दैनिक कार्यों के नियम-3

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
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और के नियम
 
सनातन धर्म ने हर एक हरकत को नियम में बांधा है और यह नियम ऐसे हैं जिससे आप किसी भी प्रकार का बंधन महसूस नहीं करेंगे, बल्कि यह नियम आपको सफल और निरोगी ही बनाएंगे। जागना और सोना रात और दिन के जैसा नियमित रहना चाहिए।
वर्तमान भौतिक व्यस्तता के समय में प्राय: रात्रि में देर से शयन करने तथा प्रात: देर से जागने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, जिसके कारण अनेक समस्याओं का जन्म होता है। व्यवहार में असंतुलन के कारण सामाजिक वातावरण कुप्रभावित होता है।
 
अच्छी नींद हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी है और अच्छा जागरण हमारी चेतना के विकास और जीवन में सफलता के लिए जरूरी है। नियम से चलना जरूरी है वर्ना प्रकृति हमें जिंदगी से बाहर कर देती है।
 
(A) नींद के नियम :-
1.हम कब सोएं और कब उठे?
रात्रि के पहले प्रहर में सो जाना चाहिए और ब्रह्म मुहूर्त में उठकर संध्यावंदन करना चाहिए। लेकिन आधुनिक जीवनशैली के चलते यह संभव नहीं है तब क्या करें? तब नीचे के दूसरे पाइंट पर तो अमल कर ही सकते हैं। फिर भी जल्दी सोने और जल्दी उठने का प्रयास करें।
 
2.हम कैसे लेटे और हमारा सिर और पैर किस दिशा में हो?
हमें शवासन में सोना चाहिए इससे आराम मिलता है कभी करवट भी लेना होतो बाईं करवट लें। बहुत आवश्यक हो तभी दाईं करवट लें। सिर को हमेशा पूर्व या दक्षिण दिशा में रखकर ही सोना चाहिए। पूर्व या दक्षिण दिशा में सिर रखकर सोने से लंबी उम्र एवं अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त होता है। 
 
2.क्यों नहीं रखते पूर्व दिशा में पैर?
पश्चिम दिशा में सिर रखकर नहीं सोते हैं क्योंकि तब हमारे पैर पूर्व दिशा की ओर होंगे जो कि शास्त्रों के अनुसार अनुचित और अशुभ माने जाते हैं। पूर्व में सूर्य की ऊर्जा का प्रवाह भी होता है और पूर्व में देव-देवताओं का निवास स्थान भी माना गया है।
 
क्यों नहीं रखते दक्षिण दिशा में पैर?
विज्ञान की दृष्टिकोण से देखा जाए तो पृथ्वी के दोनों ध्रुवों उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव में चुम्बकीय प्रवाह विद्यमान है। दक्षिण में पैर रखकर सोने से व्यक्ति की शारीरिक ऊर्जा का क्षय हो जाता है और वह जब सुबह उठता है तो थकान महसूस करता है, जबकि दक्षिण में सिर रखकर सोने से ऐसा कुछ नहीं होता।
 
उत्तर दिशा की ओर धनात्मक प्रवाह रहता है और दक्षिण दिशा की ओर ऋणात्मक प्रवाह रहता है। हमारा सिर का स्थान धनात्मक प्रवाह वाला और पैर का स्थान ऋणात्मक प्रवाह वाला है। यह दिशा बताने वाले चुम्बक के समान है कि धनात्मक प्रवाह वाले आपस में मिल नहीं सकते। 
 
हमारे सिर में धनात्मक ऊर्जा का प्रवाह है जबकि पैरों से ऋणात्मक ऊर्जा का निकास होता रहता है। यदि हम अपने सिर को उत्तर दिशा की ओर रखेंगे को उत्तर की धनात्मक और सिर की धनात्मक तरंग एक दूसरे से विपरित भागेगी जिससे हमारे मस्तिष्क में बेचैनी बढ़ जाएगी और फिर नींद अच्छे से नहीं आएगी। लेकिन जैसे तैसे जब हम बहुत देर जागने के बाद सो जाते हैं तो सुबह उठने के बाद भी लगता है कि अभी थोड़ा और सो लें।
 
जबकि यदि हम दक्षिण दिशा की ओर सिर रखकर सोते हैं तो हमारे मस्तिष्क में कोई हलचल नहीं होती है और इससे नींद अच्छी आती है। अत: उत्तर की ओर सिर रखकर नहीं सोना चाहिए।
 
*सोने के तीन से चार घंटे पूर्व जल और अन्य का त्याग कर देना चाहिए। शास्त्र अनुसार संध्याकाल बितने के बाद भोजन नहीं करना चाहिए।
 
