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क्या श्राद्ध के भोजन में खीर-पूड़ी अनिवार्य है?

Updated: शनिवार, 3 अक्टूबर 2026 (15:35 IST)
पितृपक्ष में खीर-पूड़ी बनाना बहुत से घरों का प्रचलन है। मैं उस परंपरा का सम्मान करता हूँ, लेकिन मेरा प्रश्न है: जिसे हम भोजन कराने जा रहे हैं, क्या उसके लिए खीर-पूड़ी खाना उचित भी है?
 
मेरे 'कलियुग पुराण' का उद्देश्य यही है कि पुराने समय में जो प्रासंगिक था, उसे आज की परिस्थिति में पुनः परखें। पहले घरों में आसानी से दूध उपलब्ध होता था और दूध तथा चावल से खीर बनाई जाती थी। परिवार अपने पितरों की पसंद का भोजन भी तैयार करता था। किंतु आज भोजन ग्रहण करने वाले व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य और खान-पान संबंधी परहेज़ पर भी ध्यान देना आवश्यक है।
 

शास्त्रों में खीर का उल्लेख है, पर क्या हर बार खीर-पूड़ी ही बनानी है?

स्कंद पुराण के नागर खंड (अध्याय 219) में एक विशेष तिथि और नक्षत्र के प्रसंग में दूध से बनी खीर का उल्लेख मिलता है। दूसरी ओर, मनुस्मृति (3.82) में अन्न के साथ जल, दूध, कंद और फल का भी उल्लेख है। मुझे इन संदर्भों में ऐसा कोई सामान्य नियम नहीं मिला कि हर श्राद्ध में खीर और पूड़ी दोनों बनाना अनिवार्य ही है।
 
तो फिर भोजन कराने से पहले एक सीधी बात क्यों न पूछें कि "आप क्या खाते हैं?" या "आपको किस चीज़ से परहेज़ है?"
यदि डॉक्टर ने मीठा खाने से मना किया हो, तो खीर खाने का आग्रह क्यों?
 
आज बहुत से लोग शक्कर कम खाते हैं। किसी को डॉक्टर ने मीठे से परहेज़ बताया है, तो किसी को सुपाच्य और हल्का भोजन करने की सलाह दी गई है। यहाँ तक कि किसी व्यक्ति के लिए गेहूँ से बना भोजन भी उपयुक्त नहीं हो सकता है। ऐसे में खीर-पूड़ी बनाकर यह कहना कि "श्राद्ध है, इसलिए यही खाइए", मुझे उचित नहीं लगता।
 
चिकित्सकीय सलाह व्यक्ति की शारीरिक स्थिति के अनुसार बदलती है। मेरा आग्रह गेहूँ या खीर को सबके लिए अनुचित बताने का नहीं है, बल्कि मेरा आग्रह उस व्यक्ति की आवश्यकता को समझने का है, जिसे हम श्रद्धा से भोजन करा रहे हैं। स्वास्थ्य संबंधी मार्गदर्शन में भी शक्कर सीमित रखने की सलाह दी जाती है।
 
यदि वृद्धाश्रम में भोजन कराना है, तो वहाँ के लोगों को जो भोजन अच्छा लगता है और जिसे वे आसानी से पचा सकते हैं, वही बनवाइए। यदि उन्हें खीर पसंद है और वे खा सकते हैं, तो खीर बनाइए। यदि उन्हें हल्का भोजन चाहिए, तो हल्का भोजन दीजिए। श्रद्धा का वास्तविक अर्थ सामने वाले की आवश्यकता को सुनना और समझना भी है।
 

भोजन का अंश अनेक जीवों तक क्यों पहुँचता है?

