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बड़ी खामोशी से ‘राहत’ छिन गए हम सबसे

बुधवार,अगस्त 12, 2020
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मिर्ज़ा ग़ालिब उन बिरले कवियों में से हैं जिनको चाहे अभीष्ट प्रशंसा उनके जीवन में न मिली हो किंतु उनकी योग्यता और विद्वत्ता की धाक सभी पर जमी हुई थी।
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गालिब को उनके हासिद अक्सर फहश ख़त लिखा करते थे- किसी ने एक ख़त मे गालिब को मां की गाली लिखी। पढ़कर गालिब मुस्कुराए और कहने लगे- उल्लू को गाली देना भी नहीं आती
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इंदौरी की शायरी एक खूबसूरत कानन है, जहां मिठास की नदी लहराकर चलती है। विचारों का, संकल्पों का पहाड़ है, जो हर अदा से टकराने का हुनर रखता है। फूलों की नाजुकता है,
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हिन्दी से जो लोग उर्दू मंचों पर आ रहे हैं, उनकी शायरी में एक अलग ही ताज़गी और अलग ही चमक है।
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'बहुत इंतिहाई आकर्षक आँखें, बिल्कुल हीरे की तरह चमकती हुईं। लंबे-लंबे बाल, जिन्हें वो निहायत ही दिलचस्प अंदाज़ से बार-बार पीछे की तरफ कर लेते और साथ ही एक बहुत दिलकश ज़हीन मुस्कुराहट के मालिक।' किसी शख़्स की तारीफ़ में कभी ये तमाम दिलफ़रेब बातें कही ...
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उर्दू शायर बशर नवाज का निधन

गुरुवार,जुलाई 9, 2015
मुंबई। हिन्‍दी फिल्म बाजार के लोकप्रिय गीत 'करोगे याद तो हर बात याद आएगी' के रचनाकार और मशहूर उर्दू शायर बशर नवाज का संक्षिप्त बीमारी के बाद बुधवार महाराष्ट्र के औरंगाबाद में निधन हो गया। वह 79 वर्ष के थे।
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गालिब के खास शागिर्द और दोस्त अक्सर शाम के वक़्त उनके पास जाते थे और मिर्ज़ा सुरूर के आलम में बहुत पुरलुत्फ बातें किया करते थे-
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एक रोज़ बादशाह चन्द मुसाहिबों के साथ आम के बाग ' हयात बख्श ' में टहल रहे थे-साथ में गालिब भी थे- आम के पेडों पर तरह-तरह रंगबिरंगे आम लदे हुए थे- यहां का आम बादशाह और बेगमात के सवाय किसी को मोयस्सर नहीं आ सकता था-
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यह बात आज भी संदिग्ध बनी हुई है कि मिर्जा ग़ालिब शिया थे या सुन्नी। इस संबंध में हमारी जानकारी का आधार उनकी अपनी रचनाएं हैं जिनमें स्वयं इतना अंतर्विरोध है कि उससे हम कोई निष्कर्ष नहीं निकाल सकते। बहुत-सी बातें ऐसी हैं कि जिनके पीछे कोई आस्था या ...
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एक दिन हमने मिर्ज़ा ग़ालिब से पूछा कि 'तुमको किसी से मुहब्बत भी है?' कहा कि, 'हाँ हज़रत अली मुर्तज़ा से।' फिर हमसे पूछा कि 'आपको?' हमने कहा, 'वाह साहब, आप तो मुग़ल बच्चा होकर अली मुर्तुज़ा का दम भरें और हम उनकी औलाद कहलाएँ और मुहब्बत न रखें क्या यह ...
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ग़ालिब के लतीफे : मेरा जूता

