भारत की राजनीति ऐसी अवस्था में पहुंची है जिसकी पहले कल्पना नहीं थी। यह भारत के संसदीय इतिहास की अत्यंत गंभीर स्थिति है जब लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस है तो उसके समानांतर विपक्ष के नेता राहुल गांधी के विरुद्ध सब्सटेंसिव मोशन। राहुल गांधी के विरुद्ध सांसद निशिकांत दुबे ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर सब्सटेंसिव मोशन लाने की मांग की है।
भाजपा ने पहले राहुल गांधी के विरुद्ध विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाने की बात की थी किंतु लगता है गंभीरता से विमर्श करके सब्सटेंसिव मोशन की पहल की है। सब्सटेंसिव मोशन विशेषाधिकार हनन से ज्यादा गंभीर हो सकता है। सब्सटेंसिव मोशन स्वतंत्र मूल प्रस्ताव है जिसमें सांसद के विरुद्ध स्पष्ट आचरण या निर्णय सामने आता है।
इस पर बहस और मतदान होता है तथा पारित होने पर सदन का अधिकारिक रुख और मत प्रकट होता है। यानी संबंधित सांसद का आचरण और चरित्र सांसद के अनुकूल है या नहीं, इन्हें सांसद होना चाहिए या नहीं, इन्हें भविष्य में चुनाव लड़ने देना चाहिए या नहीं आदि आदि। इसके आधार पर कार्रवाई हो सकती है और सदन की सदस्यता भी जा सकती है? चुनाव आयोग को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित करने की अनुशंसा की जा सकती है। तो इसे कैसे देखा जाए?
राहुल गांधी प्रियंका वाड्रा और कांग्रेस इस पर या प्रतिक्रिया स्वाभाविक है कि हम डरने वाले नहीं है। 24 दिसंबर, 2005 को लोकसभा के 10 और राज्यसभा के एक सांसद की सदस्यता कैसे गई थी? एक टेलीविजन चैनल ने स्टिंग किया और सांसदों पर धन लेकर प्रश्न पूछने का आरोप लगा। सब्सटेंसिव मोशन के तहत उन्हें बर्खास्त कर दिया गया और उन्हें आरोपों के उत्तर का भी अवसर नहीं दिया गया। इसमें मुख्य भूमिका कांग्रेस की ही थी।
अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस मिलने के साथ लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन में आना बंद कर दिया है। अविश्वास प्रस्ताव के बाद बहस और परिणाम तक लोकसभा अध्यक्ष सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं कर सकते। तो उन्होंने यह निर्णय किया। यही बात सांसद या विपक्ष के नेता पर लागू नहीं होती। विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव या सब्सटेंसिव प्रस्ताव स्वीकृत होने के बावजूद संबंधित सदस्य हिस्सा ले सकते हैं। उन्हें अपना पक्ष रखने का समय दिया जा सकता है।
लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पर 9 मार्च को बहस होने की संभावना है। यह देखना होगा कि सब्सटेंसिव मोशन स्वीकृत होता है या नहीं। चूंकि भाजपा नेतृत्व वाले राजग को बहुमत है इसलिए अविश्वास प्रस्ताव गिर जाएगा। यही बात सब्सटेंसिव मोशन के साथ लागू नहीं होता। बहुमत के आधार पर गठबंधन राहुल गांधी के विरुद्ध निश्चित मत और कार्रवाई तक का प्रस्ताव पारित कर सकता है।
कांग्रेस के अंदर उनके समर्थकों में इससे कोई परेशानी नहीं दिखाई देती। उल्टे वे यह कहते हुए प्रफुल्ल होते हैं कि एजेंडा तो राहुल गांधी ही सेट कर रहे हैं और वह सब्सटेंसी मोशन पर बहस भी उन्हीं के इर्द-गिर्द रहेगी। अगर सोच ऐसी हो तो कल्पना की जा सकती है कि राहुल गांधी और उनके इर्द-गिर्द के रणनीतिकार किस दिशा में जा रहे हैं। बजट सत्र आरंभ होने के पहले दिन को छोड़कर आरंभ से अंत तक राहुल गांधी सदन के अंदर और बाहर सर्वाधिक चर्चा और बहस के विषय रहे। क्या इसे सही अर्थों में राष्ट्रीय एजेंडा निर्धारित करना कहेंगे? लोकसभा में विपक्ष के नेता की दृष्टि से इसे बिल्कुल जायज माना जाएगा? क्या इससे राहुल गांधी अपने राष्ट्रीय दायित्वों की पूर्ति कर रहे हैं?
किसी एक नेता के विरुद्ध कार्रवाई होगी तो लोगों में उसके प्रति सहानुभूति पैदा हो सकती है और अनेक प्रश्न उठ सकते हैं। दूसरा पक्ष यह है जिस तरह लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के विरुद्ध अभियान चला उसका क्या? उनकी बेटी के सिविल सर्विस पास होने तक पर प्रश्न उठाने वाले कौन थे?