हमारे यहाँ श्राद्ध के भोजन का अंश ब्राह्मण या अभ्यागत (अतिथि), गाय, कौवे, कुत्ते और चींटियों जैसे सूक्ष्म जीवों के लिए निकालने का प्रचलन है। मैं इसके पीछे एक अत्यंत सुंदर भाव देखता हूँ—पक्षियों को भी भोजन मिले, धरती पर रहने वाले छोटे जीवों का भी ध्यान रखा जाए, गाय और श्वान भूखे न रहें, और हमारे घर आए भिक्षुक या ज़रूरतमंद व्यक्ति को भी अन्न प्राप्त हो। पितरों की स्मृति में बना भोजन इस प्रकार अनेक जीवों तक पहुँचता है।
 
ग्रंथों में पक्षियों, कुत्तों और छोटे जीवों के लिए अन्न रखने का उल्लेख मिलता है। इसे पंचतत्त्वों से निर्मित शरीर और समस्त जीव-जगत के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने से जोड़कर देखना ही मेरे 'कलियुग पुराण' की व्याख्या है।
 

ब्राह्मण को भोजन कराएँ, तो भाव भी देखें

प्राचीन काल में भिक्षा पर निर्भर रहने वाले ब्राह्मण को भोजन कराना एक सम्मानित परंपरा थी। आज भी यदि कोई ब्राह्मण आपके भाव का आदर करके आपके घर आता है, तो उसे श्रद्धापूर्वक भोजन कराइए।
 
लेकिन मैं यजमान से पूछता हूँ: क्या हम कभी यह देखते हैं कि सामने वाला व्यक्ति आपके पितरों के प्रति निष्ठा और भाव लेकर आया है या केवल दक्षिणा के लिए? यदि कोई व्यक्ति एक ही दिन में कई घरों में भोजन करने जा रहा है, तो आप उसके सामने अपनी भावना रख सकते हैं। श्राद्ध में भाव को दक्षिणा और दिखावे से ऊपर रखा जाना चाहिए।
 
जिस निर्धन व्यक्ति को भोजन की आवश्यकता है, उसे भी खिलाइए; और जिसे इस समय भोजन से अधिक औषधियों की ज़रूरत है, उसकी दवाइयों में सहायता कीजिए।
 

पितरों की याद में आज क्या दे सकते हैं?

आपके माता-पिता या दादा-दादी की पुण्यतिथि आने पर उनकी स्मृति में किसी ज़रूरतमंद को भोजन कराएँ। यदि उनका निधन किसी गंभीर बीमारी के कारण हुआ था, तो उस बीमारी से जूझ रहे निर्धन लोगों तक इलाज या दवाइयों की सहायता पहुँचाने का संकल्प लें। अपनी क्षमतानुसार चिकित्सालयों में सहयोग करें।
 
मैं यही बात आज की युवा पीढ़ी से कहना चाहता हूँ। यदि श्राद्ध की परंपरा को आगे ले जाना है, तो उसे व्यावहारिक, जीवन में अपनाने योग्य और दूसरों के काम आने योग्य बनाइए।
 

क्या पितर नाराज़ हो जाएँगे?

पितृपक्ष को किसी अज्ञात भय का पक्ष मत बनाइए। जब मैं अपने माता-पिता का स्मरण करता हूँ, तो मुझे उनका अगाध स्नेह याद आता है। उन्होंने जीवन भर यही चाहा कि हम सदा प्रसन्न रहें। इसलिए मेरे लिए उनकी स्मृति में किया गया सेवा कार्य किसी भय से किया गया दिखावा नहीं होना चाहिए।
 
यदि आप खीर-पूड़ी बनाना चाहते हैं, तो अवश्य बनाइए, लेकिन इसे श्राद्ध की कोई अनिवार्य शर्त मत मानिए। जिसे भोजन करा रहे हैं, उसकी पसंद और स्वास्थ्य का ध्यान रखें। पितरों की याद में भोजन का अंश अन्य जीवों तक पहुँचाएँ, और जहाँ भोजन से भी बड़ी आवश्यकता हो, वहाँ दवाइयों और इलाज का सहारा दें।
 
मेरे दृष्टिकोण से 'कलियुग पुराण' के अनुसार पितृपक्ष का यही सच्चा भाव है: पितरों के प्रति गहरी श्रद्धा रखें और उसी श्रद्धा के माध्यम से आज किसी जीवित व्यक्ति का दुख-कष्ट कम करें।

लेखक के बारे में
कृष्णा गुरुजी
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