शनिवार,दिसंबर 27, 2014
एक दिन सय्यद सरदार मिर्ज़ा शाम को चले आए- जब थोड़ी देर रुक कर जाने लगे तो मिर्ज़ा खुद अपने हाथ में शमादान लेकर आए ताकि वह रोशनी में अपना जूता देख कर पहन लें- उन्होने कहा क़िबला ओ काबा, आपने क्यूं तकलीफ फरमाई- मैं अपना जूता आप पहन लेता-
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ऐतिहासिक शहर आगरा में जन्मे और अपना प्रारंभिक जीवन यहीं बिताने वाले मशहूर शायर मिर्जा ग़ालिब आज की तारीख में आगरा की भीड़भाड़ तथा आधुनिक चकाचौंध में गुम से हो गए हैं।
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जाने-माने उर्दू कवि और आलोचक शमसुर रहमान फारुकी ने अपनी किताब ‘द सन दैट रोज फ्रॉम द अर्थ’ में 1857 की लड़ाई में ‘कंपनी बहादुर’ के हाथों हार के बावजूद 18वीं और 19वीं सदी में उत्तर भारतीय शहरों दिल्ली और लखनऊ में उर्दू साहित्य संस्कृति के संपन्न बने ...
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ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह की पुण्यतिथि पर बाँसुरी वादक रोनू मजूमदार और भजन व ग़ज़ल गायक अनूप जलोटा से हुई बातचीत पर आधारित-
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'किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी, ये हुस्नों इश्क धोखा है सब मगर फिर भी'...ये शेर अपनेआप में एक बेबसी, इक इंतिज़ार और तमाम उम्मीदें जज़्ब किए हुए है। और एक उम्र तक अपने सीने में ये तमाम ख़लिश पाले रक्खी, मक़्बूल शाइर फ़िराक़ गोरखपुरी ने, यानी ...
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बात उन दिनों से क़रीब 11 बरस पहले की है, जब हिंदुस्तान को चीरकर दो हिस्सों में तक़्सीम नहीं किया गया था। तब चिनाब, झेलम, सिंधु और रावी का पानी बिना किसी बँटवारे के गुनगुनाता आज़ाद बहता था। तब न कोई हिन्दू था, न कोई मुसलमान। तब लोग सिर्फ़ हिंदुस्तानी हुआ ...
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फिल्म और थिएटर की मशहूर अदाकारा शबाना आज़मी ने अपने वालिद और हमारे वक्‍त के बेहतरीन व अज़ीम शायर कैफ़ी आज़मी की याद में इंटरनेट पर एक वेबसाइट लांच की है। इस वेबसाइट पर कैफ़ी की शायरी, वीडियो और उनके लिखे फिल्मी गीतों को संजोया गया है। अलावा इसके ...
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कौन होगा, जो मशहूर शायर मुनव्वर राना के नाम से वाक़िफ़ न हो। जी हां ! वही मुनव्वर राना, जिनकी शायरी में दुनियादारी की चाहरदीवारी से घिरी एक माँ, खुलकर साँस लेती है। वही मुनव्वर राना, जिनके लिए जन्नत का रास्ता कहीं आसमान के उस पार से नहीं, बल्कि माँ ...
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कहते हैं हर शब के बाद सहर और सहर के बाद फिर शब आती है। दोनों की उम्र क़रीब-क़रीब बराबर ही तय है। मगर कभी-कभी शब की उम्र सहर के मुकाबले दराज़ होने का अहसास होता है। अज़ीम शायर मेराज फैज़ाबादी के चले जाने से शायरी की दुनिया भी इन दिनों ऐसे ही एक ...
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हर बरस की तरह इस दफ़ा भी सहने-उज्जैन ने अपनी गोद में अदब की महफ़िल आरास्ता करने की पूरी तैयारी कर ली थी। मुक़द्दस क्षिप्रा की मौजों ने भी तरन्नुम में पिरोए नग़मों और ग़ज़लों के नशेबो-फ़राज़ पर बेतहाशा झूमने के लिए अपने कनारों से इजाज़त ले ली थी।
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प्रख्‍यात हास्‍य-व्‍यंग्‍य कवि ओम व्‍यास 'ओम' के निधन को एक वर्ष हो गया था। उनकी पहली पुण्‍यतिथि पर एक डिस्‍पैच तैयार करना था। लिहाज़ा, उनकी रचनाओं, उनकी शक्‍ल, उनकी भाव-भंगिमाओं, उनकी यादगार शवयात्रा और उनसे मुतअल्‍लिक उनके स्‍नेहीजनों की बातों को ...
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वैसे तो मशहूर शायर मुनव्वर राना का उज्जैन-इंदौर से ख़ासा राबिता रहा है। लिहाज़ा, यहाँ के सामिईन को कई बार उनके कलाम सुनने का मौका मिला। इसी सिलसिले में एक बार उनका उज्‍जैन आना हुआ। कहने की ज़रूरत नहीं कि मुशायरा उन्हींक ने लूटा। नवम्बर की सर्दियाँ ...
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एक बेहद सादा मिज़ाज शख्स... एक अलमस्त तबीयत इंसान.. एक मुफ़लिस शायर और उर्दू को एक नई रवायत देने वाले मीर तक़ी मीर को आज ज़माने में भले ही ज्यादा लोग ना जानते हों, पर अदीब मानते हैं कि मीर का मियार कोई हासिल नहीं कर सकता।
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शायर मनीष शुक्ला के पहले गजल संग्रह ‘ख्वाब पत्थर हो गए’ का विमोचन उत्तरप्रदेश उर्दू अकादमी के पूर्व अध्यक्ष मशहूर अदीब मलिकजादा मंजूर अहमद ने किया।
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आप जानते तो होंगे साबिर इंदौरी को। माँ-बाप का रखा हुआ नाम मोहम्मद अयूब खान। शायरी शुरू की तो उस्ताद सागर उज्जैनी ने तखल्लुस दिया साबिर। दूसरे शहरों में मुशायरे पढ़कर साबिर इंदौरी कहलाए और फिर इंदौर में भी इसी नाम से पुकारे जाने लगे।
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'मैं मुवाहिद-ए-ख़ालिस और मोमिन-ए-कामिल हूँ। ज़बान से लाइलाहा इल्लल्लाह कहता हूँ और दिल में लामौजूद इल्लल्लाह ला मुवस्सिर फ़िल वजूद अल्लाह समझे हुए हूँ। मुहम्मद अलैहिस्स लाम पर नबूवत ख़त्म हुई। ये ख़त्म-उल-मुर्सलीन और रहमत-उल-आलमीन हैं। मक़्ता नबूवत ...
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तितलियाँ आसपास

