dharma sangrah

प्रेम कविता : संकोच

Updated: गुरुवार, 16 नवंबर 2017 (16:16 IST)
शर्मे हयात गर तू यूं करती रही 
जिन्दगी की पतवार फिर, न संभले कभी
बीत जाएगी जिन्दगी मेरी, फिर उस जहां में
जहां हुस्ने-मलिकाएं नित संवरती रही
जिगरे नांदा को न तोड़ ओ मेरे दिले नूर
वर्ना मिल जाएगी दिल बहलाने, कई जन्नते हूर
पीव दिले रोशन करे गर मेरा, जन्नत की हूर
हुजूर जाएगा कहां फिर तेरा ये शबाबे नूर
मुझे इल्जाम न लगा देना बेवफाई का, हो अपने में गरूर
रबे ढ़ह जाएगी शराफत की दीवारे, गर रहा उसे मंजूर। 

 

लेखक के बारे में
आत्माराम यादव 'पीव'
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