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आखिर क्या है मंदिरों का वैज्ञानिक रहस्य, जानिए...

Updated: शनिवार, 4 नवंबर 2017 (12:45 IST)
अनेक प्राचीन मंदिर ऐसे स्थलों या पर्वतों पर बनाए गए हैं, जहां से चुंबकीय तरंगें घनी होकर गुजरती हैं। इस तरह के स्थानों पर बने मंदिरों में प्रतिमाएं ऐसी जगह रखी जाती थीं, जहां चुंबकत्व का प्रभाव ज्यादा हो। यहीं पर तांबे का छत्र और तांबे के पाट रखे होते थे और आज भी कुछ स्थानों पर रखे हैं।

तांबा बिजली और चुंबकीय तरंगों को अवशोषित करता है। इस प्रकार जो भी व्यक्ति प्रतिदिन मंदिर जाकर इस मूर्ति की घड़ी के चलने की दिशा में परिक्रमा करता है, वह इस एनर्जी को अवशोषित कर लेता है। इससे उसको मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य लाभ मिलता है। हालांकि यह एक धीमी प्रक्रिया मानी जा सकती है लेकिन इससे मस्तिष्क में सकारात्मक ऊर्जा का विकास होता है।
 
इसके अलावा प्रतिमा के समक्ष प्रज्वलित दीपक ऊष्मा की ऊर्जा का वितरण करता है एवं शंख-घंटियों की ध्वनि तथा लगातार होते रहने वाले मंत्रोच्चार से एक ब्रह्मांडीय नाद बनता है तो मन और मस्तिष्क को नियंत्रित कर ध्यानपूर्ण बना देता है। मंत्रमुग्ध हो जाने के मतलब ही यही है। इसके अलावा मंदिरों में तांबे के एक पात्र में तुलसी और कपूर-मिश्रित जल भरा होता है जिसका सेवन करने से जहां रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है वहीं इससे ब्रह्म-रन्ध्र में शांति मिलती है। इस तरह के मंदिरों में यदि आप पवित्र होकर पवित्र भावना से जाएं और प्रार्थना करेंगे तो आपकी मांग जरूर पूरी होती।
 
मंदिर में शिखर होते हैं। शिखर की भीतरी सतह से टकराकर ऊर्जा तरंगें व ध्वनि तरंगें व्यक्ति के ऊपर पड़ती हैं। ये परावर्तित किरण तरंगें मानव शरीर आवृत्ति बनाए रखने में सहायक होती हैं। व्यक्ति का शरीर इस तरह से धीरे-धीरे मंदिर के भीतरी वातावरण से सामंजस्य स्थापित कर लेता है। इस तरह मनुष्य असीम सुख का अनुभव करता है।
 
पुराने मंदिर सभी धरती के धनात्मक (पॉजीटिव) ऊर्जा के केंद्र हैं। ये मंदिर आकाशीय ऊर्जा के केंद्र में स्थित हैं। उदाहरणार्थ उज्जैन का महाकाल मंदिर कर्क रेखा पर स्थित है। ऐसे धनात्मक ऊर्जा के केंद्र पर जब व्यक्ति मंदिर में नंगे पैर जाता है तो इससे उसका शरीर अर्थ हो जाता है और उसमें एक ऊर्जा प्रवाह दौड़ने लगता है। वह व्यक्ति जब मूर्ति के जब हाथ जोड़ता है तो शरीर का ऊर्जा चक्र चलने लगता है। जब वह व्यक्ति सिर झुकाता है तो मूर्ति से परावर्तित होने वाली पृथ्वी और आकाशीय तरंगें मस्तक पर पड़ती हैं और मस्तिष्क पर मौजूद आज्ञा चक्र पर असर डालती हैं। इससे शांति मिलती है तथा सकारात्मक विचार आते हैं जिससे दुख-दर्द कम होते हैं और भविष्य उज्ज्वल होता है।

लेखक के बारे में
अनिरुद्ध जोशी
पत्रकारिता के क्षेत्र में 26 वर्षों से साहित्य, धर्म, योग, ज्योतिष, करंट अफेयर्स और अन्य विषयों पर लिख रहे हैं। वर्तमान में विश्‍व के पहले हिंदी पोर्टल वेबदुनिया में सह-संपादक के पद पर कार्यरत हैं। दर्शनशास्त्र एवं ज्योतिष: मास्टर डिग्री (Gold Medalist), पत्रकारिता: डिप्लोमा। योग, धर्म और ज्योतिष में विशेषज्ञता।.... और पढ़ें

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