ramcharitmanas
✕

प्रेम कविता : संकोच

Updated: गुरुवार, 16 नवंबर 2017 (16:16 IST)
शर्मे हयात गर तू यूं करती रही 
जिन्दगी की पतवार फिर, न संभले कभी
बीत जाएगी जिन्दगी मेरी, फिर उस जहां में
जहां हुस्ने-मलिकाएं नित संवरती रही
जिगरे नांदा को न तोड़ ओ मेरे दिले नूर
वर्ना मिल जाएगी दिल बहलाने, कई जन्नते हूर
पीव दिले रोशन करे गर मेरा, जन्नत की हूर
हुजूर जाएगा कहां फिर तेरा ये शबाबे नूर
मुझे इल्जाम न लगा देना बेवफाई का, हो अपने में गरूर
रबे ढ़ह जाएगी शराफत की दीवारे, गर रहा उसे मंजूर। 

 

लेखक के बारे में
आत्माराम यादव 'पीव'
वरिष्ठ पत्रकार.... और पढ़ें

Show comments

सभी देखें

मच्छर के काटने से खुजली क्यों होती है? जानें वैज्ञानिक कारण और उपचार

Health Tips: बॉड़ी में शुगर कम होने पर क्या-क्या परेशानियां होती हैं, जानें काम की बातें

हाथों और आंखों में छिपे हैं लिवर की बीमारी के संकेत! भूलकर भी न करें इन्हें नजरअंदाज

बारिश के मौसम में चाय के साथ बनाएं ये 5 परफेक्ट कॉम्बिनेशन वाले क्रिस्पी स्नैक्स, हर कोई करेगा तारीफ

समय रहते अगर हो जाए लक्षणों की पहचान, तो कैंसर जैसे रोगों का उपचार भी संभव

सभी देखें

वाणी साहित्य उत्सव का आगाज, पहले दिन युद्ध, स्त्री विमर्श और एआई के दौर में लेखन पर हुआ मंथन

वर्ल्ड स्ट्रोक डे: स्ट्रोक के लक्षण दिखते ही लें चिकित्सकीय सहायता, हर मिनट है कीमती

बौखलाए नेताओं की बेरहमी का ये सबसे निर्दयी उदाहरण है, 200 पेड़ों से हजारों परिंदों के आशियाने उजाड़कर मेट्रो चलाएंगे

करवा चौथ से पहले चेहरे पर कैसे लाएं नेचुरल ग्लो? घर पर अपनाएं ये आसान ब्यूटी टिप्स

विजय सिंह चौहान की आठ लघुकथाएं

अगला लेख