कांग्रेस की महिला सांसदों द्वारा उनको लिखा गया पत्र देखिए, चरित्रहनन है। और आपने अविश्वास प्रस्ताव तक ला दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सीट घेर कर कांग्रेस की महिला सांसद बैनर लिए खड़ीं थी। माहौल का ध्यान रखते हुए लोकसभा अध्यक्ष ने कहा मैंने उनसे सदन में न आने का अनुरोध किया क्योंकि कुछ भी अप्रत्याशित हो सकता था।
एपिस्टन फाइल को लेकर निराधार आरोप क्या चरित्रहनन नहीं है? इस फाइल में किसी का नाम आना उसके पाप में भागीदार का द्योतक नहीं हो सकता। एपिस्टन फाइल की मुख्य चर्चा अवयस्क बालक-बालिकाओं के साथ शर्मनाक यौनाचार के संदर्भ में है। यह जानते हुए कोई उसके संपर्क में है तोउसे दोषी माना जाएगा। जिस तरह राहुल गांधी और उनके साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को घसीटने की कोशिश कर रहे हैं उसे चरित्र हनन की राजनीति के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता।
संकेत में यह कहना कि प्रधानमंत्री दबाव में है क्योंकि अभी फाइल में माल बहुत है और अडाणी पर अमेरिका में केस हैं आदि-आदि क्या है? यही बताने की कोशिश हो रही है कि प्रधानमंत्री का दबाव है और इसीलिए वे देश का सौदा कर रहे हैं। लोकसभा अध्यक्ष के लिए ऐसी कठिन स्थिति पैदा करने की कोशिश है कि उन्हें फैसला लेने में ही समस्या हो। ओम बिरला यहां व्यक्ति नहीं लोकसभा अध्यक्ष जैसे गरिमापूर्ण पद पर हैं। हमारा व्यक्तिगत उनसे मतभेद हो सकता है, उनसे नापसंदगी भी होगी, पर पद का सम्मान करने और विश्वास करने का प्राथमिक दायित्व भी नेता और संसद न निभाएं तो इसे क्या कहेंगे? यह सब शर्मनाक है।
हालांकि राहुल गांधी और सपा के अखिलेश यादव ने विश्वास प्रस्ताव के नोटिस पर हस्ताक्षर नहीं किया। यह भी एक रणनीति होगी ताकि वे बोल सके कि हमने अध्यक्ष पद की गरिमा का ध्यान रख हस्ताक्षर नहीं किया। आपकी रणनीति हो सकती है कि किसी तरह उन्हें मनोवैज्ञानिक दबाव में रखो और अपना एजेंडासदन के माध्यम से प्रचारित और स्थापित करने की कोशिश करो। जब एक पक्ष सीमा का इस सीमा तक उल्लंघन करता रहेगा तो दूसरे पक्ष से भी प्रत्युत्तर उस रूप में आ सकता है।
सांसद निशिकांत दुबे द्वारा प्रस्तुत पुस्तक जिनमें नेहरू परिवार के चरित्र पर प्रश्न खड़े किए गए हैं उसी की प्रतिक्रिया में आया था। आपने लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव दिया, प्रधानमंत्री का भी चरित्रहनन किया, देश के प्रति उनकी निष्ठा के विरुद्ध दुष्प्रचार किया तथा अंततः ऐसी स्थिति पैदा की किए हुए राष्ट्रपति अभिभाषण के धन्यवाद प्रस्ताव पर लोकसभा में भाषण नहीं दे सके तो आपके विरुद्ध भी सब्सटेंसिव मोशन आ गया। शीर्ष स्तर की राष्ट्रीय राजनीति का इस स्तर पर नहीं पहुंचना चाहिए था जहां प्रतिक्रिया देना कठिन हो जाए। आखिर रास्ता क्या है?
अगर राहुल गांधी के समर्थकों को गलतफहमी है कि चर्चा और बहस का एजेंडा सेट करना है बड़ी उपलब्धि है तो एसआईआर एवं चुनाव आयोग के संदर्भ में भी ऐसी ही स्थिति थी। उन्होंने अपनी ओर से पूरी तैयारी के साथ एसआईआर और चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा किया, बिहार में वोट अधिकार यात्रा की, चुनाव परिणाम आपके सामने है। महाराष्ट्र चुनाव में अडाणी मुद्दा उनके लिए सर्वोपरि था।
परिणाम देख लीजिए। लोकसभा अध्यक्ष ने सांसदों का निलंबन तब किया जब वे बेल में जाकर लगातार अध्यक्ष की ओर कागज फेंक रहे थे, कोई आदेश या नियमन नहीं मान रहे थे। सामान्य सभा की भी अध्यक्षता कर रहे व्यक्ति की ओर चिल्ला-चिल्ला कर कागज फेंका जाएगा तो उनके प्रति गुस्सा ही पैदा होगा और समाज इसे स्वीकार नहीं कर सकता। सदन संचालन के नियम और परंपरा हैं। इसको हर हाल में रौंदने को उतारू लोगों के विरुद्ध अध्यक्ष को फैसला करना ही पड़ेगा।
2024 लोकसभा चुनाव के बाद से लोकसभा और राज्यसभा में कांग्रेस एक दिन भी सामान्य स्थिति पैदा नहीं होने देने पर उतारू है। राहुल गांधी ने राष्ट्रपति अभिभाषण से संबंधित मुद्दे पर किसी सत्र में भाषण नहीं दिया। वह एजेंडा लेकर आते हैं और उसे सदन में रखते हैं तथा अध्यक्ष के रोकने पर उन्हें आरोपित करते हैं। इस लोकसभा के पहले हाथों में संविधान की लाल किताब लेकर नारे लगाए गए। क्या यह आचरण उचित था?
पहली बार कांग्रेस ने लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव में विपक्ष का उम्मीदवार खड़ा किया। इस तरह की सोच और व्यवहार में कोई लोकतांत्रिक रास्ता निकल नहीं सकता। यह कहना कठिन है कि सब्सटेंसिव मोशन से रास्ता निकल पाएगा। सच कहें तो सदन को तय करना पड़ेगा कि विपक्ष के इस तरह के नेता से कैसे निपटा जाए? नियम और परंपरा बनाने वालों ने ऐसे विपक्ष के नेता की कल्पना भी नहीं की होगी। आप एक बार रोकेंगे तो दूसरे तरीके से आ जाएंगे।
(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। 'वेबदुनिया' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)
Edited BY: Raajshri Kasliwal