हिन्दू धर्मशास्त्रों में आए शब्दों का अर्थ जानिए-1

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
हिन्दू शास्त्रों में आए बहुत से शब्दों के का अनर्थ किए जाने के कारण समाज में भटकाव, भ्रम और विभाजन की‍ स्थिति बनी है। आओ जानते हैं किस का क्या सही अर्थ है।
1. शूद्र : यह शब्द अक्सर गलत संदर्भों में प्रचारित किया जाता रहा है और इसके अर्थ भी गलत निकाले जाते रहे हैं। 'वेदांत सूत्र' में बादरायण ने 'शूद्र' शब्द को दो भागों में विभक्त किया गया- 'शुक्’ और ‘द्र’, जो ‘द्रु’ धातु से बना है और जिसका अर्थ है, दौड़ना। शंकर ने इसका अर्थ निकाला 'वह शोक के अंदर दौड़ गया’, ‘वह शोक निमग्न हो गया’ (शुचम् अभिदुद्राव)। शूद्र शब्द निकला है शुक् (दुःख)+द्र (बेधित) अर्थात जो दुख से बेधित है वह शूद्र है। हालांकि कुछ विद्वान कहते हैं कि जिसका शुद्ध आचरण न हो उन्हें शूद्र कहा जाता था। ऐसी कई जातियां थीं, जो मांसभक्षण के अलावा शराबादि का सेवन करती थीं उनको शूद्र मान लिया गया था और ऐसे भी लोग थे जिन्होंने समाज के नियमों को तोड़कर अन्य से रोटी-बेटी का संबंध रखा उनको भी शूद्र मान लिया गया और जो काले या मलिच होते थे उनको भी शूद्र मान लिया गया। दूसरा, समाज के वे बहिष्कृत लोग जिन्हें शूद्र माना गया। ऐसा हर देश और धर्म में होता रहा है, जहां इस तरह के लोगों को अलग-अलग नाम से पुकारा जाता है।> > कैसे हिन्दुओं को जाति में बांटा गया?
अक्सर यह पढ़ने को मिलता है- 'शूद्र वर्ण'। इस शूद्र शब्द को ही इतिहास को बिगाड़ने वालों ने क्षुद्र, दास, अनार्य में वर्णित किया। वेदों में सबसे बाद में अथर्ववेद लिखा गया जिसमें समाज के ऊंच-नीच की चर्चा मिलती है लेकिन शूद्र शब्द की चर्चा नहीं मिलती। वैदिककाल के अंत के बाद यह शब्द अस्तित्व में आया। वास्तविकता यह है कि आर्थिक तथा सामाजिक विषमताओं के कारण आर्य और आर्येतर दोनों के अंदर श्रमिक समुदाय का उदय हुआ और ये श्रमिक आगे जाकर शूद्र कहलाए। बाद में इन्हें ही क्षुद्र कहा जाने लगा, इन्हें ही अछूत और इन्हें ही दास भी। हालांकि कुछ लोग क्षुद्र का अर्थ छोटा, अछूत का अर्थ जिसे छूना नहीं और दास का अर्थ गुलाम निकालते हैं। लेकिन यदि आपको समाज का विभाजन करना है तो शूद्र का अर्थ आप मनमाने तरीके से नीच भी कर सकते हैं।

हिन्दू समाज को तोड़ने के लिए शूद्र का हर काल में अलग-अलग अर्थ किया गया। यहां यह बताना जरूरी है कि शूद्र भी आर्य थे। इसके सैकड़ों उदाहरण शास्त्रों में मिलेंगे। युधिष्ठिर के राज्याभिषेक में भी शूद्र बुलाए गए थे। यह बात महाभारत सभापर्व अध्याय 33 श्लोक 41-42 से सिद्ध है। प्रजा की दो मुख्य सभाएं थीं अर्थात जनपद और पौर। इन दोनों के कुछ सभासद शूद्र होते थे, इन सभासदों का ब्राह्मण भी आदर करते थे।

मैत्रेयी संहिता (4-2-7-10), पंचविंश ब्राह्मण (6-1-11), ऋग्वेद (7-8-6-7; 8-19-36; 8-56-3) से ज्ञात होता था कि आर्य भी गुलाम होते थे। अतएव पश्चिमी मत कि शूद्रों को आर्यों ने गुलाम बनाया था सर्वथा गलत है। और शूद्र न तो दास्य थे और न दस्यु।

2. आर्य : आर्य का अर्थ होता है श्रेष्ठ। अधिकतर लोगों ने या कहें कि हमारे तथा‍कथित जाने-माने इतिहासकारों ने लिखा है कि आर्य एक जाति थी, जो मध्य एशिया से भारत में आई थी और जिसने यहां के दास और दस्यु को हाशिये पर धकेलकर राज्य किया था। उनकी यह धारणा बिलकुल ही गलत है। यहां यह बताना जरूरी है कि आर्य नाम की कोई जाति नहीं थी। आर्य उन लोगों को कहा जाता था, जो वेदों को मानते थे। और जो वेदों को नहीं मानते थे उन्हें अनार्य कहा जाता था। वेदों को मानने वालों में भारत की कई जातियों के लोग शामिल थे। आर्यों के बारे में पश्‍चिम का मत पूर्णत: गलत है। आर्यों के काल में ऐसे भी कई आर्य थे (‍जिनके पूर्वज वेद को मानकर ही आर्य कहलाए थे)। जो वेदों को नहीं मानते थे फिर भी वे आर्य कहलाते थे, जैसे आज ऐसे कई हिन्दू हैं, जो नास्तिक हैं फिर भी है तो हिन्दू ही। यहां यह बताना जरूरी है कि शूद्र भी आर्य थे। इसके सैकड़ों उदाहरण शास्त्रों में मिलेंगे।

