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पुरी में इस तरह निकालते हैं जगन्नाथजी की रथयात्रा, जानिए परंपरा की 9 खास बातें

Updated: शनिवार, 10 जुलाई 2021 (11:39 IST)
जगन्नाथ पुरी में रथयात्रा की परंपरा में बहुत तरह की रस्में निभाई जाती है। प्रभु जगन्नाथ की यात्रा उनके मंदिर से प्रारंभ होती है और  2 किलोमीटर के मार्ग का सफर तय करके गुंडिचा मंदिर पहुंचती है। इस दौरान यात्रा के पूर्व, यात्रा के बीच और यात्रा की पुन: वापसी के दौरान कई तरह की रस्में निभाई जाती है। आओ जानते हैं परंपरा की खास 9 बातें।
 
 
1. ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन प्रभु जगन्नाथ को बड़े भाई बलरामजी तथा बहन सुभद्रा के साथ रत्नसिंहासन से उतार कर मंदिर के पास बने स्नान मंडप में ले जाया जाता है।
 
2. 108 कलशों से उनका शाही स्नान होता है। फिर मान्यता यह है कि इस स्नान से प्रभु बीमार हो जाते हैं उन्हें ज्वर आ जाता है। तब 15 दिन तक प्रभु जी को एक विशेष कक्ष में रखा जाता है। जिसे ओसर घर कहते हैं। 
 
3. इस 15 दिनों की अवधि में महाप्रभु को मंदिर के प्रमुख सेवकों और वैद्यों के अलावा कोई और नहीं देख सकता। इस दौरान मंदिर में महाप्रभु के प्रतिनिधि अलारनाथ जी की प्रतिमा स्थपित की जाती हैं तथा उनकी पूजा अर्चना की जाती है। 
 
4. 15 दिन बाद भगवान स्वस्थ होकर कक्ष से बाहर निकलते हैं और भक्तों को दर्शन देते हैं। जिसे नव यौवन नैत्र उत्सव भी कहते हैं। इसके बाद द्वितीया के दिन महाप्रभु श्री कृष्ण और बडे भाई बलराम जी तथा बहन सुभद्रा जी के साथ बाहर राजमार्ग पर आते हैं और रथ पर विराजमान होकर नगर भ्रमण पर निकलते हैं।
 
5. रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ के अलावा उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा के रथ भी निकाले जाते हैं। रथयात्रा जगन्नाथ मंदिर से शुरू होकर गुण्डिच्चा मंदिर तक पहुंचती है। गुण्डिच्चा या गुंडिचा राजा इंद्रद्युम्न की पत्नी थी जिसने एक गुफा में बैठकर तब तक तपस्या की थी जब तक की राजा इंद्रद्युम्न ब्रह्मालोक से लौटकर नहीं आ गए थे। उनकी तपस्या के चलते ही वह देवी बन गई और उनके तप के बल से ही राजा नारदमुनि के साथ ब्रह्मलोक की यात्रा करने समय पर लौट आए।  
 
6. यात्रा की शुरुआत सबसे पहले बलभद्र जी के रथ से होती है। उनका रथ तालध्वज के लिए निकलता है. इसके बाद सुभद्रा के पद्म रथ की यात्रा शुरू होती है। सबसे अंत में भक्त भगवान जगन्नाथ जी के रथ 'नंदी घोष' को बड़े-बड़े रस्सों की सहायता से खींचना शुरू करते हैं। गुंडीचा मां के मंदिर तक जाकर यह रथयात्रा पूरी मानी जाती है। माना जाता है कि मां गुंडीचा भगवान जगन्नाथ की मासी हैं। यहीं पर देवताओं के इंजीनियर माने जाने वाले विश्वकर्मा जी ने भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की प्रतिमा का निर्माण किया था।
 
7. छेरा पहरा एक रस्म होती है, जो रथयात्रा के पहले दिन निभाई जाती है। जिसमें पुरी के महाराज के द्वारा यात्रा मार्ग और रथों को सोने की झाडू से साफ किया जाता है। इसके बाद पहांडी एक धार्मिक परंपरा है, जिसमें भक्त बलभद्र, सुभद्रा और भगवान श्रीकृष्ण को गुंडिचा मंदिर तक रथ यात्रा करवाते हैं। गुंडिचा भगवान की भक्त थीं। मान्यता है कि भक्ति का सम्मान करते हुए भगवान हर साल उनसे मिलने जाते हैं। जगन्नाथ पुरी में भक्त भगवान के रथ को खींचते हुए दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित गुंडिचा मंदिर तक ले जाते हैं और नवें दिन वापस लाया जाता है। 
 
8. गुंडीचा मार्जन परंपरा के अनुसार रथ यात्रा से एक दिन पहले श्रद्धालुओं के द्वारा गुंडीचा मंदिर को शुद्ध जल से धो कर साफ किया जाता है। इस परंपरा को गुंडीचा मार्जन कहा जाता है। जब जगन्नाथ यात्रा गुंडिचा मंदिर में पहुंचती है तब भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा एवं बलभद्र जी को विधिपूर्वक स्नान कराया जाता है और उन्हें पवित्र वस्त्र पहनाए जाते हैं। यात्रा के पांचवें दिन हेरा पंचमी का महत्व है। इस दिन मां लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ को खोजने आती हैं, जो अपना मंदिर छोड़कर यात्रा में निकल गए हैं। 
 
9. नौवें दिन रथयात्रा पुन: भगवान के धाम आ जाती है।

लेखक के बारे में
अनिरुद्ध जोशी
पत्रकारिता के क्षेत्र में 26 वर्षों से साहित्य, धर्म, योग, ज्योतिष, करंट अफेयर्स और अन्य विषयों पर लिख रहे हैं। वर्तमान में विश्‍व के पहले हिंदी पोर्टल वेबदुनिया में सह-संपादक के पद पर कार्यरत हैं। दर्शनशास्त्र एवं ज्योतिष: मास्टर डिग्री (Gold Medalist), पत्रकारिता: डिप्लोमा। योग, धर्म और ज्योतिष में विशेषज्ञता।.... और पढ़ें

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