(B) जागरण के नियम :-
शास्त्र कहते हैं तामसिक भोजन करने वाले और तामसिक प्रवृत्ति के लोग मूर्छा में जिते हैं और मूर्छा में ही मर जाते हैं। वे उस जानवर की तरह है जिसका सिर भूमि में ही धंसा रहता है। यह रेंगने वाले ‍कीड़ों जैसी जिंदगी है। आपके कार्य, व्यवहार और प्रवृत्ति से पता चलता है कि आप कितने मूर्छित हैं।
 
जागने का महत्व समझना जरूरी है। कुछ लोग जागकर भी सोए-सोए से रहते हैं। अत्यधिक विचार, कल्पना या खयालों में खोए रहना भी नींद का हिस्सा है इसे दिव्यास्वप्न कहते हैं। इससे जागरण खंडित होता है। किसी भी प्रकार के नशे से भी जागरण खंडित होता है, इसलिए हर तरह का नशा शास्त्र विरुद्ध माना गया है।
 
ब्रह्म मुहूर्त : ब्रह्म मुहूर्त में जागरण से मनुष्य की दिनचर्या नियमित होती है और वह अभिवादन, नित्यकर्म, मांगलिक वस्तुओं का दर्शन, व्यायाम, स्नान, जप, भोजन व विश्रामादि के लिए उचित समय प्राप्त कर लेता है। सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटे पूर्व का समय ब्रांह्मामुहूर्त कहलाता है।
 
ब्रह्म मुहूर्त के लाभ : वेद कहते हैं-समस्त बुद्धियां प्रात:काल के साथ जाग्रत होती हैं। वस्तुत: ब्रांह्मामुहूर्त आध्यात्मिक जागरण का शुभ प्रतीक है। इस समय जागरण से शारीरिक व मानसिक शक्ति का विकास होने के साथ ही आध्यात्मिक प्रगति भी होती है। रक्त में शुद्धता, बुद्धि का विकास, एकाग्रता में सरलता, चिंतन में तन्मयता तथा रोगों के आक्रमण से लड़ने की क्षमता इस मुहूर्त में जागने का परिणाम है।
 
मनोरंजन है मूर्छा : मनोरंजन में अधिक रमना, बहस या वार्तालाप में अत्यधिक रुचि लेने से भी जागरण में व्यवधान उत्पन्न होता है। मनोरंजन से मूर्छा पैदा होती है। मन को भटकाने के बजाय मनोरंज को भी ध्यान बनाया जा सकता है। इससे जागरण की रक्षा होगी।
 
पूर्ण जागरण : आदमी सर्वप्रथम जागता है चेतना से, तभी आंखें खुलती है। जागने के कुछ देर तक नींद की खुमारी छाई रहती है या कहें कि नींद का असर रहता है। यह वैसा ही है कि रात जबकि ब्रह्म मुहूर्त में सूर्य का प्रकाश फैलने वाला रहता है, लेकिन फिर भी कुछ-कुछ अंधेरा भी रहता है। जागते ही सर्वप्रथम हथेलियों को देखकर शुभ मंत्र और शुभदिन की कामना करनी चाहिए।
 
पूरी तरह से जागकर जीना ही सही है। अर्धजाग्रत अवस्था में रहकर जीने से जहां सेहत पर असर होता है वहीं मस्तिष्क को आलस्य की आदत हो जाती है जिससे स्मृतियों का क्षय होने लगता है। ऐसा व्यक्ति किसी भी कार्य में स्वयं का 100 प्रतिशत नहीं दे पाता।
 
साक्षी भाव ही सही जागरण : ध्यान या साक्षी भाव में रहने से जागरण बढ़ता है। उपनिषद् कहते हैं देखने वाले को देखना ही साक्षी भाव है।
 
जागरण का लाभ : शुद्ध रूप से जागे रहने से जहां मस्तिष्क का विकास होता है वहीं अंतर्दृष्टि बढ़ती है। भय, चिंता और किसी भी प्रकार का मानसिक विकार जागरण से दूर हो जाता है। इससे आत्मबल की प्राप्ति होती है।
 
जागरण से रोग और शोक मिटते हैं तथा मृत्युकाल में व्यक्ति को किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होता साथ ही मरने के बाद उसके जागरण के अभ्यास की बदौलत वह गहरी नींद में जाने से बच जाता है। ऐस व्यक्ति पूर्णत: जानता है कि मैं मर चुका हूं। जागरण का अभ्यास करने वाला अमर हो जाता है।



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