भारत पर इन 11 विदेशियों ने किया था राज

का इतिहास अंग्रेजों ने लिखा जिसके चलते देश के हिन्दू और मुसलमानों में भ्रम और द्वेष की स्थिति फैल गई, जो आज तक फैली हुई है। इतिहास के इस भ्रम और झूठ को हटाकर अब लोगों को सत्य बताने का कोई मतलब नहीं है। लेकिन इतिहास के सच को उसी तरह लिखा जाना चाहिए, जैसा कि वह है। जस का तस। किसी भी प्रकार की सचाई को छिपाना इतिहास के साथ खिलवाड़ करना है। जिस देश के पास अपना खुद का कोई सच्चा इतिहास नहीं, उस देश के नागरिकों में राष्ट्रीयता और गौरवबोध की भावना का विकास होना भी मुश्किल होता है। 
 
उल्लेखनीय है कि संपूर्ण भारत पर कोई विदेशी पूर्णत: शासन नहीं कर पाया। हिन्दूकुश से लेकर अरुणाचल तक और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक युधिष्ठिर और उसके पूर्ववर्ती राजाओं के अलावा राजा विक्रमादित्य, चंद्रगुप्त मौर्य और मिहिरकुल ने ही संपूर्ण भारत पर शासन किया था। इसके बाद अंग्रेज काल में अफगानिस्तान को भारत से मुगल काल में ही अलग कर दिया गया था। ऐसे में अंग्रेजों ने जिस भारत पर शासन किया, वह एक खंडित भारत था। 
 
सन् 187 ईपू में मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारतीय इतिहास की राजनीतिक एकता बिखर गई। अब हिन्दूकुश से लेकर कर्नाटक एवं बंगाल तक एक ही राजवंश का आधिपत्य नहीं रहा और छोटे-छोटे जनपदों में देश बिखर गया। इस खंडित एकता के चलते देश के उत्तर-पश्चिमी मार्गों से कई विदेशी आक्रांताओं ने आकर अनेक भागों में अपने-अपने राज्य स्थापित कर लिए। इन विदेशियों के कारण ही भारत में एक ओर जहां वैचारिक ‍भिन्नता का जन्म हुआ, वहीं विदेशी धर्मों का भी विकास हुआ। विदेशी लोगों के आगमन से जो एक सामाजिक तनाव उत्पन्न हुआ, उसका असर आज तक भारत पर देखने को मिलता है। उनके कारण जहां अखंड भारत खंड-खंड होता गया, वहीं भारतीयों में ही अब धर्म, जाति आदि के नाम पर फूट हो गई। जातियों के प्रति गहरी आस्था का कारण वर्ण संकर समाज से बचने का था। आज भारत में जो भी जातियां, धर्म या समाज नजर आते हैं, उन सभी की शुरुआत ईसा की प्रारंभिक तीन-चार शताब्दियों में हुई थी।
 
आओ, हम जानते हैं उन विदेशी आक्रांताओं के बारे में जिन्होंने भारत पर शासन करके भारतीय अस्मिता और गौरव को लगभग नष्ट करने का भरपूर प्रयास किया। उनमें से कुछ ऐसे भी थे ‍‍जिन्होंने भारतीय धर्म और संस्कृति को संरक्षण भी प्रदान कर भारतीय जनता को जीने का अधिकार दिया।
 
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