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कविता : आ जाती हैं कुछ यादें

Updated: बुधवार, 18 अप्रैल 2018 (11:41 IST)
-डॉ. रूपेश जैन 'राहत'
धूल की पर्तों के नीचे तस्वीरों में अहसास जगाती हुई,
ख़्वाहिशें कांधे पे लिए कुछ इठलाती हुईं,
आ जाती हैं कुछ यादें दिल को बहकाती हुईं।
 
चढ़ती हुई जवानी में फ़ितरतन नगमे गुनगुनाती हुई,
बेशर्मी में मुस्कुराते, गले लगते शर्माती हुई,
आ जाती हैं कुछ यादें दिल को बहकाती हुईं।
 
चादर पे जुम्बिशें, रात चांदनी जाती हुई,
शोख़ नखरे, बलखाती, हसरतें दौड़ाती हुईं,
आ जाती हैं कुछ यादें दिल को बहकाती हुईं।
 
कश्मकश में कतराती, इशारा दे जाती हुई,
दबे पांव आकर, शोला भड़काती हुई,
आ जाती हैं कुछ यादें दिल को बहकाती हुईं।
 
नजर उठा के देखो तो बेचैन कर जाती हुई,
हवा के रुख पे जज़्बात सजाती हुई,
आ जाती हैं कुछ यादें दिल को बहकाती हुईं।

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