ग़ालिब के रोचक किस्से : हमने भी दाबे तुमने भी दाबे

Mirza Ghalib
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गालिब के खास शागिर्द और दोस्त अक्सर शाम के वक़्त उनके पास जाते थे और मिर्ज़ा सुरूर के आलम में बहुत पुरलुत्फ बातें किया करते थे- > एक रोज़ मीर मेहदी मजरूह बैठे थे और मिर्ज़ा पलंग पर लेटॆ कराह रहे थे- मीर मेहदी पाँव दाबने लगे- ' मिर्ज़ा ने कहा > 'भई तू सय्यद ज़ादा है मुझे क्यूं गुनहगार करता है 'वोह नहीं माने और कहा' आपको ऎसा ही ख्याल है तो पैर दाबने की उजरत दे दीजिएगा' हां इसका मुज़ायक़ा नहीं- जब वो पैर दाब चुके तो उजरत तलब की- मिर्ज़ा ने कहा' भैया कैसी उजरत?

तुमने हमारे पांव दाबे, हमने तुम्हारे पैसे दाबे। हमने भी दाबे तुमने भी दाबे...




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