अहिंसा की जन्नत बनता गांधी का देश
अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी ने हिंसा की विशद व्याख्या की है। उनके अनुसार हिंसा मन, वचन और कर्म से होती है। सवाल—क्या अहिंसा के इस सबसे बड़े पुजारी का देश अहिंसा की जन्नत बन चुका है? कब, कौन, किस बात पर मन, वचन और कर्म से हिंसक बन जाए—कोई ठिकाना नहीं। तुर्रा यह कि ऐसा करने वाले और उनके समर्थक इसे कभी स्वीकार नहीं करते। प्रायश्चित तो दूर की बात है। अपनी हिंसा का औचित्य सिद्ध करने के लिए वे कुतर्क के किसी भी स्तर तक जा सकते हैं।
गुस्सा बुरा नहीं, इसे अपनी ताकत बनाएं : गुस्सा जनित हिंसा खुद में बुरी बात नहीं, यदि वह नकारात्मक न होकर सकारात्मक हो। उन पर गुस्सा करें, उनकी लानत-मलामत करें, जो जाति, धर्म, मजहब, भाषा और क्षेत्र के नाम पर समाज को अपने हित में बाँटकर उसे कमजोर करने का पाप कर रहे हैं। उनके प्रति गुस्सा करें जिनकी कथनी, करनी और सोच में फर्क है। उनके प्रति भी, जिनका कोई वसूल, आदर्श और विचारधारा नहीं।
सबसे बेहतर खुद की कमियों पर गुस्सा करें : सबसे बेहतर तो यह है कि खुद की बुराइयों और समाज की तमाम बुराइयों के प्रति गुस्सा करें। इनका बायकॉट करें। अपनी कमियों को दूर करने का संकल्प लें। क्योंकि यह आपके नियंत्रण में है। कहा भी गया है, "आप भला तो जग भला"। आप सुधरोगे तो जग भी सुधरेगा। सिर्फ कुछ फिल्मों, कुछ किताबों, सार्वजनिक संपत्तियों या टोलप्लाजा पर गुस्सा करने से अराजकता के सिवा और कुछ होने वाला नहीं। बाकी, आपकी मर्जी।