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धन और समृद्धि की देवी मां लक्ष्मी किसकी हैं पुत्री?

Updated: रविवार, 8 नवंबर 2020 (17:17 IST)
हाल ही में हॉलीवुड एक्ट्रेस सलमा हायेक ने योग और मां लक्ष्मी को लेकर एक ट्वीट किया है। सलमा हायेक अपने ट्विटर हैंडल से मां लक्ष्मी की फोटो पोस्ट की साथ ही साथ उन्होंने कैप्शन में लिखा- 'जब मैं अपनी आंतरिक सुंदरता से जुड़ना चाहती हूं तो मैं मां लक्ष्मी पर अपना ध्यान केंद्रित करती हूं, जो हिंदू धर्म में धन, सौभाग्य, प्रेम, सुंदरता, माया, आनंद और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती हैं। उनकी छवि मुझे आनंद देती है और आनंद आपकी आंतरिक सुंदरता का सबसे महान द्वार है।' आओ इसी संदर्भ में जानते हैं माता लक्ष्मी का संक्षिप्त परिचय।
 
 
माता लक्ष्मी का परिचय : ऋषि भृगु की पुत्री माता लक्ष्मी थीं। उनकी माता का नाम ख्याति था। (समुद्र मंथन के बाद क्षीरसागर से जो लक्ष्मी उत्पन्न हुई थी उसका इनसे कोई संबंध नहीं। हालांकि उन महालक्ष्मी ने स्वयं ही विष्णु को वर लिया था।) म‍हर्षि भृगु विष्णु के श्वसुर और शिव के साढू थे। महर्षि भृगु को भी सप्तर्षियों में स्थान मिला है।
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राजा दक्ष के भाई भृगु ऋषि थे। इसका मतलब राजा द‍क्ष की भतीजी थीं। माता लक्ष्मी के दो भाई दाता और विधाता थे। भगवान शिव की पहली पत्नी माता सती उनकी (लक्ष्मीजी की) सौतेली बहन थीं। सती राजा दक्ष की पुत्री थी। माता लक्ष्मी के 18 पुत्रों में से प्रमुख चार पुत्रों के नाम हैं:- आनंद, कर्दम, श्रीद, चिक्लीत। माता लक्ष्मी को दक्षिण भारत में श्रीदेवी कहा जाता है।
 
लक्ष्मी-विष्णु विवाह कथा : जब लक्ष्मीजी बड़ी हुई तो वह भगवान नारायण के गुण-प्रभाव का वर्णन सुनकर उनमें ही अनुरक्त हो गई और उनको पाने के लिए तपस्या करने लगी उसी तरह जिस तरह पार्वतीजी ने शिव को पाने के लिए तपस्या की थी। वे समुद्र तट पर घोण तपस्या करने लगीं। तदनन्तर लक्ष्मी जी की इच्छानुसार भगवान विष्णु ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।
 
दूसरी विवाह कथा : एक बार लक्ष्मीजी के लिए स्वयंवर का आयोजन हुआ। माता लक्ष्मी पहले ही मन ही मन विष्णु जी को पती रूप में स्वीकार कर चुकी थी लेकिन नारद मुनि भी लक्ष्मीजी से विवाह करना चाहते थे। नारदजी ने सोचा कि यह राजकुमारी हरि रूप पाकर ही उनका वरण करेगी। तब नारदजी विष्णु भगवान के पास हरि के समान सुन्दर रूप मांगने पहुंच गए। विष्णु भगवान ने नारद की इच्छा के अनुसार उन्हें हरि रूप दे दिया। हरि रूप लेकर जब नारद राजकुमारी के स्वयंवर में पहुंचे तो उन्हें विश्वास था कि राजकुमारी उन्हें ही वरमाला पहनाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। राजकुमारी ने नारद को छोड़कर भगवान विष्णु के गले में वरमाला डाल दी। नारद वहाँ से उदास होकर लौट रहे थे तो रास्ते में एक जलाशय में अपना चेहरा देखा। अपने चेहरे को देखकर नारद हैरान रह गये क्योंकि उनका चेहरा बन्दर जैसा लग रहा था।
 
हरि का एक अर्थ विष्णु होता है और एक वानर होता है। भगवान विष्णु ने नारद को वानर रूप दे दिया था। नारद समझ गए कि भगवान विष्णु ने उनके साथ छल किया। उनको भगवान पर बड़ा क्रोध आया। नारद सीधा बैकुण्ठ पहुँचे और आवेश में आकर भगवान को श्राप दे दिया कि आपको मनुष्य रूप में जन्म लेकर पृथ्वी पर जाना होगा। जिस तरह मुझे स्त्री का वियोग सहना पड़ा है उसी प्रकार आपको भी वियोग सहना होगा। इसलिए राम और सीता के रूप में जन्म लेकर विष्णु और देवी लक्ष्मी को वियोग सहना पड़ा।
 
समुद्र मंथन वाली लक्ष्मी : समुद्र मंथन से उत्पन्न लक्ष्मी को कमला कहते हैं जो दस महाविद्याओं में से अंतीम महाविद्या है। देवी कमला, जगत पालन कर्ता भगवान विष्णु की पत्नी हैं। देवताओं तथा दानवों ने मिलकर, अधिक सम्पन्न होने हेतु समुद्र का मंथन किया, समुद्र मंथन से 18 रत्न प्राप्त हुए, जिन में देवी लक्ष्मी भी थी, जिन्हें भगवान विष्णु को प्रदान किया गया तथा उन्होंने देवी का पानिग्रहण किया। देवी का घनिष्ठ संबंध देवराज इन्द्र तथा कुबेर से हैं, इन्द्र देवताओं तथा स्वर्ग के राजा हैं तथा कुबेर देवताओं के खजाने के रक्षक के पद पर आसीन हैं। देवी लक्ष्मी ही इंद्र तथा कुबेर को इस प्रकार का वैभव, राजसी सत्ता प्रदान करती हैं।

लेखक के बारे में
अनिरुद्ध जोशी
पत्रकारिता के क्षेत्र में 26 वर्षों से साहित्य, धर्म, योग, ज्योतिष, करंट अफेयर्स और अन्य विषयों पर लिख रहे हैं। वर्तमान में विश्‍व के पहले हिंदी पोर्टल वेबदुनिया में सह-संपादक के पद पर कार्यरत हैं। दर्शनशास्त्र एवं ज्योतिष: मास्टर डिग्री (Gold Medalist), पत्रकारिता: डिप्लोमा। योग, धर्म और ज्योतिष में विशेषज्ञता।.... और पढ़ें

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