भगवान कृष्ण ने किए ये 5 बड़ी भेद नीति

कर्ण का वध : द्रोण के बाद कर्ण को सेनापति बनाया जाता है। कृष्ण की नीति के तहत दुर्योधन के कर्ण के समझ घटोत्कच को उनके सामने उतारा जाता है। घटोत्कच से घबराकर दुर्योधन कर्ण से इंद्र द्वारा दिया गया अमोघ अस्त्र चलाने का कहता है। कर्ण इसके लिए तैयार नहीं होते हैं। वे कहते हैं कि यह अस्त्र मैंने अर्जुन के लिए बचा कर रखा है और इसका एक ही बार इस्तेमाल किया जा सकता है। यह अचूक अस्त्र हैं। लेकिन दुर्योधन की जिद के चलते कर्ण को अपना एकमात्र अस्त्र घटोत्कच पर चलाना पड़ता है जिसके चलते घटोत्कच मारा जाता है।
युद्ध के सत्रहवें दिन शल्य को कर्ण का सारथी बनाया गया। इस दिन कर्ण भीम और युधिष्ठिर को हराकर कुंती को दिए वचन को स्मरण कर उनके प्राण नहीं लेता। बाद में वह अर्जुन से युद्ध करने लग जाता है। कर्ण तथा अर्जुन के मध्य भयंकर युद्ध होता है। कर्ण के रथ का पहिया धंसने पर श्रीकृष्ण के इशारे पर अर्जुन द्वारा असहाय अवस्था में कर्ण का वध कर दिया जाता है।

इसके बाद कौरव अपना उत्साह हार बैठते हैं। उनका मनोबल टूट जाता है। फिर शल्य प्रधान सेनापति बनाए गए, परंतु उनको भी युधिष्ठिर दिन के अंत में मार देते हैं।

इस तरह संपूर्ण युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण की भेद नीति के चलते हार का समना कर रहे पांडव यह युद्ध जीत जाते हैं।



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