सोमवार,फ़रवरी 15, 2010
आज तक आपने तितलियों को फूलों और कलियों के ऊपर मँडराते देखा होगा। फूलों का रस चूसने आई हैं या अठखेलियाँ कर रही हैं यहाँ तक तो जरूर इस पर विचार किया होगा लेकिन अज़ीज़ अंसारी का इसी चीज़ को देखने का नजरिया देखिए
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ग़ालिब पर नाटक का मंचन

शुक्रवार,दिसंबर 26, 2008
ग़ालिब की सालगिरह पर होने वाले इस नाटक में जाने-माने अभिनेता टॉम अल्टर ग़ालिब की भूमिका में दिखाई पड़ेंगे। ग़ालिब अपनी जिंदगी का बयान पहली बार उनकी आत्मकथा लिखने वाले मौलाना अल्ताफ हुसैन हाली को देते नजर आएँगे और नाटक की शुरुआत होगी...
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यार की आदत, दोज़ख़ की दहकती हुई आग की तरह है। मुझे यार की इस गर्म-मिज़ाजी में ही राहत मिलती है। और चूंके दोज़ख़ की आग भी उसके गर्म मिज़ाज की तरह है इसलिए मुझे उसमें भी राहत मिलेगी।
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आप ये न समझना के मैं नाराज़ हो गया हूँ और अब कभी नहीं आऊँगा। आप जब चाहें मुझे याद कर सकते हैं। आप जब भी मेहरबान होकर मुझे बुलाएँगे मैं हाज़िर हो जाऊँगा। वो वक़्त जो गुज़र जाता है फिर वापस नहीं
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ग़ालिब की ग़ज़ल और अशआर के मतलब

शनिवार,दिसंबर 13, 2008
ये पूरी ग़ज़ल आरिफ़ की जवाँ मौत पर लिखी गई है। ये ग़ज़ल की शक्ल में एक मरसिया है। आरिफ़ जो ग़ालिब को बहुत ज़्यादा अज़ीज़ था, जब उसका भरी जवानी में
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'अज़ीज़ अंसारी की ग़ज़ल'

शुक्रवार,दिसंबर 12, 2008
'बोले मेरी ग़ज़ल' के अशआर ने जब मुझसे बोलना शुरू किया तो मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे एक शाने पर बहार ने हाथ रख दिया हो और दूसरे शाने पर ख़िज़ाँ ने, और यूँ महसूस हुआ के आसपास दुनिया के बहुत सारे
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