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Last Updated : गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026 (20:48 IST)

लंगोट बनाम बिकनी

Nappies vs bikinis
लंगोट। कपड़े का एक छोटा सा टुकड़ा। इस छोटे से कपड़े पर मुहावरे तो कई हैं, पर लिखा कम गया है। खासकर इसकी बराबरी करने वाली बिकनी की तुलना में तो न के बराबर। 
 
लंगोट में कई खूबियां होती हैं। लंगोट हमारी परंपरा और संस्कार से जुड़ा है। यह  साहस, संयम (ब्रह्मचर्य) एवं चरित्र का भी प्रतीक है। इसका इतिहास बहुत पुराना है। बल, बुद्धि और शील के देवता हनुमान जी इसे धारण करते हैं। कहीं कहीं तो हनुमान मंदिरों में उनकी मूर्ति के बगल में लाल रंग का लंगोट भी टंगा होता है। शक्ति की साधना करने वाले अधिकांश पहलवान बजरंग बली को अपना आराध्य मानते हैं। लिहाजा पहलवान भी लंगोट धारण करते हैं। उनका भी पसंदीदा रंग लाल ही होता है। योग करने वाले योगी,अलग सम्प्रदायों के साधु भी सिर्फ लंगोट ही धारण करते हैं। नागा साधु इसकी मिसाल हैं। उनके लिए एक लंगोट ही काफी है।
 
जिसका जनेऊ होता है उसे बटुक के रूप में लंगोट धारण करना होता है। इस रूप में लंगोट संस्कार भी है। रही साहस और किसी के मुकाबले की बात तो लंगोट कसकर तैयार होना मुहावरा इसीका बोध कराता है। लंगोट का ढीला या लंगोट का पक्का होना किसी के चरित्र का पैमाना होता है।
 
लंगोट आपको यह सीख भी देता है कि दोस्ती बराबरी वाले से निभाती है। 'टाट का लंगोट नवाब से यारी" मुहावरे में यही संदेश निहित है। इससे यह सीख मिलती है कि बेमेल दोस्ती का कोई मतलब नहीं। कभी किसी बुद्धिमान इंसान ने बातचीत के दौरान बताया था 'आपके साथ का या आपसे भली भांति परिचित कोई इंसान बहुत बड़ा बन जाए तो कलयुग में उससे अपने साथ उसी पुराने व्यवहार की अपेक्षा मत करिए। भगवान कृष्ण और सुदामा जैसे उदाहरण खुद में अपवादों में भी अपवाद हैं। इस सोच से आप सुकून में रहेंगे'। उनकी बात अच्छी लगी। उम्मीद है आपको भी अच्छी लगेगी। कई लोगों को तो इसका अनुभव भी होगा। कृष्ण और सुदामा की इस बेमिसाल मित्रता को आप 'लंगोटिया यार' वाले मुहावरे से भी जोड़ सकते हैं।
 
लंगोट अहम की भी होती है और वहम की भी होती है। लंगोट यह भी कहती हैं जो प्राप्त है वह पर्याप्त है। खासकर मुसीबत में जो भी हासिल हो जाय उससे संतोष करें। 'भागते भूत की लंगोटी ही भली' मुहावरे में यह संदेश आप ढूंढ सकते हैं। कुछ परम संतोषी लोगों से यह भी सुना हूं कि मेरी तो सिर्फ तीन जरूरतें हैं लोटा, डोरी और लंगोट। 
 
मध्यकालीन महान कवि संत कबीर दास ने इसकी व्याख्या इस रूप में की है, 'लंगोटी कौड़ी-कौड़ी जोड़ के जोड़े लाख करोड़, चलती बेर न कछु मिल्या लई लंगोटी तोड़'। 'लंगोटी में फाग खेलना', मुहावरे का भी यही संदेश है कि इंसान अपनी अपेक्षाओं को सीमित कर ले तो अभाव में में भी खुश रह सकता है। 

अब बात बिकनी की

अब बात लंगोट की समकक्ष बिकनी की। लंगोट जहां कई संदेश और सीख देता है, वहीं बिकनी आग लगाती है। वह ढकने से अधिक दिखाती है। आमंत्रण देती है। बिकनी अक्सर विवादों को जन्म देती है। कभी कभी तो बिकनी का विवाद बहुत बड़ा होता है। लंगोट की तरह इसका कोई परंपरागत रंग नहीं होता। ऐसे में यह किसी भी रंग की हो सकती है।
 
अब अगर किसी नामचीन हीरोइन ने जाने या अनजाने किसी मजहब के रंग की प्रतीक वाली बिकनी धारण कर ली तो वह बिकनी पानी में ही नहीं समाज में भी आग लगा देती है। बिकनी का कोई अपना इतिहास नहीं। फिलहाल मुझे तो नहीं पता। अगर किसी को पता हो तो जरूर बताएं। जहां तक मुझे याद करीब पांच छह दशक पहले अन्न और वस्त्र की कमी थी। एक वर्ग गोबर का अन्न खाने को मजबूर था। तो उस वर्ग की मासूम बच्चियां भगही पहनती थी। उसके उम्र के बच्चे नंग धड़ंग ही घूमते थे। पर भगही के रूप से साड़ी या धोती का वह टुकड़ा इज्जत को ढकने के लिए होता था। यह उस वर्ग की मजबूरी होती थी।
 
बिकनी पहनने वालों के साथ ऐसी कोई मजबूरी नहीं होती। वह इसे शौक से पहनती हैं। इतिहास के बारे में काफी खोजा पर कुछ मिला नहीं, पर वर्षों पहले कभी कहीं पढ़ा था कि इसका आविष्कार जिसने भी किया हो ताकत में यह परमाणु बम से कम नहीं है। और बिकनी को खुद भी यह नहीं पता कि उसका मकसद है, 'छिपाना या दिखाना। आविष्कार के बाद से वह लोगों के इस सवाल से परेशान है'। अगर आपको पता लग जाए तो जरूर बताइएगा।