(मैत्रेयी संहिता 4-2-7-10) पंचविंश ब्राह्मण (6-1-11) ऋग्वेद (7-8-6-7; 8-19-36; 8-56-3) से ज्ञात होता था कि आर्य भी गुलाम होते थे। अतएव पश्चिमी मत कि शूद्र गुलाम होते थे सर्वथा गलत है। पश्चिम के इतिहासकारों ने लिखा कि मध्य एशिया के आर्यों द्वारा जब भारत पर कब्जा किया तब दास-दस्यु जीत लिए गए और वे लोग दास बना लिए गए और वही शूद्र कहलाए। उक्त इतिहासकारों का यह मत गलत है।

3. दास : ऋग्वेद में दास का उल्लेख हुआ है। आज भी बहुत से ऐसे संत और साधारण लोग हैं, ‍जो अपने नाम के आगे दास लगाते हैं जैसे कालिदास, रामदास, हरिदास आदि। 'दास' का अर्थ सेवक और उपासक माना जाता है। पहले आश्रमों और राजगृहों में ऐसे लोग होते थे, जो अपने अन्नदाता की रक्षा और सेवा करते थे। दस्यु या दास शब्द किसी जाति विशेष का नाम नहीं था।

4. दस्यु : दस्यु दो अर्थों में पाया जाता है- पहला, दास के अर्थ में और दूसरा, अपराधी के अर्थ में। पहले इन्हें दुष्टजन माना जाता था। आजकल दस्यु का अर्थ डाकू से लिया जाता है। प्रत्येक देश और समाज में श्रेष्ठ और अश्रेष्ठ कर्म करने वाले लोग रहते हैं। आर्य और दस्यु शब्द गुणवाचक हैं, जातिवाचक नहीं।

दृश्यंते मानुषेषु लोक सर्वे वर्णेषु दस्यवः।
लिंगांतरे वर्तमाना आश्रमेषु वतुर्ष्वपि॥ -(महाभारत शांतिपर्व, अध्याय 65 श्लोक 23)
अर्थात : सभी वर्णों में और सभी आश्रमों में दस्यु पाए जाते हैं।


'हे शूरवीर राजन्! विविध शक्तियों से युक्त आप एकाकी विचरण करते हुए अपने शक्तिशाली अस्त्र से धनिक दस्यु (अपराधी) और सनक: (अधर्म से दूसरों के पदार्थ छीनने वाले) का वध कीजिए। आपके अस्त्र से वे मृत्यु को प्राप्त हों। ये सनक: शुभ कर्मों से रहित हैं। -ऋग्वेद 1।33।4

5. ब्राह्मण : ब्राह्मण शब्द ब्रह्म से बना है। जो ब्रह्म (ईश्वर) को छोड़कर अन्य किसी को नहीं पूजता, वह ब्राह्मण कहा गया है। जो पुरोहिताई करके अपनी जीविका चलाता है, वह ब्राह्मण नहीं, याचक है। जो ज्योतिषी या नक्षत्र विद्या से अपनी जीविका चलाता है वह ब्राह्मण नहीं, ज्योतिषी है। पंडित तो किसी विषय के विशेषज्ञ को कहते हैं और जो कथा बांचता है वह ब्राह्मण नहीं कथावाचक है। इस तरह वेद और ब्रह्म को छोड़कर जो कुछ भी कर्म करता है वह ब्राह्मण नहीं है। जिसके मुख से ब्रह्म शब्द का उच्चारण नहीं होता रहता, वह ब्राह्मण नहीं।

स्मृति पुराणों में ब्राह्मण के 8 भेदों का वर्णन मिलता है- मात्र, ब्राह्मण, श्रोत्रिय, अनुचान, भ्रूण, ऋषिकल्प, ऋषि और मुनि। 8 प्रकार के ब्राह्मण श्रुति में पहले बताए गए हैं। इसके अलावा वंश, विद्या और सदाचार से ऊंचे उठे हुए ब्राह्मण ‘त्रिशुक्ल’ कहलाते हैं। ब्राह्मण को धर्मज्ञ विप्र और द्विज भी कहा जाता है।

शनकैस्तु क्रियालोपदिनाः क्षत्रिय जातयः।
वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणा दर्शनेन च॥
पौण्ड्रकाशचौण्ड्रद्रविडाः काम्बोजाः भवनाः शकाः ।
पारदाः पहल्वाश्चीनाः किरताः दरदाः खशाः॥ -मनुसंहिता (1-/43-44)


अर्थात ब्राह्मणत्व की उपलब्धि को प्राप्त न होने के कारण उस क्रिया का लोप होने से पोण्ड्र, चौण्ड्र, द्रविड़ काम्बोज, भवन, शक, पारद, पहल्व, चीनी किरात, दरद व खश ये सभी क्षत्रिय जातियां धीरे-धीरे शूद्रत्व को प्राप्त हो गईं।

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