sawan somwar

मीर के अशआर

Written By WD
Updated: शनिवार, 20 सितम्बर 2008 (10:59 IST)
Aziz AnsariWD
* न देखा मीरे-आवारा को लेकिन
ग़ुबार इक नातवाँ सा कू-बकू था

* जबके पहलू से यार उठता है
दर्द बेइख़्तियार उठता है

* हम हुए, तुम हुए, के मीर हुए
उसकी ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए

* नहीं आए कसू की आँखों में
होके आशिक़ बहुत हक़ीर हुए

* बू-ए-गुल या नवा-ए-बुलबुल थी
उम्र अफ़सोस क्या शिताब गई

* यूँ उठे आह! उस गली से हम
जैसे कोई जहाँ से उठता है

* इश्क़ इक मीर भारी पत्थर है
कब ये मुझ नातवाँ से उठता है

* मीर साहब को देखिए जो बने
अब बहुत घर से कम निकलते हैं

* ख़ुश रहा जब तलक रहा जीता
मीर मालूम है क़लन्दर था

* यारान-ए-देर-ओ-काबा दोनों बुला रहे हैं
अब देखें मीर अपना जाना किधर बने है

* मीर साहब ज़माना नाज़ुक है
दोनों हाथों से थामिए दस्तार

* जाए है जी निजात के ग़म में
ऐसी जन्नत गई जहन्नम में

* न मिल मीर अबके अमीरों से तू
हुए हैं फ़क़ीर इनकी दौलत से हम

* सब मज़े दरकिनार आलम के
यार जब हमकिनार होता है

* दूर बैठा ग़ुबार-ए-मीर उससे
इश्क़ बिन ये अदब नहीं आता

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