आर्य, आर्यावर्त, हिन्दू और सनातन का रहस्य जानिए...

अनिरुद्ध जोशी|
आर्य का अर्थ : आर्य का अर्थ श्रेष्ठ होता है। कौन श्रेष्ठ? वे लोग खुद को श्रेष्ठ मानते थे जो वैदिक धर्म और नीति-नियम अनुसार जीवन यापन करते थे। इसके विपरित जो भी व्यक्ति वेद विरूद्ध जीवन यापन करता था और ब्रह्म को छोड़कर अन्य शक्तियों को मानता था उसे अनार्य मान लिया जाता था। आर्य किसी जाति का नहीं बल्कि एक विशेष विचारधारा को मानने वाले का समूह था जिसमें श्‍वेत, पित, रक्त, श्याम और अश्‍वेत रंग के सभी लोग शामिल थे।
महाकुलकुलीनार्यसभ्यसज्जनसाधव:। -अमरकोष 7।3
अर्थात : आर्य शब्द का प्रयोग महाकुल, कुलीन, सभ्य, सज्जन, साधु आदि के लिए पाया जाता है। 
 
आर्य कोई जाति नहीं बल्कि यह उन लोगों का समूह था जो खुद को आर्य कहते थे और जिनसे जुड़े थे भिन्न-भिन्न जाति समूह के लोग। इस प्रकार आर्य धर्म का अर्थ श्रेष्ठ समाज का धर्म ही होता है।... सायणाचार्य ने अपने ऋग्भाष्य में 'आर्य' का अर्थ विज्ञ, यज्ञ का अनुष्ठाता, विज्ञ स्तोता, विद्वान् आदरणीय अथवा सर्वत्र गंतव्य, उत्तमवर्ण, मनु, कर्मयुक्त और कर्मानुष्ठान से श्रेष्ठ आदि किया है।
 
आदरणीय के अर्थ में तो संस्कृत साहित्य में आर्य का बहुत प्रयोग हुआ है। पत्नी पति को आर्यपुत्र कहती थी। पितामह को आर्य (हिन्दी- आजा) और पितामही को आर्या (हिंदी- आजी, ऐया, अइया) कहने की प्रथा रही है। नैतिक रूप से प्रकृत आचरण करने वाले को आर्य कहा गया है।
 
कर्तव्यमाचनरन् कार्यमकर्तव्यमनाचरन्।
तिष्ठति प्रकृताचारे स आर्य इति उच्यते।।
प्रारंभ में 'आर्य' का प्रयोग प्रजाति अथवा वर्ण के अर्थ नहीं बल्कि इसका नैतिक अर्थ ही अधिक प्रचलित था जिसके अनुसार किसी भी वर्ण अथवा जाति का व्यक्ति अपनी श्रेष्ठता अथवा सज्जनता के कारण आर्य कहे जाने का अधिकारी होता था। वाल्मीकी रामायण में समदृष्टि रखने वाले और सज्जनता से पूर्ण श्रीरामचन्द्रजी को स्थान-स्थान पर ‘आर्य’ व 'आर्यपुत्र' कहा गया है। विदुरनीति में धार्मिक को, चाणक्यनीति में गुणीजन को, महाभारत में श्रेष्ठबुद्धि वाले को तथा गीता में वीर को ‘आर्य’ कहा गया है। महर्षि दयानन्द सरस्वतीजी ने आर्य शब्द की व्याख्या में कहा है कि 'जो श्रेष्ठ स्वभाव, धर्मात्मा, परोपकारी, सत्य-विद्या आदि गुणयुक्त और देश में सब दिन से रहने वाले हैं उनको आर्य कहते हैं।'> >
आर्य कौन : पशु, पक्षी, वृक्ष आदि भिन्न-भिन्न जातियां है उसी तरह मनुष्य भी एक जाति है जिसकी उत्पत्ति का मूल एक ही है। जाति रूप से तो मनुष्यों में कोई भेद नहीं है परंतु गुण, कर्म, स्वभाव व व्यवहार आदि में भिन्नता होती है। कर्म के भेद से मनुष्य जाति में दो भेद किए जा सकते हैं:- 1.आर्य और 3.दस्यु। एक ही परिवार में यह दोनों हो सकते हैं।
 
वेद कहता है 'कृण्वन्तो विश्वमार्यम' अर्थात सारे संसार को आर्य बनाओं। वेद में आर्य (श्रेष्ठ मनुष्यों) को ही पदार्थ दिये जाने का विधान किया गया है:' 'अहं भूमिमददामार्याय' अर्थात मैं आर्यों को यह भूमि देता हूं। इसका अर्थ यह हुआ कि आर्य परिश्रम से अपना कल्याण करता हुआ, परोपकार वृत्ति से दूसरों को लाभ ही पहुंचाएगा जबकि दस्यु दुष्ट स्वार्थी सब प्राणियों को हानि ही पहुंचाएगा। अत: दुष्ट को अपनी भूमि आदि संपत्ति नहीं दी जानी चाहिए चाहे वह आपका पुत्र ही क्यों न हो। रावण के पिता आर्य थे लेकिन रावण एक दस्यु था।
 
वेद में कहा है, 'विजानह्याय्यान्ये च दस्यव:' अर्थात आर्य और दस्युओं का विशेष ज्ञान रखना चाहिए। निरुक्त आर्य को सच्चा ईश्वर पुत्र से संबोधित करता है। वेद मंत्रों में सत्य, अहिंसा, पवित्रता आदि गुणों को धारण करने वाले को आर्य कहा गया है और सारे संसार को आर्य बनाने का संदेश दिया गया है।
 
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