगवान से वापस मंदिर में चलने के लिए विनती की। तभी से हर 2 मिनट के गैप पर बांके बिहारी जी के सामने पर्दा डालने की परंपरा शुरू हुई।
edited by : Nrapendra Gupta 
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