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कविता : वियोग एवं श्रृंगार

Updated: मंगलवार, 23 अगस्त 2016 (14:12 IST)
सपने मेरी आंख के, नयन नीर टपकाएं।
दिल की सरहद छोड़कर, तेरे तट तक जाएं।


 
नारी जीवन सर्प-सा, डसे स्वयं को आज।
पक्षी के पर कट गए, बंद हुई परवाज।
 
जादू तेरी आंख का, जाए हृदय को बींध।
मन चंचल बेचैन है, नैन निहारें नींद।
 
पिघली-पिघली आंच-सी, तुम हो तन के पास।
मन मेरा बैरी बना, तुम पर अटकी सांस।
 
सागर-सी गहरी लगे, मुझको तेरी आंख।
जीवन पिघला बर्फ-सा, मन-मयूर की पांख।
 
मन मयूर मकरंद भयो, जैसे नाचे मोर।
प्रीत पियारी-सी लगे, मन में उठत हिलोर।
 
प्रीत लपट में झुलसकर, मन हंसा बेचैन।
एक नजर की आस में, सावन बरसे नैन।
 
सागर जैसा दर्द है, पर्वत जैसी पीर।
प्रियतम तेरे विरह में, जीवन हुआ अधीर।
 
लेखक के बारे में
सुशील कुमार शर्मा
वरिष्ठ अध्यापक, गाडरवारा.... और पढ़ें
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