सिंहासन बत्तीसी : बत्तीसवीं पुतली रानी रूपवती की कहानी

BBC Hindi|
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बत्तीसवीं पुतली रानी रूपवती ने राजा भोज को सिंहासन पर बैठने की कोई रुचि नहीं दिखाते देखा तो उसे अचरज हुआ। उसने जानना चाहा कि राजा भोज में आज पहले वाली व्यग्रता क्यों नहीं है?

राजा भोज ने कहा कि राजा विक्रमादित्य के देवताओं वाले गुणों की कथाएं सुनकर उन्हें ऐसा लगा कि इतनी विशेषताएं एक मनुष्य में असम्भव हैं और मानते हैं कि उनमें बहुत सारी कमियां हैं। अत: उन्होंने सोचा है कि सिंहासन को फिर वैसे ही उस स्थान पर गड़वा देंगे जहां से इसे निकाला गया है।
राजा भोज का इतना बोलना था कि सारी पुतलियां अपनी रानी के पास आ गईं। उन्होंने हर्षित होकर राजा भोज को उनके निर्णय के लिए धन्यवाद दिया।

पुतलियों ने उन्हें बताया कि आज से वे भी मुक्त हो गईं। आज से यह सिंहासन बिना पुतलियों का हो जाएगा। उन्होंने राजा भोज को विक्रमादित्य के गुणों का आंशिक स्वामी होना बतलाया तथा कहा कि इसी योग्यता के चलते उन्हें इस सिंहासन के दर्शन हो पाए।



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